आखिर कब तक छीने जाते रहेंगे कैमरे और हम बने रहेंगे मूक दर्शक?


''हमारे कैमरे छीन लिए जाते हैं. तोड़ दिए जाते हैं. हमें धक्का मार कर बाहर कर दिया जाता है. आखिर कब तक सहेगा यह सब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ?''

विदिशा से तोरनसिह शिल्पकार

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया को सरकार आखिर क्या सुविधाएं दे रही है. आज जो मैं यह लिखने जा रहा हूं यह हमारे अधिकारों की बात है. यह लेख मैं सभी पत्रकार भाइयों के लिए लिख रहा हूं कि हम लोग दिन रात भटक कर खबरें जनता तक पहुंचाते हैं. भूखे प्यासे रहकर सूचनाएं इकट्ठे करते हैं, लेकिन जब बात हमारे मान सम्मान और अधिकारों की आती है तो न जाने क्यों सब पीछे हट जाते हैं. 

ऑफिस से बाहर आये तो
गायब थी यह मोटर सायकिल 
एक तरफ हमें बताया गया है कि मीडिया जगत लोकतांत्रिक देश का चौथा स्तंभ है. दूसरी तरफ न जाने क्यों हमारे अधिकारों का हनन किया जा रहा है. मुद्दा एक नहीं है अनेको हैं. आज मैं अपने देश की शासन और प्रशासन से पूछना चाहता हूं कि सुविधाओं के नाम पर हमें क्या दिया है. आज तक हम लोग जब कहीं बाहर सूचनाओं के लिए जाते हैं तो हम पर टोल टैक्स लगाए जाते हैं. अगर हम टोल टैक्स के अधिकारियों से बात करते हैं कि हम मीडिया से हैं, तो हमारे पहचान पत्र फेक दिए जाते हैं. अस्पतालों में भी हमारे लिए कोई छूट नहीं है. अगर किसी खबर को कवर करते हुए वहां झगड़े में हमारे सर फूटते हैं तो इनका इलाज भी हमें खुद ही कराना पड़ता है. 

ऐसे ही अनेकों मुद्दे हैं प्रशासन भी कभी ना कभी हमसे बदतमीजी करता है. हमारे कैमरे छीन लिए जाते हैं. तोड़ दिए जाते हैं. हमें धक्का मार कर बाहर कर दिया जाता है. आखिर कब तक सहेंगे, हम यह? 

पिछले दिनों अपने साथ हुए घटना को बताना चाहता हूँ 17/09/2018 को मैं मप्र सूचना आयोग भोपाल अपील करने गया. वहा से वाईक चोरी हो गई. एफ आई आर के बाद पुलिस नही सुनती. आज 25/09/2018 तक कोई सुराग नही. इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा? और आरटीआई लगा कर किसी विभाग की जानकारी मागो तो 1 माह बाद भी जबाब नही मिलता. आप अपील करोगे तो कोई निराकरण नही. आपको तारीख जरूर मिलेगी. 

आप द्वतिये अपील करोगे 45 दिन बाद कोई जबाब नही. अधिकारी और अफसरों की धमकी भी मिलती है. यह बात आपको बताता हूं कि हम लोग भीड़ का हिस्सा नहीं हैं. हमें लगातार अपने कामों में कहीं ना कहीं बाधाएं मिलती हैं और कहीं ना कहीं हमें परेशानियों का सामना करना पड़ता है. मैं सीना ठोक कर कहता हूं कि बन कर तो देखो एक दिन का पत्रकार, जब खाने की परोसी हुई थाली सामने रखी होती है और खबर आती है कि शहर में कहीं घटना हो गई तो परोसी हुई थाली को छोड़कर भाग खड़े होना होता है. 

आखिर कब उठेगी हमारे अधिकारों के लिए आवाज? कब इकट्ठा होकर हम आंदोलन करेंगे कि मत करो हमारे कामों में दखल? हमें शांति से अपना काम करने दो, यह बात मेरे अकेले के लिए नहीं है. यह बात सभी पत्रकार भाइयों के लिए है, जो दिन रात मेहनत करते हैं और जब बात हमारे अधिकारों की आती है तो हमें जूझना पड़ता है.



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