मुझे कहा गया 'मास्टर स्ट्रोक' में न मोदी का नाम लूं, न ही उनकी तस्वीर दिखाऊं: पुण्य प्रसून बाजपेयी


''अपने इस लेख में मास्टर स्ट्रोक कार्यक्रम के एंकर रहे पुण्य प्रसून बाजपेयी उन घटनाक्रमों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं, जिनके चलते एबीपी न्यूज़ चैनल के प्रबंधन ने मोदी सरकार के आगे घुटने टेक दिए और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.''

क्या ये संभव है कि आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम न लें. आप चाहे तो उनके मंत्रियों का नाम ले लीजिए. सरकार की नीतियों में जो भी गड़बड़ी दिखाना चाहते हैं, दिखा सकते हैं. मंत्रालय के हिसाब से मंत्री का नाम लीजिए, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ज़िक्र कहीं ना कीजिए.

लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी ख़ुद ही हर योजना का ऐलान करते हैं. हर मंत्रालय के कामकाज से ख़ुद को जोड़े हुए हैं और उनके मंत्री भी जब उनका ही नाम लेकर योजना या सरकारी नीतियों का ज़िक्र कर रहे हैं तो आप कैसे मोदी का नाम ही नहीं लेंगे.

अरे छोड़ दीजिए… कुछ दिनों तक देखते हैं क्या होता है. वैसे आप कर ठीक रहे हैं… पर अभी छोड़ दीजिए.

भारत के आनंद बाज़ार पत्रिका समूह के राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज़ के प्रोपराइटर जो एडिटर-इन-चीफ भी हैं उनके साथ ये संवाद 14 जुलाई को हुआ.

यूं तो इस निर्देश को देने से पहले ख़ासी लंबी बातचीत ख़बरों को दिखाने, उसके असर और चैनल को लेकर बदलती धारणाओं के साथ हो रहे लाभ पर भी हुई.

एडिटर-इन-चीफ ने माना कि ‘मास्टरस्ट्रोक’ प्रोग्राम ने चैनल की साख़ बढ़ा दी है. ख़ुद उनके शब्दों में कहें तो, ‘मास्टरस्ट्रोक में जिस तरह की रिसर्च होती है… जिस तरह ख़बरों को लेकर ग्राउंड ज़ीरो से रिपोर्टिंग होती है. रिपोर्ट के ज़रिये सरकार की नीतियों का पूरा खाका रखा जाता है. ग्राफिक्स और स्क्रिप्ट जिस तरह लिखी जाती है, वह चैनल के इतिहास में पहली बार उन्होंने भी देखा.’

तो चैनल के बदलते स्वरूप या ख़बरों को परोसने के अंदाज़ ने प्रोपराइटर व एडिटर-इन-चीफ को उत्साहित तो किया पर ख़बरों को दिखाने-बताने के अंदाज़ की तारीफ़ करते हुए भी लगातार वह ये कह भी रहे थे और बता भी रहे थे कि क्या सब कुछ ऐसे ही चलता रहे और प्रधानमंत्री मोदी का नाम न हो तो कैसा रहेगा?

ख़ैर, एक लंबी चर्चा के बाद सामने निर्देश यही आया कि प्रधानमंत्री मोदी का नाम अब चैनल की स्क्रीन पर लेना ही नहीं है.

तमाम राजनीतिक ख़बरों के बीच या कहें सरकार की हर योजना के मद्देनज़र ये बेहद मुश्किल काम था कि भारत की बेरोज़गारी का ज़िक्र करते हुए कोई रिपोर्ट तैयार की जा रही हो और उसमें सरकार के रोज़गार पैदा करने के दावे जो कौशल विकास योजना या मुद्रा योजना से जुड़ी हो, उन योजनाओं की ज़मीनी हक़ीक़त को बताने के बावजूद ये न लिख पाएं कि प्रधानमंत्री मोदी ने योजनाओं की सफलता को लेकर जो दावा किया वह है क्या?

यानी एक तरफ़ प्रधानमंत्री कहते हैं कि कौशल विकास योजना के ज़रिये जो स्किल डेवलपमेंट शुरू किया गया उसमें 2022 तक का टारगेट तो 40 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग देने का रखा गया है, पर 2018 में इनकी तादाद दो करोड़ भी छू नहीं पायी है.

और ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि जितनी जगहों पर कौशल विकास योजना के तहत केंद्र खोले गए उनमें से हर 10 में से 8 केंद्र पर कुछ नहीं होता. तो ग्राउंड रिपोर्ट दिखाते हुए क्यों प्रधानमंत्री का नाम आना ही नहीं चाहिए?

