दिग्विजय सिंह के टार्गेट पर कौन, मोदी या राहुल?



''बोहरा समुदाय की अलग छवि है। अपनी हटकर वाली फितरत के चलते वह कभी तुष्टिकरण से प्रभावित होने या वोट बैंक बनने जैसे लालच के फेर में नजर नहीं आया। मोदी के गृह राज्य में इस वर्ग की खासी तादाद है। इसलिए प्रधानमंत्री के इंदौर आगमन को कम से कम दिग्विजय के चश्मे से देखने की गलती नहीं की जाना चाहिए।''

प्रकाश भटनागर 
By http://www.webkhabar.com

दिग्विजय सिंह को तमाम रूप में देखा है। सीधे-सादे कांग्रेस विधायक। अर्जुन सिंह के व्यक्तित्व तले दबे मंत्री। प्रदेश कांग्रेस में अर्जुन एंड कंपनी की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते अध्यक्ष। अवसर प्राप्त किसी अन्य कांग्रेसी की तरह बने लोकसभा सदस्य। हर रूप में एक बात साफ रही। मामले की नजाकत को समझना। समायानुकूल आचरण। फिर यही दो रूप यकायक मुख्यमंत्री के तौर पर घोर तरीके से मॉडिफाई हुए। कुछ ऐसे कि वह विधायक, मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष या सांसद जैसे अतीत की अंधी गलियों में कहीं हमेशा के लिए जा छिपा।

दस साल तक भोपाल की श्यामला हिल्स से वल्लभ भवन तक जो शख्स दिखा, वह पूरी तरह नया था। घुटा हुआ। हर तरह के प्रपंच का ज्ञाता। ताकत को कभी गुरूर तो कभी मनमानी में बदलने की कला में पारंगत। इस सबकी बदौलत दस साल में उनके सामने दुश्मन तो दुश्मन, चुनौती नजर आने वाले अपने भी खेत होते चले गए। अर्जुन सिंह से लेकर शुक्ल बंधु और जमुना देवी तक ऐसे अनंत नाम हैं। 

ऐसे बायोडाटा वाले दिग्विजय के लिए यह बात तो आसानी से हजम नहीं की जा सकती कि वह गलती से गलतियां कर रहे हैं। वह भी विराट स्तर की। उनकी ताजा दिखाई दी तथाकथित गलती की बात करें। कांग्रेस में समर्थकों के बीच वरिष्ठ और विरोधियों के बीच 'चुके हुए' सिंह ने एक नई बात कही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बोहरा समाज के धर्म गुरू के कार्यक्रम में जाने पर कटाक्ष की शक्ल में। दिग्विजय सिंह ने ट्विट किया, 'कुर्सी का लालच जो ना कराए। जो व्यक्ति रोजे इफ्तार से एतराज करता था वो अब मस्जिद-मस्जिद धूम रहा है।' मोदी के शॉल ओढ़ने पर सवाल उठाते हुए सलाह दी है कि प्रधानमंत्री अल्पसंख्यकों के लिए पूर्वाग्रहों को त्याग दें।

इसका अंजाम वही हुआ, जो सिंह के बटाला हाउस प्रसंग, शहीद हेमंत करकरे कांड, मुस्लिमों की बजाय हिंदुओं के अधिक आतंकवादी होने संबंधी बयान, किसी अल्पसंख्यक आतंकी के लिए सम्माजनक संबोधन के प्रयोग का प्रहसन आदि-आदि का हुआ था। वह सोशल मीडिया पर बुरी तरह ट्रोल हो रहे हैं। लोग जमकर उनकी खिंचाई करते दिखते हैं और एक बारगी यह गलतफहमी फिर हो जाती है कि इस सबसे सिंह भविष्य के लिए शायद कोई सबक ले लें। 

