जीतते तो 'शिवराज' हारे तो 'शिवराज', कांग्रेस का वनवास अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं, 2023 में होगी असल परीक्षा


मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम त्वरित टिप्पणी/ चित्रांश 


हालिया विधानसभा चुनावों में पांचों राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन काफी खराब रहा. उसने 3 अहम् राज्य मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान खो दिए हैं. छत्तीसगढ़ में जहाँ अप्रत्याशित ढंग से बेहतर प्रदर्शन किया है, वहीं राजस्थान में कड़ी टक्कर के बाद बहुमत हासिल कर लिया का है. मध्यप्रदेश में अवश्य कड़ी टक्कर आखिर तक बनी हुई है. दुसरे दिन अभी 12 वुधवार सुबह तक भी निर्वाचन आयोग सभी आंकड़े नहीं दे सका है. कांग्रेस 114 और बीजेपी 109 पर अटके हुए हैं. लेकिन इतना अवश्य है कि किनारे पर ही सही, कांग्रेस की सरकार बन रही है. छत्तीसगढ़ और राजस्थान के साथ ही मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन रही है. हम यहाँ बात  करते हैं मध्यप्रदेश की.


मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लिए 15 साल का वनवास ख़त्म कर लेने के लिए बहुत बहुत बधाई, लेकिन यह भी सच है कि उसके लिए आगे का रास्ता और भी काँटा भरा होगा. पहली कड़वी बात, कांग्रेस को यह अच्छे से समझ लेना चहिये कि उसका वनवास अभी ख़त्म नहीं हुआ है. कारण बीजेपी या शिवराज चुनाव हार गए हैं, का यह मतलब कतई नहीं है कि कांग्रेस जीत गई है, क्योंकि चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के बीच हो ही कहाँ रहा था? चुनाव तो शिवराज सरकार के काम मोदी सरकार के जीएसटी/नोट बंदी जैसे तुगलकी फरमानों के विरुद्ध खुद जनता लड़ रही थी. कहा जा सकता है यह जो सत्ता परिवर्तन हुआ है उसमें कांग्रेस जीत गई है, ऐसा बिलकुल नहीं है. सच यही है कि जीतते तो शिवराज और कोई हारा है तो शिवराज. हाँ, अब कांग्रेस को एक अवसर अवश्य मिल गया है कि वह प्रदेश के खाली खजाने के साथ कर्ज माफी जैसे भारी भरकम वचन कठिन चुनौतियों में कैसे पूरे करती है. कांग्रेस के लिए कुछ कर दिखाना है, का समय है. यदि कुछ कर दिखा सकी तो 2023 में उसकी जीत तय होगी. तब ही वनवास ख़त्म जैसी बात कही जा सकती है. 

पार्टी को हार का अंदेशा था या शिवराज को आइना दिखाना था  
कहा यह भी जा रहा है कि पार्टी को पूर्व से हार का अंदेशा था यही कारण है कि शिवराज को आइना दिखाने उन्हें मुख्य राडार पर रखा गया. पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सहित परदे के पीछे के कई रणनीतिकारों की भूमिका के बावजूद सामने केवल एक चेहरा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का ही बना रहा. टिकिटों के बंटवारे से भी यही सन्देश गया कि पूरी तरह शिवराज की चल रही है. शिवराज ने जिसे चाहा उसे टिकट दिलवाया. इससे जनता में यह भी मैसेज गया कि ऊपर के लोगों ने मान लिया है कि पार्टी हार रही है सो क्यों न ठीकरा शिवराज के सिर ही फोड़ा जाए. ताजा प्रतिक्रिया में चुनाव के समय 'हार रहे हैं' जैसी बातें नहीं की जातीं, कहकर संवित पात्रा ने भी इस बात पर मोहर लगा दी है.

बताया गया कि किसानों के लिए शिवराज ने बहुत काम किया है. वह राहुल गांधी के कर्ज माफी के बहकावे में नहीं आएंगे. युवाओं के साथ महिला वोट बैंक भी शिवराज की सत्ता में वापसी का मार्ग प्रशस्त करेगा, लेकिन वह नहीं हो सका. यही कारण है कि मंत्रिमंडल के उनके सहयोगी हों या फिर संगठन के पदाधिकारी सब सीमित भूमिका में ही देखे गए. एग्जिट पोल में हार के अंदेशे के बाद ही पार्टी के अन्दर से ही शिवराज के खिलाफ आबाजें उठने लगीं. बाबूलाल गौर की बातों को छोड़ भी दें तो भी बहुत कुछ कहा गया. खासकर आरक्षण को लेकर उनके दिए गए बयान 'कोई माई का लाल आरक्षण ख़त्म नहीं कर सकता' को बहुत हद तक जिम्मेदार ठहराया गया.  राज्‍यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा ने कहा कि अगर बहुमत नहीं आया तो इसकी जिम्‍मेदारी शिवराज सिंह चौहान की होगी. शिवराज के बोल 'कोई माई का लाल..' के कारण हम 10 से 15 सीट गँवा रहे हैं. 

