कार्यकर्ता जब पार्टी को ठिकाने लगाने में लग गया, तो शाह को याद आ रहा 'पानीपत का युद्ध'





''बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा 2019 के चुनाव को दिल्ली में भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यक्रम में 'पानीपत का युद्ध' घोषित किया है. शाह की इस बात को सोशल मीडिया पर शाह के कमजोर चुनावी गणित या इतिहास बोध को लेकर निशाना बनाया जा रहा है. पोस्ट में
लिखा गया है कि आपने पार्टी के राजनीतिक दर्शन, विचारधारा, संगठन, कार्यक्रम, कार्यपद्धति, कार्यकर्ता को ही ठिकाने लगा दिया. अब बारी कार्यकर्ता की आई और जब वह पार्टी को ही ठिकाने लगाने में लग गया, तो 'पानीपत का युद्ध' याद आ रहा है.''


digital india news desk 

पोस्ट में
आगे लिखा है ये शाजिया इल्मी, नरेश अग्रवाल, साबिर अली, सोनाराम, गौरव भाटिया और ऐसे अनेक लोग जिनको बुला बुला कर टिकिट दिए थे, प्रवक्ता बनाये, सत्ता में हिस्सा दिया, वो चुनाव नहीं जितवा पा रहे हैं, तो किसके आसरे यह 'पानीपत का युद्ध' जीतने की बात कर रहे हैं.

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कल रविवार को भारतीय जनता युवा मोर्चा की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला 'विजय लक्ष्य-2019' में देशभर से आए युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि 2019 का चुनाव देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है. इसको पानीपत के युद्ध की तरह लड़ना है. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ युद्ध ऐसे होते हैं, जो युग परिवर्तनकारी होते हैं और 2019 का चुनाव वैसा ही युग परिवर्तनकारी होगा. इस युद्ध में आप युवा मोर्चा के लोगों की बहुत बड़ी भूमिका है. शाह की इस बात को सोशल मीडिया पर शाह के कमजोर चुनावी गणित या इतिहास बोध को लेकर निशाना बनाया जा रहा है. 


कार्यक्रम में विरोधियों पर निशाना साधते हुए शाह बोले कि 2019 का चुनाव में दो खेमे लड़ रहे हैं. पहला मोदीजी की अगुवाई में सशक्त खेमा. दूसरी तरफ सत्ता के लालची लोगों का मोर्चा. अगर हम पानीपत की लड़ाई नहीं हारते तो देश में अंग्रेजों का शासन कभी न आता. 2019 का चुनाव पानीपत की लड़ाई जैसा है. आज हमारे सारे विरोधी एकत्रित हो गए हैं, पर मैं विरोधियों से डरता नहीं हूं.

हार गए तो विचारधारा की लड़ाई 25 साल पीछे चली जाएगी
कार्यक्रम में अमित शाह ने भविष्य के बारे में बोलते हुए कहा कि एक पानीपत का युद्ध हारने से 200 साल की गुलामी आ गई थी, वैसे ही बीजेपी 2019 का चुनाव जीतती है तो 50 साल तक संसद से लेकर पंचायत तक 50 साल तक बीजेपी का शासन रहेगा. 2019 में विरोधियों के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो जाएगा. 50 साल तक हमको कोई नहीं रोक पाएगा, पर अगर हम 2019 की लड़ाई हार गए तो हमारी विचारधारा की लड़ाई 25 साल पीछे चली जाएगी.

अब अमित शाह
के चुनावी गणित और इतिहास बोध को लेकर निशाना बनाया जा रहा है. दिल्ली से अपने को मजदूर मोर्चा बीजेपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बताते हुए देवेन्द्र शर्मा ने एक पोस्ट में सवाल किया है-
 
कल तक 50 साल राज करने की बात कहने वाले
कल तक गुजरात में 155 पार से 97 लाने वाले
कर्नाटक में 135 पार से 104 लाने वाले
राजस्थान में 180 पार से 73 लाने वाले
मध्यप्रदेश में 200 पार से 109 लाने वाले
छत्तीसगढ़ में 65 पार से 15 लाने वाले
तेलंगाना में 80 पार से 1 लाने वाले
मिजोरम में 35 पार से 1 लाने वाले

अब अमित शाह 2019 के लोकसभा चुनाव को 'पानीपत का युद्ध' घोषित कर रहे हैं, मुझे यह समझ नहीं आ रहा है, चुनावी गणित कमजोर है या इतिहास बोध.