हालांकि ऐसा सोचना निरी मूर्खता का प्रतीक ही होगा। क्योंकि सबक किसी गलती पर लिया जाता है, सोद्देश्य की गई गलती पर नहीं। और दिग्विजय जो करते आए हैं तथा कर रहे हैं, उसके पीछे किसी उद्देश्य की प्रेत छाया सहज ही दिख जाती है। सियासत को ओढ़ने से लेकर बिछाने तक की फितरत में रचा-बसा शख्स यह सब अनजाने में नहीं करेगा। फिर जब बात दिग्विजय की हो तो शत-प्रतिशत यकीन के साथ कहा जाता है कि ऐसा पूरी तरह होशो-हवास में ही किया जाएगा।  हां, पड़ताल का अहम विषय यह है कि होशो-हवास में जो कुछ किया गया, वह किसके होश उड़ा देने की कोशिश है। 

सिंह ने मोदी-विरोधी ट्वीट ऐसे समय किया, जब समूची कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व की सतनामी चादर के भीतर समाने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी का तथाकथित जनेऊ भले ही सार्वजनिक रूप से सामने न दिखा हो, लेकिन उन्हें गुजरात सहित कर्नाटक के मंदिर-मंदिर जाते और कैलाश मानसरोवर की दुर्गम यात्रा करते तो सब ने देखा ही है। यानी पार्टी तुष्टिकरण वाली अपनी छवि से पीछा छुड़ाने का जतन कर रही है। लेकिन दिग्विजय का इकलौता यही ट्वीट सारे किए-कराए पर पानी फेर देने में पूरी तरह सक्षम है, क्योंकि लोगों ने जवाब में राहुल गांधी को ही टार्गेट किया है। राहुल गांधी राफेल से लेकर माल्या तक के मुद्दों पर मोदी सरकार को घेर रहे हैं। लेकिन दिग्विजय सिंह ने घुमाफिराकर राहुल को वहीं खड़ा कर दिया जहां उनके हिन्दू होने न होने, या मुस्लिम प्रेमी होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हिन्दुओं में जातियों के बीच तलवारें खिंची हैं, इसका कांग्रेस और विपक्ष को फायदा है। उसकी रणनीति है। लेकिन जातियों में बंट रहे हिन्दुओं को फिर हिन्दू बनाने की कोशिश आखिरकार दिग्विजय सिंह कर ही लेंगे।

ट्रोल की सूरत में वह जिस तरह बूमरेंग का शिकार हुए, वह बताता है कि कांग्रेस को इससे मुश्किल होने जा रही है। सत्यव्रत चतुवेर्दी आज पंगत पे संगत में दिग्विजय के बगल में खड़े दिखते हैं। लेकिन बहुत मुमकिन है कि आज उन्हें अपनी वह चेतावनी फिर याद आ रही हो कि कांग्रेस को जिस भी राज्य में विधानसभा चुनाव जीतना हो, वहां से दिग्विजय को दूर रखा जाए। चतुवेर्दी ने सोनिया गांधी के कांग्रेस की अध्यक्ष रहते हुए यह हिदायत दी थी। जो पार्टी के शुभचिंतकों को एक बार फिर मौजू लग ही रही होगी। 

बोहरा समुदाय की अलग छवि है। अपनी हटकर वाली फितरत के चलते वह कभी तुष्टिकरण से प्रभावित होने या वोट बैंक बनने जैसे लालच के फेर में नजर नहीं आया। मोदी के गृह राज्य में इस वर्ग की खासी तादाद है। इसलिए प्रधानमंत्री के इंदौर आगमन को कम से कम दिग्विजय के चश्मे से देखने की गलती नहीं की जाना चाहिए। यकीनन वोट की खातिर मोदी सहित भाजपा के कई नेताओं ने भी चोले बदलने की  शुरूआत की है। किंतु दिग्विजय द्वारा जानबूझ कर की गई एक भूल ने फिर कांग्रेस-विरोधी मतों का भाजपा के पक्ष में धुर्वीकरण करने का रास्ता तैयार कर दिया है। और यह गलती अभी वो करते रहेंगे। कमलनाथ के लिए यह अपने इस मित्र से सावधान होने का समय है। 

Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc