मानवीय सम्वेदनाओं की चाबी सा ''अदृश्य हमसफ़र''


''विनय पंवार जी की पुस्तक ( उपन्यास ) ''अदृश्य हमसफ़र'' कल मिली, उस समय नासिरा शर्मा जी का उपन्यास ''पारिजात'' पढ़ रही थी, जिसने बांध रखा था 50 पेज तक ही पढ़ पायी, तब तक ये मिल गयी और जाने क्यों पहले आशुतोष राणा जी की टिप्पणी पढ़ते ही बरबस इसे पढ़ने में लग गयी.'' 

- सीमा "मधुरिमा" लखनऊ 

600 पन्नों की ''पारिजात'' अच्छी पर थोड़ी कठिन. ''अदृश्य हमसफ़र'' का पहला पृष्ठ पढा तो पढ़ते ही चले गए. कई पड़ाव आये जब आँखों में अश्रु थे. पूरी पुस्तक ही सम्वेदनाओं की चाबी सी है. एक के बाद एक किरदार अपना असर छोड़ते चलते हैं. इस उपन्यास को पढ़कर ऐसा प्रतीत हुआ कि हम सभी के जीवन में इस प्रकार के अदृश्य हमसफ़र सा रिश्ता कहीं न कहीं जरूर होता होगा, जो हमारे समक्ष न आकर भी हमें हर तरह से सुरक्षित और सुखी देखना चाहता होगा. 

विनय पंवार जी को बहुत बहुत बधाई इतनी सुंदरता से बुना है ''अदृश्य हमसफ़र'' का ताना बाना उन्होंने. उन्होंने अपने हर किरदार को, बखूबी जिया है. यूँ ही आपकी लेखनी समृद्ध होती रहे. अनन्त शुभकामनाएं..


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