आशिक मिजाज लोगों के लिए खुशखबरी, धारा 497 खत्म, विवाहेत्तर संबंध बनाना अब अपराध नहीं




''सुप्रीम कोर्ट ने 157 साल पुराने कानून धारा 497 को खत्म कर उन महिला और पुरुषो को छूट दे दी है, जो शादी-शुदा होने के बाद भी आपसी सहमति से संबंध बनाते थे. अब इस मामले में महिला या पुरुष किसी पर कोई कानूनी कार्यवाही नही होगी, जबकि पहले इसमें पकड़े जाने पर सजा होती थी.'' 
-आकाश नागर    

भारत के संविधान का ज्यादातर हिस्सा भारत सरकार अधिनियम 1935 से ज्यों का त्यों नकल कर लिया गया है. इसलिये ज्यादातर कानून अंग्रेजों के द्वारा बनाये हुये आजाद भारत में भी लागू हैं. भारत की अपराध दंड संहिता यानी आईपीसी लिखने वाले लॉर्ड बैंबिंगटन मैकाले चाहते थे कि विवाह संबंध में अगर पत्नी और किसी ‘वो’ के बीच संबंध बन जाएं, तो इसे अपराध न माना जाए. 


आईपीसी बनने से पहले देश में नागरिकों के लिए कोई लिखित कानून नहीं था और परंपरा से न्याय होता था. जब मैकाले के सामने विवाह संबंधी अपराधों को कोडिफाई करने की बारी आई, तो उनके सामने यह प्रश्न आया कि पत्नी के साथ किसी बाहरी व्यक्ति के यौन संबंध यानी व्यभिचार को अपराध माना जाए या नहीं.

मैकाले ने भारत के अपने सीमित अनुभवों के आधार पर माना कि जब कोई किसी की पत्नी को भगा ले जाता है, या उसके साथ यौन संबंध बनाता है तो यह दंडनीय अपराध नहीं है. मैकाले ने पाया कि ज्यादातर मामलों में पीड़ित पक्ष यानी पति चाहता है कि उसकी पत्नी उसे वापस मिल जाए या फिर उसे इसका आर्थिक मुआवजा मिले. मैकाले की चलती तो आईपीसी में व्यभिचार को दीवानी मामला माना जाता और रुपए-पैसे के आधार पर फैसले होते.

मैकाले की इस मामले में नहीं चली और व्यभिचार को आईपीसी में अपराध मान लिया गया और भारतीय कानूनों में धारा 497 जुड़ गई. व्यभिचार से संबंधित आईपीसी की धारा 497 में यह प्रावधान है कि अगर कोई पुरुष किसी विवाहिता स्त्री से, बिना पत्नी की सहमति से, यौन संबंध बनाता है तो उस पुरुष को पांच साल तक की कैद की सजा या आर्थिक दंड या दोनों की सजा हो सकती है.

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