मोदी से टूटता जनता का विश्वास


''जब देश में वो लोग थे, जो कांग्रेस के अलावा सोच भी नहीं सकते थे, वो भी मोदी जी के इश्क में पागल होकर नाच रहे थे। लोगों के मन में यही विश्वास था कि विकास के नाम मोदी जी देश की शकल बदल देंगे। शुरुआत रही भी शानदार, लेकिन लोगों के मन की बात कहते मोदी जी धीरे-धीरे अपने मन की बात कहते हुए विनम्रता खोने लगे। भाषा का संयम टूटा, निर्धारित वचनों से हटकर कुछ ऐसे निर्णय करने लगे, जिसके लिए जनता ने सोचा तक नहीं था। कांग्रेस के भ्रष्टाचारी दीमक का ख़िताब अब भाजपा ने छीन लिया।''

''पांच वर्ष में विरोधियों पर प्रहार करने में एक आयोजन का परिणाम आज चर्चा में है, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर आधारित ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म। मनमोहन सिंह का किरदार निभाने वाले अभिनेता अनुपम खेर का बयान था, उनके नेता पर फिल्म बनी है उन्हें (कांग्रेस) खुश होना चाहिए। फिल्म के बारे में लेखक संजय बारू ने पत्रकारों को कोई उत्तर न दिया, मगर उनकी खुशी चेहरे पर छलकती थी, जो कांग्रेस से गद्दारी करके उन्होंने अर्जित की है।''







अखंड राष्ट्र दैनिक के स्तम्भ 'प्रत्यंचा' में पंकज त्रिवेदी



2014 से नरेन्द्र मोदी जी के नाम इश्के मिजाजी का नशा इस देश के प्रत्येक नागरिक को चढ़ गया था, मगर उसमें कहीं भी इश्के हकीकी नज़र नहीं आती थी। मतलब मोदी जी के लिए प्यार नहीं, आकर्षण मात्र था। पढ़े लिखें हो या अनपढ़, किसी भी जात-धर्म से हों, सरकारी या प्राइवेट नौकरी हों, कामगार या उद्योगपति हों, सबके मन में यही था कि भारतवर्ष को दुनिया में अव्वल नंबर पर प्रतिष्ठा और वर्चस्व एक ही आदमी स्थापित कर सकता है, जिसका नाम है नरेन्द्र मोदी। इसी भरोसे पे देश की जनता ने खुले मन से और पूर्ण समर्पण से भाजपा को बहुमत दिया और वो सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी के नाम। एक समय था कि भाजपा पर कोई विश्वास नहीं करता था मगर अटल बिहारी वाजपेयी जी की व्यक्तिगत प्रतिभा के कारण इस देश की जनता ने भाजपा को सर्व सत्ताधीश बनाने का सपना देखा था। दुर्भाग्य यह रहा कि वाजपेयी जी की अगुवाई में सरकार चल न पाई और कांग्रेस कई वर्षों तक सत्ता में रही।

देश में किसी एक व्यक्ति के नाम पर ही चुनाव जीता जाए और सत्ता हासिल हो, ऐसा सिर्फ तीन बार हुआ। स्वर्गीय इंदिराजी को अपने ही सुरक्षाकर्मीओं ने गोली मारी तब उनके नाम और परिवार के प्रति संवेदना जताते हुए इस देश की जनता ने स्वर्गीय राजीव गांधी जी को प्रधानमंत्री पद दिया। दूसरे अटल बिहारी वाजपेयी जी अपने निराले स्वभाव, कवित्व, बिना राग-द्वेष के प्रतिस्पर्धी थे। जनता ने उनमें एक संवेदनशील व्यक्ति को देखा और वो प्रधानमंत्री बन गए। उनके बाद नरेन्द्र मोदी ने गुजरात मॉडल और हिंदुत्व के नाम से लोगों के मन में ऐसे हिंदुस्तान का सपना दिखाया, जो दुनिया में अव्वल नंबर पर हों और देश में प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ख़ुशहाली लाएं। 

