एक अजीब सा प्रश्न




''गलतफहमियों'' का सामना,
एक दिन "दिमाग" से हो गया,
दुर्भाग्यवश पैदा हुआ, "शक",
"अनर्गल" प्रश्न, यूँ ही हो गया।

प्रश्न था "दिमाग ठीक तो हैना"?
सोचती हैं हम कहें या, कहें ना,
दिमाग सुनकर स्तब्ध हो गया,
पलभर को लगा जैसे खो गया।

संभलकर कहा, इतनी मजाल,
कि, मुझे तुम कर सको हलाल,
तुमने स्वार्थ से ही सब पाया है,
मेरी सेवा से ही जीवन आया है।

जब मेरी सेवाऐं "ठहर" जाएंगी,
गलतफहमियां लुप्त हो जाएंगी,
किसी भावुक दिल से भी, अब,
कभी यह प्रश्न, मत कर देना,
वरना हमेशा के लिए मर जाएंगी,
तुम्हारे लिए बसी सारी संवेदना।

गलतफहमियां निःशब्द सी हो गईं
यूँ लगा जैसे वे, दफन हो, खो गईं।

                                      
 - डॉ. दिनेश पाठक



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