सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 हटाई, देश हुआ समलैंगिग फ्री




''अमेरिका में तो सेना में समलैंगिक सैनिकों का भर्ती पर लगी रोक को हटाकर इसे प्रोत्साहित किया गया है. मगर भारत में यह अब भी सम्मान, संस्कृति और प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय है. हमारा समाज अब भी इसे एक बीमारी के तौर पर देखता है, जबकि ग्रथों और उपनिषदों तक में समलैंगिकता एवं अप्राकृतिक यौन संबंधों का जिक्र है.''
- आकाश नागर 



धारा 377 अंग्रेजों द्वारा बनाया गया कानून है. जो 1862 में लिखा गया था. जिसमें साफ-साफ जिक्र है कि, "धारा 377 अप्राकृतिक अपराध है. जब कोई भी स्वेच्छा से प्रकृति के विपरीत किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ स्वेच्छा से शारीरिक संबंध स्थापित करता है तो उसे उम्र कैद की सजा होगी या फिर एक अवधि, जो दस साल तक बढ़ाई जा सकती है, की कैद होगी और उसे जुर्माना भी देना होगा.

इस धारा के अंतर्गत अपराध को संज्ञेय बनाया गया है. इसमें गिरफ्तारी के लिए किसी प्रकार के वारंट की जरूरत नहीं होगी. शक के आधार पर या गुप्त सूचना का हवाला देकर पुलिस इस मामले में किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है. यह एक गैरजमानती अपराध है."

अब ग़ौर करने वाली बात यह है कि जिन अंग्रेज़ों ने यह कानून लिखा उनके देश में अब ऐसा कोई कानून नहीं है. वहां 377 को कानूनी तौर पर खारिज कर दिया गया है. और सिर्फ इंग्लैंड में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई और देश जैसे, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, कनाडा, स्पेन, न्यूजीलैंड,डेनमार्क, अर्जेंटीना, स्वीडेन, पुर्तगाल आदि देशों समलैंगिकता को मान्यता प्राप्त है.

यही नहीं अमेरिका में तो सेना में समलैंगिक सैनिकों का भर्ती पर लगी रोक को हटाकर इसे प्रोत्साहित किया गया है. मगर भारत में यह अब भी सम्मान, संस्कृति और प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय है. हमारा समाज अब भी इसे एक बीमारी के तौर पर देखता है, जबकि ग्रथों और उपनिषदों तक में समलैंगिकता एवं अप्राकृतिक यौन संबंधों का जिक्र है.

वात्स्यान ने जो वर्षों पूर्व कामसूत्र लिखा उसमें भी समलैंगिकता के कई दृश्य लिखे गए हैं. आप ख़ुजराहो की मूर्तियों को करीब से देखेंगे तो पाएंगे कई मूर्तियों देवियां ही एक दूसरे के साथ रति-क्रिया करती नज़र आएंगी. समलैंगिकता भी उतनी ही प्राकृतिक है जितने की एक वयस्क पुरुष और स्त्री के बीच स्थापित होने वाले शारीरिक सम्बन्ध. यह कोई बीमारी नहीं है कि जिसे इलाज द्वारा ठीक किया जा सके.

  नोट : आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं, इसमें हमारी सहमति हो आवश्यक नहीं. 




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