25000/- के लिए एक बेटे की शादी में तमाशा लगाने वाले लोजपा नेता के द्वितीय सुपुत्र की 'दहेज मुक्त' शादी की खबर, और उसके पीछे की काली हकीकत


मुखौटा    


आज तक मैं कथा कहानी के माध्यम से अपने आस-पास के दर्द को उभारती रही, जबकि अपने घर में ही सब कुछ घटित होता रहा, फिर भी घर के इज्जत की वजह से बड़े पटल पर कोई चर्चा न की, पर आज फेस बुक पर कुछ ऐसा दिखा कि ज्वालामुखी की तरह फटने से खुद को रोक नहीं पा रही. एक बेटे की शादी में तमाशा लगाने वाले नेता जी के द्वितीय सुपुत्र की दहेज मुक्त शादी की खबर पढ़ कर खून खौल उठा है. 25000/- दहेज की कमी उलाहना झेलती रूबी कब घरेलू हिंसा की चपेट में आ गई शायद वो भी न समझ न पाई. हमें फोन किया गया कि आकर बेटी को ले जाइए नहीं तो काट कर फेंक देंगे, वही परिवार एक बार फिर... आज जिस तरह अखबार की कतरन को बाप, बेटा, और माँ अपने फेस बुक वॉल की शोभा बढ़ा रहे हैं कि "दहेज मुक्त विवाह" घिन आती है ऐसे दोमुहें से...


घटना 2014 की है जब मेरे जेठ शिव शंकर पासवान की बिटिया रूबी कुमारी ग्राम-खनगाह,पोस्ट- अरवल,जिला अरवल की शादी अभिषेक देव, पिता-अशोक पासवान लोजपा नेता, मुहल्ला-शिव गंज,पोस्ट डेहरी, जिला रोहतास निवासी के साथ करार दहेज(राशि का जिक्र उचित नहीं समझ रही पर लाखों में वो भी कैश, क्योंकि चेक उन्हें मंजूर नहीं था) पर शादी ठीक हुई थी, जिसमें से मात्र 25000 रु भैया ने ये कहकर न दिया था कि बारात के स्वागत के लिए रख रहे हैं, पर लाखों खर्च करने वाले भैया और हम सब ये समझ न पायें कि इतनी छोटी सी रकम गले की फांस भी बन सकती है। 



खैर शादी हुई,स्त्री धन के रूप में भी लाखों के जेवर भी चढ़ाए गए जिसे बेटी के ससुराल जाते ही सास ने ये कहकर माँग लिया कि बहुत गर्मी है तुमको परेशानी होगी। नई दुल्हन बनी रूबी बिना कोई सवाल किए माँ समान सासु माँ को सारे जेवर उतार कर दे दी, जो उसे फिर कभी देखने को भी न दिया गया। 

शादी के बाद बिटिया को मायके न तो भेजा गया और न ही मायके वालों से बात करने की इजाजत दी गई। बहुत मिन्नतों के बाद यदि कभी बात भी करवाया तो उसका रिकॉर्डिंग किया गया। जब भी विदाई की बात कही गई तो 25000 रु वाली बात पर अड़ जाता। यहाँ तक घर के वर्षों पुराना शीशम का फर्नीचर जिसे घर पर महीनों दिन रखकर बनवाया गया था उससे असंतुष्ट इंजीनियर प्लाई का फर्नीचर, टी वी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, सभी कुछ की माँग की गई ।


''सास, ससुर, पति सभी समवेत स्वर में कह रहे थे ''बच्चा कहीं नहीं जायेगा, आप अपनी बेटी को ले जाइए. समझाने का प्रयास किया गया कि छोटा बच्चा (ग्यारह महीना का) माँ के बिना कैसे रहेगा? पर उन बुद्धजीवियों की बातें आप सब भी सुन ही लें! "ये लड़की क्या बच्चा वहाँ से ले कर आई थी?" अंततः थाने का शरण लेना पड़ा. 2016 का डेहरी थाना का पहला केस है ये. नेता जी ग्यारह महीने के बच्चे के साथ सपरिवार घर छोड़कर भाग गए. बहुत प्रयास व कानूनी दबिश के बाद चार दिन के बाद बच्चा थाना द्वारा बरामद किया गया. नेता जी के प्रभाव से किन्हीं की गिरफ्तारी क्या कोई कानूनी प्रक्रिया तक न हुई. बेटी एक साल के बच्चे के साथ मायके में रहने लगी. और जो कानून हमारी रक्षा के लिए बना है, वो पैसों के पलड़ों में झूलता रहा.''