पोस्ट में आगे लिखा है ये शाजिया इल्मी, नरेश अग्रवाल, साबिर अली, सोनाराम, गौरव भाटिया और ऐसे अनेक लोग जिनको बुला बुला कर टिकिट दिए थे, प्रवक्ता बनाये, सत्ता में हिस्सा दिया, वो चुनाव नहीं जितवा पा रहे हैं, तो किसके आसरे यह पानीपत जीतने की बात कर रहे हैं.

पोस्ट में अमित शाह को ही पार्टी की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा है कि 'आपने पार्टी के राजनीतिक दर्शन, विचारधारा, संगठन, कार्यक्रम, कार्यपद्धति, कार्यकर्ता ही ठिकाने लगा दिए, अब कार्यकर्ता ही ठिकाने लगाने में लगा हुआ है तो पानीपत याद आ रहा है.'

पोस्ट में दावा किया है स्वयं वाराणसी में मोदीजी की स्थिति खराब है, आज चुनाव हो जाये तो लगभग सवा लाख से हारेंगे. यूपी में वर्तमान स्थितियों में 33 से अधिक सीट नहीं आ रही हैं. मोदीजी ने शल्यग्रंथि का उल्लेख किया था कुछ समय पहले, जिसमें स्पष्ट हो गया था कि उन्होंने महाभारत का टेलीविजन संस्करण ही पता है.


पोस्ट में लिखा है बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की बात कि पानीपत की लड़ाई की तरह, हर हाल में जीतना है लोकसभा 2019 का चुनाव, पर सवाल यह भी किया जा रहा है कि कौन जीता था पानीपत की लड़ाई? जीतने वाले ने हिन्दुओं का नाश किया था, मोटा भाई इस युद्ध को जीतकर फिर से हिन्दुओं का नाश करना चाहते हैं मुगलियाईस्तान बनाना चाहते हैं.


पोस्ट पर की गईं कुछ ख़ास प्रतिक्रियायें -


Abhinav Rai Suresh Chiplunkar लिखते हैं- तीसरे पानीपत युद्ध के बाद अब्दाली कभी भारत लौट कर नहीं आया और अगले 10 वर्षों में मराठा साम्राज्य उत्तर भारत तक फैलना शुरू हो गया था..
Suresh Chiplunkar लिखते हैं - Devendra Sharma जी... मेरी जानकारी के अनुसार.... इसी युद्ध के बाद मराठा साम्राज्य खात्मे की ओर अग्रसर हुआ... सदाशिवराव भाऊ पेशवा के साथ ही हजारों मराठे मारे गए और पूना का वर्चस्व खत्म होकर मुग़ल साम्राज्य का मार्ग साफ हुआ था.... बाकी तो इतिहासकार लोग जानें..

Ravi Kumar Sraogi 170 - 200 max पर अटकेगा #विकास 2019 में.... विकास किसी हाल में दावा नहीं कर सकता कि उसके कार्य उसे 2014 की विजय "भी" वापस दिला सकते हैं, भले ही जुमला 400 आने का हो..


Rakesh Saraogi दुविधा में दोऊ गये ..माया_मिली_ना_राम .....
#राममंदिर बना नहीं .... पूर्ण बहुमत का दुरूपयोग कर #नोटबन्दी #GST के माध्यम से छोटे व्यापारी की कमर तोड़ दी ....रही सही कसर अहम् ब्रह्मास्मि के भ्रम ने ST/SC ACT लगा के सवर्णो को पैर की जूती समझ लिया था .....अभी भी समय है चेत ज़ाए मोदीमय भाजपा अन्यथा 2019 में  EVM  हैक करना ही होगा ...



Mahendra Rajpurohit बहुत ही सटीक और तार्किक बात है, पार्टी को इसपर ध्यान देना होगा अन्यथा स्थिति विकट होगी...
 
 



और अब कौन जीता था पानीपत की लड़ाई? इस सवाल का उत्तर जानने के लिए हम सीधे पानीपत का युद्ध के बारे में जानकारी यहाँ दे रहे हैं. देखें - 


पानीपत का युद्ध के बारे में जानकारी
भारतीय इतिहास में पानीपत का युद्ध तीन बार हुआ, जो बहुत महत्त्वपूर्ण हैं. पेश है आपके सामने पानीपत के तीनों युद्धों का संक्षिप्त विवरण-

पानीपत की प्रथम लड़ाई
पानीपत में तीन भाग्यनिर्णायक लडाईयाँ यहाँ हुई, जिन्होंने भारतीय इतिहास की धारा ही मोड़ दी. पानीपत की पहली लड़ाई 21 अप्रैल, 1526 ई. को दिल्ली के सुलतान इब्राहीम लोदी और मुग़ल आक्रमणकारी बाबर के बीच हुई. इब्राहीम के पास एक लाख संख्या तक की फ़ौज थी. उधर बाबर के पास मात्र 12,000 फ़ौज तथा बड़ी संख्या में तोपें थीं. रणविद्या, सैन्य-सञ्चालन की श्रेष्ठता और विशेषकर तोपों के नए और प्रभावशाली प्रयोग के कारण बाबर ने इब्राहीम लोदी के ऊपर निर्णयात्मक विजय प्राप्त की. लोदी ने रणभूमि में ही प्राण त्याग दिया. पानीपत की पहली लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली और आगरा पर बाबर का दखल हो गया और उससे भारत में मुग़ल राजवंश का प्रचालन हुआ.