एग्जिट पोल मध्य प्रदेश में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को सत्ता के ज्यादा करीब बताता रहा, लेकिन इसके उलट पूरे समय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने हौसले बुलंद रखे. यहाँ तक कि उन्होंने खुद को सबसे बड़ा सर्वेयर बता कर दावा किया कि एक बार फिर भाजपा की सरकार बनेगी. निश्चित ही वे उनके अपनों को नहीं पहचान पा रहे थे. उनके 13 मंत्री हारे हैं. जैसा कि कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कहा जा सकता है टिकिट वितरण में गलतियां हुईं. शिवराज का अति-आत्मविश्वास भी उन्हें ले डूबा. लेकिन हाँ, यह भी सही है अगर जीतते तो यकीनन कद भी शिवराज का ही बढ़ता. मगर ऐसा न हो सका. 


मध्यप्रदेश में 10 सभाएं करने वाले मोदी जी भी सोच अवश्य लें 
मध्यप्रदेश में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की 10 सभाएं हुई हैं. बात विदिशा सीट की करें तो शिवराज की पूरी ताकत के बाबजूद अपने गृहनगर की सीट पर वह अपने लाडले मुकेश टंडन को नहीं जीता सके. ग्वालियर, शहडोल, छिंदवाड़ा, इंदौर, झाबुआ, रीवा, मंदसौर, छतरपुर, विदिशा और जबलपुर में सभाएं कीं, लेकिन उस तरह के परिणाम नहीं आ सके. ग्वालियर में जयभान सिंह पवैया जैसे कद्दावर मंत्री हार गए. छिंदवाड़ा में वह कमलनाथ का अभेद किला भेद नहीं पाए. यहाँ से वह एक सीट भी हासिल नहीं कर सके. इंदौर की 9 विधानसभा सीटों में से भाजपा केवल 5 सीट पर ही सिमट कर रह गई. यहाँ कांग्रेस ने 4 सीट पर जीत दर्ज की. छतरपुर में भी 6 में से केवल 1 सीट पर बीजेपी जीत सकी. पास की दमोह सीट से मंत्री जयंत मलैया को हार का सामना करना पड़ा. जबलपुर में भी कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया.

पार्टी एक तंत्र की ओर 
भले ही आज देश में सरकार बीजेपी की है, लेकिन वास्तव में सत्ता कौन चला रहा है, को लेकर आम जनता में एक अलग मैसेज है. कुछ समय पहले तक जहाँ बीजेपी की जगह मोदी सरकार कहा जा रहा था, अब शाह की सरकार कहा जा रहा है. यह आंतरिक लोकतंत्र की बात करने वाली पार्टी के लिए खतरे की घंटी है. कोई एक सत्ता में रहते संगठन को इस कदर कमजोर कर दे तो और क्या कहा जाएगा? वंशवाद और समय के साथ नई पीढ़ी को सामने नहीं आने देने की गलती भी पार्टी को रास्ते से भटका रही है. यही कारण है कि मध्यप्रदेश में बाबूलाल गौर ने पार्टी को उनकी बहु कृष्णा गौर को टिकिट देने के लिए पार्टी को घुटने टेकने मजबूर कर दिया.   

कांग्रेस की एकजुटता 
जैसा कि बीजेपी के कैलाश विजयवर्गीय ने भी स्वीकार किया है मध्यप्रदेश में इस बार कांग्रेस संगठित दिखी और शुरू से ही कड़ी टक्कर देती नजर आई. गुटबाजी की अटकलों के बीच वह एकजुट बनी रही. प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ भी प्रदेश भर में खुद फोकस नहीं किये, उन्होंने जिम्मेदारियां बाँट दीं. सभी ने अपने अपने क्षेत्र पर फोकस किया. कांग्रेस की रणनीति अपने अपने तरीके से बीजेपी को चौतरफा घेरने की रही. जहाँ छिन्दवाडा पर कमलनाथ ने ज्यादा फोकस किया तो ग्वालियर चम्बल बेल्ट ज्योतिरादित्य के भरोसे छोड़ा गया. विन्ध्य की जिम्मेदारी अजय सिंह को दी गयी तो दिग्विजय सिंह को भी अपने क्षेत्र तक ही सीमित रहने को कहा गया. अरुण यादव टीम को भी अपना पूरा फोकस केवल बुधनी में रखने के लिए कहा गया. टिकिट बंटवारे में भी इसी अनुसार टिकिट वितरण किया गया. मालवा बेल्ट पर कांग्रेस के पास इस तरह से कोई बड़ा चेहरा सामने नहीं आया सो परिणाम सामने हैं कि यहाँ पार्टी को बड़ा फायदा नहीं मिल सका. 