जब देश में वो लोग थे, जो कांग्रेस के अलावा सोच भी नहीं सकते थे, वो भी मोदी जी के इश्क में पागल होकर नाच रहे थे। लोगों के मन में यही विश्वास था कि विकास के नाम मोदी जी देश की शकल बदल देंगे। शुरुआत रही भी शानदार, लेकिन लोगों के मन की बात कहते मोदी जी धीरे-धीरे अपने मन की बात कहते हुए विनम्रता खोने लगे। भाषा का संयम टूटा, निर्धारित वचनों से हटकर कुछ ऐसे निर्णय करने लगे, जिसके लिए जनता ने सोचा तक नहीं था। कांग्रेस के भ्रष्टाचारी दीमक का ख़िताब अब भाजपा ने छीन लिया।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी छवि बनाने में मोदी जी जरुर सफल रहे, मगर देश की अंदरुनी जागृति, विकास और ख़ुशहाली का सपना चकनाचूर होने लगा। उनके निर्णय में सत्ता से सरमुखात्यार मोदी जी की छवि उभरने लगी।

मोदी जी के लिए कहा जाता है कि देश के किसी भी कोने में जाएं, जिसे भी मिलें, उन्हें वो कभी नहीं भूलते। अपने मन में जिस कार्य के लिए वो ठान लेते हैं उसे पूर्ण करते हैं क्यूंकि वो जिद्दी है । जिद्द सकारात्मक हों तो भला करें अन्यथा नुकसान तो करेगा ही। मोदी जी के पास जिद्द और सत्ता प्राप्त करने का झूनून था इसलिए सफ़ल हो गए। 2014 में सत्ता में आते ही प्रथम पांच वर्ष के शासन में क्या करना है उसकी ब्लूप्रिंट उनके दिमाग में थी। जनहिताय कार्यों से ज्यादा विरोधियों को कैसे पस्त करना और उसके लिए पांच वर्ष में कौन से समय पे कौन सा कार्य करके विरोधियों को बीच बीच में ज़ख़्मी करते रहना, यह एक बहुत बड़ी सोच (साज़िश) थी। उसी के आयोजन का एक हिस्सा देश के धनपतियों को झुकाना, सेलिब्रिटी को अपने गुणगान के लिए शामिल करना प्रमुख था, क्यूंकि देश धनपतियों पर देश की आर्थिक स्थिरता और सेलिब्रीटी से भोली जनता छलकर प्रभावित करना था। 

छोटे उद्योग, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि क्षेत्रों में दम न था कि वो अपने या देश के बारे में सोचें या कुछ कर पाएं। ऐसे में मोदी जी ने अपने भाषण में गुजराती लहजे से जनता को मनोरंजन के साथ विरोधियों की बुराई सास-ननंद के लुभावने अंदाज़ में शुरू कर दी। इन सब के बीच में ‘विकास’ पीछे छूटता गया, जातिवाद, मोब लिंचिंग, की-पोस्ट पर संघ के सदस्यों को बिठाकर एक जाल बून लिया। मोदी जी विलक्षण नहीं और विचक्षण (चालाक) भी हैं।

पांच वर्ष में विरोधियों पर प्रहार करने में एक आयोजन का परिणाम आज चर्चा में है, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर आधारित ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म। फिल्म की कहानी संजय बारू की इसी नाम से लिखी गई किताब पर आधारित है। इस पर मनमोहन सिंह का किरदार निभाने वाले अभिनेता अनुपम खेर का बयान था, उनके नेता पर फिल्म बनी है उन्हें (कांग्रेस) खुश होना चाहिए। अनुपम उन सेलिब्रीटी में हैं, जो भाजपा के समर्थक हैं। राष्ट्रपिता गांधीजी, सरदार और अन्य कई महानुभावों के जीवन पर फ़िल्में बनी हैं। 

लेखक संजय बारू वर्ष 2004 से 2008 के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे। फिल्म के विरोध के बाद टीवी पर अनुपम खेर ने बताया कि 2014 में फिल्म पर कार्य शुरू हुआ और अब रिलीज़ हो रही है। सेंसर बोर्ड ने मंज़ूरी नहीं दी, तब तक प्रोमो भी नहीं दिखाया। मतलब कि 2019 के चुनाव के मद्देनज़र इस फिल्म की प्लानिंग की थी। अपनी नई किताब ‘द बोम्बे प्लान’ की पब्लिसिटी के समय फिल्म के बारे में संजय बारू ने पत्रकारों को कोई उत्तर न दिया, मगर उनकी खुशी चेहरे पर छलकती थी, जो कांग्रेस से गद्दारी करके उन्होंने अर्जित की है। 

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