पानीपत की दूसरी लड़ाई
पानीपत की दूसरी लड़ाई 5 नवम्बर, 1556 ई. को अफगान बादशाह आदिलशाह सूर के योग्य हिन्दू सेनापति और मंत्री हेमू और अकबर के बीच हुई, जिसने अपने पिता हुमायूँ से दिल्ली का तख़्त पाया था. हेमू के पास अकबर से कहीं अधिक बड़ी सेना थी. उसके पास 1500 हाथी भी थे. प्रारम्भ में मुग़ल सेना के मुकाबले में हेमू को सफलता प्राप्त हुई परन्तु संयोगवश एक तीर हेमू के आँख में घुस गया और यह घटना युद्ध में जीत रहे हेमू के हार का कारण बन गई. तीर लगने से हेमू अचेत होकर गिर पड़ा और उसकी सेना भाग खड़ी हुई. हेमू को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे किशोर अकबर के सामने ले जाया गया. अकबर ने उसका सर धड़ से अलग कर दिया. पानीपत की दूसरी लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली और आगरा अकबर के कब्जे में आ गए. इस लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली के तख़्त के लिए मुगलों और अफगानों के बीच चलनेवाला संघर्ष अंतिम रूप से मुगलों के पक्ष में निर्णीत हो गया और अगले तीन सौ वर्षों तक दिल्ली का तख़्त मुगलों के पास रहा.

पानीपत की तीसरी लड़ाई
पानीपत की तीसरी लड़ाई ने भारत का भाग्य निर्णय कर दिया जो उस समय अधर में लटक रहा था. पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ई. में हुआ. अफगान का रहने वाला अहमद अब्दाली वहाँ का नया-नया बादशाह बना था. अफगानिस्तान पर अधिकार जमाने के बाद उसने हिन्दुस्तान पर भी कई बार चढ़ाई की और दिल्ली के दरबार की निर्बलता और अमीरों के पारस्परिक वैमनस्य के कारण अहमद अब्दाली को किसी प्रकार की रुकावट का सामना नहीं करना पड़ा. पंजाब के सूबेदार की पराजय के बाद भयभीत दिल्ली-सम्राट ने पंजाब को अफगान के हवाले कर दिया. जीते हुए देश पर अपना सूबेदार नियुक्त कर अब्दाली अपने देश को लौट गया. उसकी अनुपस्थिति में मराठों ने पंजाब पर धावा बोलकर, अब्दाली के सूबेदार को बाहर कर दिया और लाहौर पर अधिकार जमा लिया. इस समाचार को सुनकर अब्दाली क्रोधित हो गया और बड़ी सेना ले कर मराठों को पराजित करने के लिए अफगानिस्तान से रवाना हुआ. 

मराठों ने भी एक बड़ी सेना एकत्र की, जिसका अध्यक्ष सदाशिवराव और सहायक अध्यक्ष पेशवा का बेटा विश्वासराव था. दोनों वीर अनेक मराठा सेनापतियों तथा पैदल-सेना, घोड़े, हाथी के साथ  पूना से रवाना हुए. होल्कर, सिंधिया, गायकवाड़ और अन्य मराठा-सरदारों ने भी उनकी सहायता की. राजपूतों ने भी मदद भेजी और 30 हजार सिपाही लेकर भरतपुर (राजस्थान) का जाट-सरदार सूरजमल भी उनसे आ मिला. मराठा-दल में सरदारों की एक राय न होने के कारण, अब्दाली की सेना पर फ़ौरन आक्रमण न हो सका. पहले हमले में तो मराठों को विजय मिला पर विश्वासराव मारा गया. इसके बाद जो भयंकर युद्ध हुआ उसमें सदाशिवराव मारा गया. मराठों का साहस भंग हो गया. पानीपत की पराजय तथा पेशवा की मृत्यु से सारा महाराष्ट्र निराशा के अन्धकार में डूब गया और उत्तरी भारत से मराठों का प्रभुत्व उठ गया.



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