तो छू भी सकती थी....



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कैसा साया था
जिसको छूने के लिये
मेरी उंगलियों के पोर
बस कांपते से रहे,

छू भी पाऊँगी 
या नहीं,
इसी कशमकश में
उलझी रही,
हाथ बढ़ाने की
हिम्मत .....
नहीं कर पाई कभी,

और वक्त
अपनी चाल चलता रहा 

अब सोचती हूँ
अगर हाथ बढ़ा लेती तो
छू भी सकती थी....
...
शायद
-पुष्पिंदरा चगती भंडारी 



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News Digital India 18

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