लिखना आसाँ नहीं होता..


लिखना आसाँ नहीं होता 
पता है शब्दों को ढूँढना पड़ता है
भावों के मुताबिक़

उन्हें मनाना पड़ता है लय में आने के लिए..!!
संगीत और सुरों के बीच लय देनी पड़ती है
साज और अर्थ के साथ 
तब जाकर वह थोड़े
उकर आते हैं पन्नों पर...!!
महज़ कोरी अभिव्यक्ति को नहीं देते
वे तवज़्ज़ो
बांधना पड़ता है भावों की कसौटी पर
तब जाकर परिपक्व भाव ला पाते हैं वे
पन्नों पर....!!

अभिव्यंजना हो या मन का मुक्तक
साधना पड़ता है हर्फों को प्रार्थना में
तब उगते हैं उस सींची हुई माटी में
वाह वाही का फल देने 
और मुख़ातिब होते हैं सबसे
उन श्वेत कोरे पन्नों पर...!!

महज़ नीली या लाल स्याही से नहीं 
नज़र आते बस भावों की अभिव्यक्ति 
देनी पड़ती है रूह से 
तब जाकर ज़ेहन में बसते हैं
बन ग़ज़ल, कविता, रूबाई और गीत
तो बताओ कहाँ आसाँ होता है लिखना 
आसमानी पन्नों पर...



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