नामांतरण करने का यह मतलब नहीं कि हम किसान से फसल में हिस्सा लेने लग जाएँ




''एक वो हैं नेताजी जो टोल माँगने पर थप्पड़ जड़ देते हैं, और एक ये अधिकारी हैं, जो न केवल टोल देने को देश का टेक्स देना अपना कर्तव्य बता रही हैं, बल्कि उनका तर्क देखिये कि नामांतरण करने का यह मतलब नहीं कि हम उस किसान से फसल में हिस्सा लेने लग जाएँ.'' 
- चित्रांश 

हाल की शिवपुरी की घटना याद होगी. इसके अलावा भी अक्सर टोल नाके पर नेता लोग अपना छुटभैयापन दिखाते हैं, लेकिन डिप्टी कलेक्टर एवं भू अर्जन अधिकारी बड़बानी की बात अलग है. हाल में उन्होंने एक पुरानी घटना सोशल मीडिया पर शेयर की है, चूंकि घटना प्रेरणास्पद है सो यहाँ हमारे पाठकों के लिए प्रस्तुत की जा रही है. 

उन्होंने शेयर पोस्ट में लिखा है 
कुछ साल पहले खंडवा से सेंधवा एक विवाह कार्यक्रम में जाना हुआ. जामली टोलप्लाजा पर गाड़ी रोकी तो मैंने अपना परिचय पत्र आगे किया. संयोग से उस वक्त टोल पर NHAI का बंदा बैठा था. कार्ड खंडवा कलेक्टर से जारी था सो देखकर बोला कि ड्यूटी पर टोल से छूट है, घूमने फिरने के लिऐ नहीं है. टोल के पुराने कर्मचारी मुझे पहचानते थे, उन्होंने आकर जाने देने के इशारे भी किऐ, पर मैंने बहस न कर सौ रुपये का नोट दे दिया. उसने पिचासी रुपये काटकर रसीद और चिल्लर दे दी. 

जामली टोल से मेरी कई यादें जुड़ी हैं. टोल प्रारंभ करने में ट्रकओनर्स और स्थानीय लोगों का टोल दरों पर विरोध होने से कई बार चक्काजाम में, मैं रात में और दिन में यहाँ आई हूँ. अंत में बलपूर्वक टोल चालू करवाने में शामिल रही हूँ, जिसके फलस्वरूप सेंधवा की कई नामी हस्तियों ने एसडीएम ऑपिस के सामने प्रदर्शन कर मेरे बारे में अनर्गल बातें माईक से कहीं थी जिसकी वीडियो आज भी मेरे पास है. इसी टोल पर हमने सड़क सुरक्षा सप्ताह में ड्रायवरों को फूल बाँटे थे, यहाँ तहसीलदार की ग्रीन बेल्ट बनाई थी, जिसमें लगाए शीशम के पेड़ अब वृहद रूप ले चुके हैं. यहाँ टोल के ऑफिस परिसर में मेरे भेंट किऐ फलों के सौ पेड़ आज भी मीठे फल देते हैं. वहाँ मेरा बोर्ड आज भी है. 

टोल के सामने हनुमान जी का अधूरा मंदिर मेरे निवेदन पर टोलकर्मियों ने पूर्ण करवाकर नया रंग दिया था, जिस पर मैंने ध्वजा और प्रसादी चढ़ाई थी, आज भी है. इसके पूर्व मैनेजर श्री अमरसिहं जी मेरे राखी भाई हैं. आज भी मुझे हर पूर्णिमा को फोन कर हाल पूछते हैं. मैं भी हर रक्षाबंधन पर राखी जरूर भेजती हूँ. इतनी यादें जुड़ी हैं सो टोल देने में थोड़ी सी टीस तो हुई. खैर नियम सब के लिऐ बराबर हैं. 

शाम को वापसी में टोल पर गाड़ी जैसे ही पहुँची, टोल के कर्मचारियों ने रोक ली. बहुत इसरार किया मैम चाय लेकर जाएँ. भीतर गऐ,ऑफिस देखा, कोल्डड्रिंक ली. मेरा फलोद्यान और बोर्ड देखा. पुराने दिन याद किऐ. वापसी के लिऐ गाड़ी में बैठने लगी तो सब ने हाथ जोड़े- "मैम, आज गलती हो गई. आपकी बदौलत ये टोल चालू हुआ. आपसे टोल नहीं ले सकते. आगे से जब भी आएँ हमें पहले फोन कर दें." और फिर सौ रुपये निकाल कर सामने रखे. वापस लेने का निवेदन किया. मैंने लेने से इंकार किया. मैं देश का टैक्स दे चुकी. वापस नहीं चाहिऐ. सब गाड़ी के सामने खड़े हो गए. मैम रुपये वापस नहीं लिऐ तो जाने नहीं देंगे. उन्होंने इसरार से सौ रुपये दिऐ टोल की रसीद वापस की और हम आगे बढ़े. 
आज यूँ ही पुरानी बात याद आ गई सो शेयर कर ली.  

पोस्ट पर प्रतिक्रिया में    

Nitin Paliwal जी ने लिखा है मैडमजी, आपकी कार्यशैली अनोखी होकर प्रेरणा के समान है, लेकिन एक बात मन को चुभती है कि जब रोड का निर्माण होता है, टोल चालू करना होता है तब तक रोड विभाग के सभी अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार, ठेकेदार के कर्मचारी मेनेजर आदि सभी राजस्व विभाग के कलेक्टर से लेकर पटवारी की बात मानते हैं, अपना काम निकालने, अतिक्रमण हटाने आदि के लिए हमारे आगे पीछे घूमकर हमारी सभी बातों को मानते हैं, लेकिन एक बार जब रोड चालू हो जाता है, उसके बाद यह लोग परिचय देने के बाद भी पहचानते भी नहीं हैं तथा बुरा व्यवहार करते हैं, तब बहुत बुरा लगता है.
इसके लिए कोई कार्यवाही अवश्य होना चाहिए.


इस पर Janki Yadav Kukshi जी ने गज़ब का जबाब दिया है. 
उन्होंने लिखा है नामांतरण कर दिया तो क्या किसान से हर फसल में हिस्सा लोगे ??





Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc