पुरानी डायरी के कुछ पन्ने


पुरानी डायरी के कुछ पन्ने 
अतीत से फिसल 
बिखर गये 
समय के बंधन तोड़
वर्तमान के उजाले सहेजते 
भरी दोपहर 
अभी चार दिन न हुए थे 
ज़िन्दगी की सिलवटें समेटे 
कि पसार दी फिर से
वही यादों की सीली चादर 
कच्ची ज़मीन पर 
सुनो
बड़ा अच्छा लगता है 
उँगलियों पर इनकी
मखमली झालरें लपेट 
बार बार इनसे उलझना

अंधेरों की आड़ रख
औंधे मुँह लेट 
हौले हौले दाँतों से 
इनकी रेशमी कोरें काटना

बार बार इन्हें सहेजना
बार बार इनकी अनदेखी कर
इन्हें बिसराने का 
तुमसे झूठा दिखावा करना

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News Digital India 18

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1 comments:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद डिजिटल इंडिया का हिस्सा बनाने के लिए ।

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