सफलता



सफलता मुझसे रूठ गई
आकर हाथों से फिसल गई
मैं ही सन्तुलन न बना पाई
न ही अंतर कर पाई
हक्कीकत और ख्वाब में
जीवन, और कर्म पथ में
रिश्तों की बुनियाद में
लड़खड़ाती कदमों से
निरन्तर चलती रही
जिंदगी की सफर कटती गई
चाहत नजरों से ओझल होती गई
कभी पैरों तले जमीं खिसकी
कभी हाथों से डोर छुटी
अब तक झूलती ही रही
पर अब दिखती नहीं 
उसकी परछाईं भी
दोपहरी में विलुप्त हुई
या रात के सन्नाटे की बलि चढ़ी
करूँ भोर का इंतजार
या चिरनिद्रा में सो जाऊँ?

  • उषालाल सिंह, पटना

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