भीड़ जनता की सुलगते से अलावों में




बर्फ सी जम गई हूं मैं सर्द रातों के अंधेरों में
मोम बन पिघल रही हूं मैं बाती के उजालों में
हमें मालूम है उनको मुहब्बत कुछ कम नहीं हमसे
घिरी हूं खुद ही खुद अपने पगले हुऐ सवालों में

सताता सीत का आलम सत्ता के बबालों में
लगी है भीड़ जनता की सुलगते से अलावों में
कहीं मजबूर हैं कोई तो कोई मर रहा गम से
वो झूंठे कर रहे वादे कुर्सी के हवालों में

ठिठुरता सा कहीं कुक्कुर कहीं हीटर सी गर्मी है
किसी को अब पड़ी किसकी महलों की दीवालों में
यही अब सोच कर के मैं कहीं गुम हूं रजाई में
नहीं क्यूं अब प्रजा दिखती राजा के ख्यालों में








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News Digital India 18

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