कालेज, कोचिंग से लेकर स्कूलों तक के आसपास 'ड्रग्स की पुडिय़ा' की आसान पहुँच


सरकार को सख्ती दिखानी होगी, ताकि पुलिस गुनाहगारों तक पहुंच सके

''प्रदेश में शराबबंदी को लेकर तो खूब बात होती है, लेकिन बाकी मादक पदार्थों को लेकर कोई सरकार-विपक्ष और न ही सामाजिक संगठन कोई अभियान चलाते हैं। यही कारण है कि प्रदेश का कोई हिस्सा ऐसा नहीं, जहां नशे का कारोबार फल-फूल न रहा हो। इसे बाकायदा पुलिस और राजनीतिक संरक्षण भी मिलता है।'' 

नशे के बढ़ते कारोबार पर संजय सक्सेना की ख़ास रपट   

एक खबर आई है कि खंडवा में ड्रग्स बेचने के मामले में पकड़े गए एक आरोपी फैजल ने पुलिस को बताया कि एक ग्राम ड्रग्स की पुडिय़ा को 600 रुपए में बेचता था, जो उसे 90 रुपए में मिलती थी। अब पुलिस द्वारा उसके मोबाइल की कॉल डिटेल निकाली जा रही है। यह मुम्बई का रहने वाला है और खंडवा निवासी शिवम और शादाब से दोस्ती के बाद वह अक्सर ड्रग्स लेकर खंडवा आता रहता था। उसका कहना था कि बांद्रा ड्रग्स सप्लाय का बड़ा ठिकाना है। मुंबई में सबसे अधिक ड्रग्स बांद्रा में ही मिलती है। वह कॉलेज के स्टूडेंट से संपर्क बनाकर उन्हें ड्रग्स बेचता है। कहा तो जा रहा है कि पुलिस फैजल के जरिए ड्रग्स का सप्लाय करने वाले गिरोह तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। इसके लिए पुलिस द्वारा सायबर सेल की मदद से फैजल के मोबाइल पर आने वाले फोन नंबरों के बारे में पता लगाया जा रहा है। इसके साथ ही पिछले कुछ माह की उसकी कॉल डिटेल भी निकालने में पुलिस लगी हुई है। इससे उससे जुड़े साथियों के बारे में पता लगाया जा सके। 

इसके अलावा खंडवा और उसके आसपास के जिलों में उसका नेटवर्क भी पुलिस तलाशने में लगी हुई है। पुलिस की तलाश कहां तक पहुंचेगी, अभी नहीं कहा जा सकता है, लेकिन अभी तक तो यही देखा गया है कि अवैध नशे का कोई भी बड़ा कारोबारी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका है। केवल कैरियर को पकड़ कर इतिश्री कर ली जाती है। इसके आगे की पतारसी के नाम पर पुलिस कर्मचारी और अधिकारी मुम्बई, गोवा सहित कई पर्यटन स्थलों की सैर जरूर कर आते हैं। सरकारी खर्च पर घूमने का इससे बेहतर मौका और कहां मिल पाता है। जमकर उड़ाया जाता है। 


प्रदेश के बड़े शहरों के अलावा उन हिस्सों में ड्रग्स की सप्लाई ज्यादा होती है, जहां अच्छी फसलें होती हैं। ब्राउन शुगर, हैरोइन, एलएसडी जैसे मादक पदार्थ अब गांवों तक में पहुंचाए जाते हैं। वहां तो बिना पुलिस और राजनीतिक संरक्षण के यह संभव ही नहीं हो पाता है। राजधानी भोपाल हो या व्यावसायिक राजधानी इंदौर, या फिर जबलपुर-ग्वालियर, कोई शहर ऐसा नहीं बचा है, जहां नशे का कारोबार फल-फूल नहीं रहा हो। कालेज और कोचिंग से लेकर स्कूलों तक के आसपास ड्रग्स की पुडिय़ा आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। पान की दुकानों से लेकर कई चाय-नाश्ते की दुकानों को भी इनका सप्लाई केंद्र बनाया जाता है। कई जगह खोमचे वाले भी रखने लगे हैं। इनका ठिकाना अक्सर बदलता रहता है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां अफीम और गांजे का नशा आम हो गया है, वहीं और खतरनाक मादक पदार्थों की लत भी युवाओं में डाली जा रही है। जब ये नशे के पदार्थ नहीं मिलते तो डोडा चूरा की भी जमकर सप्लाई हो रही है। कुछ क्षेत्रों में एकाध संगठन नशे की लत छुड़ाने का अभियान भी चला रहे हैं, लेकिन उनके प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही साबित हो रहे हैं। ये डाल-डाल तो वे पात-पात। बस पुलिस या प्रशासन में बैठे लोगों को खरीदना ही तो है और यह काम बहुत आसान होता है। कई जगह तो पुलिस कर्मचारियों के घरों से ही पुडिय़ा बिकती है। 

नर्मदांचल में तो एक बड़े राजनेता ने तो इसका खुलासा भी किया था, वह वहां नशा विरोधी अभियान भी चला रहे हैं, लेकिन न तो स्थानीय तौर पर और न ही सरकार स्तर पर कोई मदद मिल पा रही है। अब तो शहरों में सूखे नशे के साथ ही कुछ दवाओं का भी नशा युवा करने लगे हैं। और तो और कफ सीरप कोरेक्स भी ठंडे नशे के लिए उपयोग में ली जाने लगी है। पेट्रोल सूंघ कर भी युवा और किशोर नशा कर रहे हैं। इसके लिए जहां पुलिस का संरक्षण खत्म करना होगा, वहीं सामाजिक संगठनों को भी संगठित अभियान चलाने की आवश्यकता है। और फिर सरकार को भी थोड़ा सख्ती दिखानी होगी, ताकि पुलिस असली गुनाहगारों तक तो पहुंच ही सके।
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