घर के फर्नीचर के साथ सभी सामान देने पर नेता जी के द्वारा वापस दुकान में पहुँचा के नकद की वसूली की गई।

एक बेटे की शादी में इतना तमाशा लगाने वाले नेता जी के द्वितीय सुपुत्र की दहेज मुक्त शादी की खबर पढ़ कर खून खौल उठा है।

25000रु दहेज की कमी उलाहना झेलती रूबी कब घरेलू हिंसा की चपेट में आ गई शायद वो भी न समझ न पाई।इसी बीच 24 फरवरी 2015 की रूबी एक बेटे को जन्म देती है। सारे दुःख भूल रूबी मातृत्व सुख से जी उठती है। पर हद तो तब होने लगी जब इसके मातृत्व पर भी नेता जी और उनकी पत्नी का डाका पड़ने लगा।

जिस माँ के स्तनों में मासूम के लिए अमृत का सोता फुट पड़ा था उनलोगों ने बच्चे को उससे वंचित रखना शुरू किया।बच्चे को बाहरी दूध दिया जाने लगा सिर्फ इसलिए कि माँ से बच्चे को दूर किया जा सके।अधिक से अधिक समय तक दादा-दादी,पिता अपने पास रखते।जिसे हम सब यही मानते रहे कि बच्चे को सभी बहुत प्यार करते हैं।पर शायद ये प्यार नहीं बल्कि माँ से दूर करने का षड्यंत्र था जिसे मासूम तो अनजान था ही हम सब भी न समझ सके. पर साथ रहने के कारण रूबी इस चीज को महसूस करने लगी थी, जो शायद पहली बार अपने बच्चे के लिए सासु माँ से विरोध की थी, जिसका जवाब उसे बेहरमी से पीट कर दिया गया।साथ ही हमें फोन किया गया कि आकर बेटी को ले जाइए नहीं तो काट कर फेंक देंगे।

3 जनवरी 2016 की सर्द रात में इस तरह का फोन आना हम सबकी जान निकाल गया। रात अधिक होने के कारण पटना और अरवल से डेहरी जाना सम्भव न हुआ। सुबह सबेरे हम सब वहाँ पहुंचे तो बेटी को एक कमरे में बन्द करके रखा गया था। मार- पीट, खुद से लड़ते बेटी को हम पहचान न पायें। अपनों को देख कर बिलख पड़ी थी वो, पर उन लोगों का रोयां तक न सिहरा।

शिकायतें ऐसी ऐसी कि ,घर का काम नहीं करती, झाड़ू नहीं लगाती मतलब बेमतलब की बातें।

जबकि उस घर में शादी के पहले काम वाली थी, जिसे बहु के आने के बाद हटा दिया गया था।

हमारी कोशिश ये रही कि किसी तरह समझा कर, पैर पकड़ कर यही विनती करती रही कि अभी बेटी और बच्चा को जाने दें जब गुस्सा शांत हो जाएगा तब जैसा आप चाहेंगे वैसा ही होगा या आप आकर ले जाएं या कहियेगा तो हम पहुँचा देंगे।

पर इन सब की बातें सुनकर सहसा कानों को भी विश्वास न हुआ।
सास,ससुर,पति सभी समवेत स्वर में कह रहे थे बच्चा कहीं नहीं जायेगा आप अपनी बेटी को ले जाइए।

सास-ससुर व पति को अकेला पा कर नन्द अपने पति व बच्चों के साथ भी पधार चुकी थीं। हमारी रही सही इज्जत रूबी की नन्द ने पूरी।जिसे खून की घूँट पीकर रह गयें क्योंकि मेरी बेटी को आजीवन वहाँ रहना था।
कितना भी समझाने का प्रयास किया गया कि छोटा बच्चा(ग्यारह महीना) माँ के बिना कैसे रहेगा?