एंटी इनकंबेंसी, आसान न होगी 2019 में सत्ता की राह
मध्यप्रदेश में बीजेपी एक लम्बे समय 15 साल से सत्ता में है सो ऐसे में एंटी इनकंबेंसी होना स्वाभाविक है, लेकिन अन्य राज्यों में जिस प्रकार के नतीजे आये हैं उससे साफ़ है कि केंद्र में बीजेपी की अल्प समय की सरकार के खिलाफ भी बड़ी एंटी इनकंबेंसी शिवराज के लिए परेशानी का बड़ा कारण बनी. सो भले ही मध्यप्रदेश में पार्टी हार का ठीकरा शिवराज के सिर फोड़ कर अपनी कमियाँ ढकने का काम कर ले, लेकिन देश भर में केंद्र सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी 2019 के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी है. विपक्ष मोदी सरकार को घेरने में लग ही गया है.  

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को 2019 के लिए सत्ता का सेमीफायनल कहा गया, लेकिन बीजेपी में अति आत्मविश्वास और एक दुसरे को कम आंकने की गलती बराबर दोहराई गई. इसी का खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा है. आगे भी यही स्थिति रही, एक दुसरे के खिलाफ षड़यंत्र किये जाते रहे, हार का ठीकरा किसके सिर फोड़ें, सोचा जाता रहा तो बीजेपी के लिए 2019 में सत्ता की राह आसान न होगी. 

कांग्रेस के लिए आगे का रास्ता और भी काँटा भरा 
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए 15 साल का वनवास ख़त्म कर लेने के लिए बहुत बहुत बधाई, लेकिन यह भी सच है कि उसके लिए आगे का रास्ता और भी काँटा भरा होगा. पहली कड़बी बात, कांग्रेस को यह अच्छे से समझ लेना चहिये कि उसका वनवास अभी ख़त्म नहीं हुआ है. कारण बीजेपी या शिवराज चुनाव हार गए हैं, का यह मतलब कतई नहीं है कि कांग्रेस जीत गई है, क्योंकि चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के बीच हो ही कहाँ रहा था? चुनाव तो शिवराज सरकार के काम मोदी सरकार के जीएसटी/नोट बंदी जैसे तुगलकी फरमानों के विरुद्ध खुद जनता खुद लड़ रही थी. कहा जा सकता है यह जो सत्ता परिवर्तन हुआ है उसमें कांग्रेस जीत गई है, ऐसा बिलकुल नहीं है. सच यही है कि जीतते तो शिवराज और हारा है कोई तो शिवराज, जो कि अति आत्मविश्वास में रहे और अपने नजदीक के लोगों को ही नहीं पहचान सके. 

हाँ, अब कांग्रेस को एक अवसर अवश्य मिल गया है कि वह प्रदेश के खाली खजाने के साथ कर्ज माफी जैसे भारी भरकम वचन कठिन चुनौतियों में कैसे पूरे करती है. कांग्रेस के लिए कुछ कर दिखाना है, का समय है. यदि कुछ कर दिखा सकी तो 2023 में उसकी जीत तय होगी. तब ही वनवास ख़त्म जैसी बात कही जा सकती है. देश भर में कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए अच्छे दिनों की शुरूआत हो चुकी दिख रही है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को इन प्रदेशों में ऐसा ही प्रदर्शन कर दिखाने की चुनौती बनी हुई है. 

अब 'कमल नहीं' 'कमल नाथ' को कुछ कर दिखाना है  
राजनीतिक विश्लेषक यह बात भी करते रहे कि कांग्रेस के पास खोने को क्या है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समय सबसे अमूल्य होता है और कांग्रेस 15 साल खो चुकी है. अब ऐसे में वह एकजुटता से सामने नहीं आती, यह चुनाव भी  हार जाती, तो वापिस 5 साल और खो देती. इसके लिए राहुल की सूझ-बूझ प्रदेश में सभी नेताओं को पर्याप्त सम्मान देकर एकजुट बनाए रखने के लिए उन्होंने कमलनाथ को चुना. मुख्यमंत्री की दौड़ में कांग्रेस से कौन नाम होगा, कहने की कोई आवश्यकता नहीं है. निश्चित रूप से पहला नाम सामने है कमलनाथ और दुसरा तीसरा चौथा नाम भी है कमलनाथ. और अब 'कमल नहीं' 'कमल नाथ' को कुछ कर दिखाना है.  


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