घुमक्कड़ व्यक्ति समाज को बहुत कुछ दे जाते हैं

वर्ल्ड टूरिज्म डे 27 सितम्बर पर विशेष 


''घुमक्कड़ स्वभाव का व्यक्ति धीरे धीरे कई संस्कृतियों का ज्ञानी हो जाता है. वो खुले दिल का हो जाता है. कई समाजों की मान्यताओं को देखता, सुनता, और समझता है. ऐसे व्यक्ति समाज को कुछ न कुछ देकर ही जाते हैं.''
- सीमा "मधुरिमा" लखनऊ 

घूमना अर्थात घर से बाहर निकलना, अपने आप में एक आत्मविश्वास दे देता है. आज इस आधुनिक समय में भी मेरी कई जानने वाली महिलाओं की स्थिति ये है कि अगर कोई खरीदारी करनी है चाहे वो छोटी मोटी ही क्यों न हो, घर से बाहर अकेले निकलना सोच कर ही उनके हाथ पैर फूलने लगते हैं.

कई बार व्यक्ति को मजबूरी के चलते घूमना पड़ता है. जैसे नौकरी की माँग आदि. ऐसे में व्यक्ति को घर से बाहर निकलने से ही चिढ़ हो जाती है. अगर व्यक्ति उसको अलग नजरिये से देखने लगे तो यही नौकरी उसको वरदान साबित हो सकती है.

विद्यवान राहुल सांकृत्यायन जी तो घूमने के अवसर को एक प्रसाद की तरह मानते थे. उनका कहना था जो आपकी घुमक्कड़ी में बाधा बन रहा है, उससे बड़ा दुश्मन आपका कोई नहीं. अर्थात घुमक्कड़ जिज्ञासा घुमक्कड़ी पसन्द करने वालों को अवश्य पढ़नी चाहिए, जो अपने आप में एक वेद समान है.

घुमक्कड़ स्वभाव का व्यक्ति धीरे धीरे कई संस्कृतियों का ज्ञानी हो जाता है. वो खुले दिल का हो जाता है. कई समाजों की मान्यताओं को देखता, सुनता, और समझता है. ऐसे व्यक्ति समाज को कुछ न कुछ देकर ही जाते हैं.

प्राचीन काल में तीर्थों की स्थापना देश के चारों कोनों में इसी कारण की गई थी कि सभी स्थानों पर जाकर उनकी संस्कृति और सभ्यता को करीब से देखा समझा जा सके. और उससे समुचित लाभ हासिल किया जा सके. 

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