पर उन बुद्धजीवियों की बातें आप सब भी सुन ही लें!
" ये लड़की क्या बच्चा वहाँ से ले कर आई थी?"
पल भर को लगा ये लोग क्या कह रहे हैं?
क्या कोई लड़की शादी के पहले बच्चा लेकर जाती है?
यदि किसी के साथ ऐसा होता भी है तो क्या ससुराल वाले उसे रखेंगे?
उसके बाद स्थिति ऐसी आन पड़ी कि थाना का शरण लेना पड़ा। जहां आसानी से तो नहीं पर एफ,आई आर दर्ज करवाया गया। 2016 का डेहरी थाना का पहला केस है ये। नेता जी ग्यारह महीने के बच्चे के साथ सपरिवार घर छोड़कर भाग गए। बहुत प्रयास व कानूनी दबिश के बाद चार दिन के बाद बच्चा थाना द्वारा बरामद किया गया।

इतना होने के बाद भी नेता जी के प्रभाव से किन्हीं की गिरफ्तारी क्या कोई कानूनी प्रक्रिया तक न हुई। बेटी एक साल के बच्चे के साथ मायके में रहने लगी।हर सम्भव प्रयास किया गया कि वो लोग इज्जत मान-सम्मान के साथ बहु व पोता को ले जायें। पर जो कानून हमारी रक्षा के लिए बना है वो पैसों के पलड़ों में झूलता रहा।

नियति को क्या मंजूर था नहीं मालूम पर कुछ ऐसा हुआ कि अभिषेक देव की जान पर बन आई। मामूली सा घुटने का घाव कैंसर का रूप ले लिया।अंततः पैर तक काटना पड़ा।

जिसने भी सुना यही कहा कि उसे मासूम की हाय लग गई।
कोई कहता ऊपर वाले कि लाठी में आवाज नहीं होती।
रूबी ये सब सुनकर सब कुछ भूलकर पति के पास जा पहुँची, जिसे दरवाजे तक न चढ़ने दिया गया। खून का घूँट पीकर एक पिता वापस अपनी बेटी को लेकर आ गए। पर रूबी की जिद के आगे पुनः किसी तरह समझौता कर रूबी ससुराल जा पहुँची। अंत समय उसे पति का प्यार मिला या नहीं कोई गवाह नहीं। क्योंकि मात्र दो महीने में कैंसर ने उन्हें अपनी गिरफ्त में सदा के लिए ले लिया।

शादी के तीन वर्ष भी पूरे न हुए और ऐसी विपत्ति?😢
कहते हैं जोड़ियां ऊपर वाला बनाता है।
फिर ये बेमेल जोड़ी क्यों?
जवान बेटे की मौत से जहाँ नेता जी और उनकी पत्नी प्रभा देवी दुखी थी वहीं बेटी का दुख उनसे ज्यादा ।

नेता जी राजनीति में इतने रम गए थे कि अब उनकी राजनीति अपने बेटे की लाश पर शुरू होने लगी।

दो दिन के अंदर विधवा बहु से यह कहकर कोरे स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करवाया गया कि बेटा का गैस एजेंसी तुम्हारे नाम से करवा रहे हैं।
इस तरह धोखा देने के बाद रूबी और बच्चे को घर में कैद करके रखा जाने लगा। पूछने पर ये बताया गया कि बच्चा छोटा है रोड पर निकल जाता है।

किसी तरह घर में कैद रूबी के हाथ कुछ कागजात लगे। जिसमें उसका हस्ताक्षर वाला स्टाम्प पेपर भी था, जिसमें लिख दिया गया था कि मैं सक्षम नहीं हूँ इसलिए सब कुछ स्वेच्छा से दे रही हूँ।

ये उसके पैरों तले से जमीन खिसकने का दुःख था। किसी तरह मायके खबर भेजी। भैया वापस बेटी व बच्चे को लेकर घर(मायके) आ गए।इण्डेन गैस वाले को आवेदन दिया गया ।जिसमें सभी बातों का जिक्र किया गया।

पटना इण्डेन गैस का रीजनल ऑफिस एक्जीविशन रोड में कॉउंसलिंग के लिए बुलाया गया। सभी बातों की नाजुकता को समझ पहले एजेंसी को बंद किया गया तथा उनका पूरा प्रयास रहा कि आप पत्नी हैं आपके नाम से हो जाएगा। सभी कागजी करवाई पूरी की गई। गोदाम और एजेंसी के जमीन की भी व्यवस्था करने को कही गई।

पर अचानक से नेता जी के प्रभाव से रीजनल ऑफिस वालों के व्यवहार और बोल भी बदल गए। क्योंकि नेता जी पत्नी सहित बेटे पर आश्रित दिखाने लगें, जबकि सास प्रभा देवी बुनियादी विद्यालय, डालटनगंज में शिक्षिका हैं। 

