जस का तस


                                                                          - सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ 

कभी कभी नहीं सूझता कि 
क्या लिखुँ
तुम्हे या मुझे...!!
खुद पर लिखना नहीं आता
मेरी खामियाँ
मेरी अच्छाईयाँ
तुमसे बेहतर
कौन बयाँ कर सकता है
हाँ, तुम पर बहुत कुछ
लिख सकती हूँ मैं
जानते हो क्यों?
मैंने तुम्हारी खामियों को
अंगीकार जो कर लिया है
जो एक मधुर प्रवाह बन
उकर आती हैं
कलम रूपी दरियाँ में...!!
इश्क का यह पहला
उसूल है कि स्वीकारो
जस का तस....!!

हाँ तो लिखना कभी तुम
मुझे मेरी ख़ामियों के साथ
नज़रंदाज़ करना अच्छाईयाँ मेरी
कड़वे शब्दों में ही सही
उतार लेना कभी
अपने इश्क के पन्नों पर
मुझे जस का तस...!!

अंगीकार होते रहेंगे
हम तुम एक दूजे संग सुनो
जस के तस...!!


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