भारत बंद का मध्यप्रदेश में व्यापक स्तर पर असर, दुकानें बंद, सड़कों पर जम कर प्रदर्शन





एससी-एसटी एक्ट को फिर से लागू किए जाने अध्यादेश लाने के सरकार के निर्णय के खिलाफ आयोजित किए गए भारत बंद का असर मध्यप्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ सहित बिहार में व्यापक स्तर पर देखने मिल रहा है. मध्यप्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्यों में शीघ्र ही 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं. मध्यप्रदेश के कई जिलों में बड़ी बड़ी रैलियाँ निकाली गई है. दुकानें बंद कर दी गई हैं और लोग सड़कों पर जम कर प्रदर्शन कर रहे हैं. 

मध्य प्रदेश के 35 जिले हाई अलर्ट पर हैं. सुरक्षा बलों की 34 कंपनियों को तैनात किया गया है. कुछ जिलों में धारा 144 लागू है. ग्वालियर में ड्रोन कैमरे के जरिए प्रदर्शनकारियों पर नजर रखी जा रही है. ग्वालियर में तैनात एसडीएम का कहना है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि केंद्र की नीतियों से सवर्ण समाज को नुकसान पहुंच रहा है.     


मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बोल 'कोई माई का लाल' आरक्षण खत्म नहीं कर सकता को लेकर भी लोगों में खासा आक्रोश है. लोग टी शर्ट्स पर 'हम हैं माई के लाल' लिख कर प्रदर्शन में भाग ले रहे हैं. 
  




बिहार के दरभंगा में भारत बंद का व्यापक असर देखने को मिल रहा है. इसके साथ ही मुंगेर में प्रदर्शनकारी रेल की पटरियों पर जहां वो सरकार के इस फैसले की खिलाफत कर रहे हैं. बिहार के मोकामा में प्रदर्शनकारियों ने टायर जलाकर अपने विरोध को दर्ज कराया. इसके साथ ही रास्तों पर भी जाम कर दिया. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार सवर्ण समाज के लोगों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों कर रही है. 

बिहार के आरा में बंद समर्थकों ने ट्रेन को रोक दिया है. इसके साथ ही बाजारों को भी बंद कराया है. सवर्ण समाज का कहना है कि केंद्र सरकार का इस तरह के डॉरकोनियन एक्ट को वापस लेना चाहिए.  20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता जाहिर की थी. कोर्ट ने इस कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज होते ही किसी की तुरंत गिरफ्तारी करने पर रोक लगा दी थी. साथ ही गिरफ्तारी के बाद अग्रिम जमानत का प्रावधान भी कर दिया था. 

कोर्ट के इसी फैसले के बाद एससी/एसटी वर्ग सड़कों पर उतर आया. बाद में केंद्र सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2018 संसद में पारित कराना पड़ा. सरकार के इस फैसले पर अब सवर्णों में नाराजगी है.




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