अब मामला सास-ससुर के अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) पर अटक गया।
अभी 11 दिसम्बर 2018 को नेता अशोक पासवान पुनः मुखौटा लगा कर घर तक आएं कि रूबी जो कहेगी, जैसे कहेगी वैसा ही होगा।

इस तरह अपनी बातों में बहला कर रूबी और भैया को पटना रीजनल ऑफिस ले आयें। रूबी के कारण हम दोनों भी गयें। पर यहाँ की स्थिति कुछ और थी। इनका प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा था। इस बार एजेंसी रूबी के नाम के साथ देवर अमित के संयुक्त संचालन पर बात हो चुकी थी।
ये बात हम स्वीकार न कर सकें। रूबी को लेकर घर आ गए।

क्या एक पिता का यही दायित्व है कि बेटा खोने के बाद विधवा बहु,और पोते को उसके अधिकार से भी वंचित कर दें?

आज जिस तरह अखबार की कतरन को बाप, बेटा, और माँ अपने फेस बुक वॉल की शोभा बढ़ा रहे हैं कि "दहेज मुक्त विवाह" घिन आती है ऐसे दोमुहें से।

वाह रे!! एक विधवा बहु और पोता दहेज की मार से उबर न पा रहा और ये दहेज न लेने की ढोंग!!

अमित पासवान जी की शादी की जिक्र तक उनके पिता ने करने की जरूरत समझी जबकि 11 को पटना आये और 16 को शादी कियें।

इन समाज सेवकों के मन में कहीं ये भय तो नहीं था कि, समाज घर की इज्जत घर में रखने की दबाव न बनाने लगें।

एक बेटी के लिए जो बातें उचित लगती है वही बहु के लिए अनुचित क्यों हो जाती है।

स्त्रियों के लिए सभी दुःख से बड़ा पति का दुःख है, क्योंकि समाज की ऐसी व्यवस्था है कि सभी रिश्ते का विकल्प तो है पर पति जैसे रिश्ते का कहीं कोई विकल्प नहीं।

घर की इज्जत न बनाएं कम से कम अपने दिवंगत बेटा की विधवा और बच्चे का ईमानदारी से हक़ हिस्सा ही दे दे, ताकि वो आजीवन अपना व बच्चे का बोझ उठा सके।

मैं ज्यादा नियम कानून तो जानती पर यहाँ विद्वजनों से जानना जरूर चाहूँगी कि इस मामले में बेटी रूबी और बच्चा आकर्ष (उम्र-पौने चार वर्ष ) को क्या न्याय नहीं मिलेगा?

क्या अपनों का दंश ही झेलना स्त्री की नियति है?

अमित बाबू ने तो मेरी बधाई भी स्वीकार न की। उल्टे आनन फानन में मुझे ब्लॉक भी कर दिया।।

उस खरगोश की तरह जो बिल्ली के डर से खुद आँखे बंद कर ये सोच लेता है कि अब मुझे कोई नहीं देख रहा। मैं न देख सकूँ कोई बात नहीं पर लोग तो आपको देखें।

Ushalal Singh की फेसबुक वाल से     


पोस्ट पर रश्मि रानी  ने जबरदस्त प्रतिक्रिया दी है. लिखा है- 
गज़ब का मुखौटा लगा रखा इन्होंने, इनकी फितरत इनकी शख्शियत से घिन आने लगी है अब तो। लाश पर भी रोटी सेंकनेवाले दहेज मुक्त शादी का ढोंग रच रहे ....कमाल है। मेरा भी पढ़कर देखकर खून खौल गया । अच्छा कर बेनकाब करी, उसके ब्लॉक करने से क्या होगा... उनका असली चेहरा सामने ला कर बधाई की पात्र बन गयी हो। समाज के कुछ नापाक चेहरों को इसी तरह सामने लाने का साहस हर कोई कर ले तो कुछ तो शर्म आएगी इन तथाकथित सफेदपोशों को।

एक प्रतिक्रिया यह भी -
मुखौटा लगाए बहुत से भेड़िए सरेआम घुमते है समाज उसे इज्जत भी करती है क्योंकि मुखौटे के पीछे छुपे उसका क्रूर चेहरा दिखाई नहीं देता । मेरी इच्छा उस दिन चिता से उठते धुआँ के साथ धुआँ हो गया था जिस दिन आपके आँखो से एक बहसी के लिए आँसू देखी थी । 

अफ़सो कि प्रकृति ने उसे सजा दे दे दिया। मेरी आँखिया की सूजन अभी कम न हुई है । - Bipin Tiger 

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