तो सवाल था मास्टरस्ट्रोक की पूरी टीम की कलम पर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शब्द ग़ायब हो जाना चाहिए पर अगला सवाल तो ये भी था कि मामला किसी अख़बार का नहीं बल्कि न्यूज़ चैनल का था.

यानी स्क्रिप्ट लिखते वक़्त कलम चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न लिखे लेकिन जब सरकार का मतलब ही बीते चार बरस में सिर्फ़ नरेंद्र मोदी है तो फिर सरकार का ज़िक्र करते हुए एडिटिंग मशीन ही नहीं बल्कि लाइब्ररी में भी सिर्फ़ प्रधानमंत्री मोदी के ही वीडियो होंगे.

और 26 मई 2014 से लेकर 26 जुलाई 2018 तक किसी भी एडिटिंग मशीन पर मोदी सरकार ही नहीं बल्कि मोदी सरकार की किसी भी योजना को लिखते ही जो वीडियो या तस्वीरों का कच्चा-चिट्ठा उभरता उसमें 80 फीसदी प्रधानमंत्री मोदी ही थे.

यानी किसी भी एडिटर के सामने जो तस्वीर स्क्रिप्ट के अनुरूप लगाने की ज़रूरत होती उसमें बिना मोदी के कोई वीडियो या कोई तस्वीर उभरती ही नहीं.

और हर मिनट जब काम एडिटर कर रहा है तो उसके सामने स्क्रिप्ट में लिखे, मौजूदा सरकार शब्द आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही तस्वीर उभरती और आॅन एयर ‘मास्टरस्ट्रोक’ में चाहे कहीं भी प्रधानमंत्री मोदी शब्द बोला-सुना ना जा रहा हो पर स्क्रीन पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर आ ही जाती.

तो ‘मास्टरस्ट्रोक’ में प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर भी नहीं जानी चाहिए, उसका फ़रमान भी 100 घंटे बीतने से पहले आ जाएगा, ये सोचा तो नहीं गया पर सामने आ ही गया. और इस बार एडिटर-इन-चीफ के साथ जो चर्चा शुरू हुई वह इस बात से हुई कि क्या वाकई सरकार का मतलब प्रधानमंत्री मोदी ही है.

यानी हम कैसे प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर दिखाए बिना कोई भी रिपोर्ट दिखा सकते हैं. उस पर हमारा सवाल था कि मोदी सरकार ने चार बरस के कार्यकाल के दौरान 106 योजनाओं का ऐलान किया है. संयोग से हर योजना की ऐलान ख़ुद प्रधानमंत्री ने ही किया है. हर योजना के प्रचार-प्रसार की ज़िम्मेदारी चाहे अलग-अलग मंत्रालय पर हो, अलग-अलग मंत्री पर हो, लेकिन जब हर योजना के प्रचार-प्रसार में हर तरफ़ से ज़िक्र प्रधानमंत्री मोदी का ही हो रहा है तो योजना की सफलता-असफलता पर ग्राउंड रिपोर्ट में भी ज़िक्र प्रधानमंत्री का रिपोर्टर-एंकर भले ही न करे लेकिन योजना से प्रभावित लोगों की ज़ुबां पर नाम तो प्रधानमंत्री मोदी का ही होगा और लगातार है भी.

चाहे किसान हो या गर्भवती महिला, बेरोज़गार हो या व्यापारी. जब उनसे फसल बीमा पर सवाल किया जाए या मातृत्व वंदना योजना या जीएसटी या मुद्रा योजना पर पूछा जाए या फिर योजनाओं के दायरे में आने वाला हर कोई प्रधानमंत्री मोदी का नाम ज़रूर लेता है. कोई लाभ नहीं मिल रहा है, अगर कोई ये कहता तो उनकी बातों को कैसे एडिट किया जाए. तो जवाब यही मिला कि कुछ भी हो पर ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर-वीडियो भी मास्टरस्ट्रोक में दिखायी नहीं देना चाहिए.’

वैसे ये सवाल अब भी अनसुलझा सा था कि आख़िर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर या उनका नाम भी जुबां पर न आए तो उससे होगा क्या, क्योंकि जब 2014 में सत्ता में आई बीजेपी के लिए सरकार का मतलब नरेंद्र मोदी है और बीजेपी के स्टार प्रचारक के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी ही हैं.

संघ के चेहरे के तौर पर भी प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी हैं, दुनिया भर में भारत की विदेश नीति के ब्रांड अंबेसडर नरेंद्र मोदी हैं, देश की हर नीति के केंद्र में नरेंद्र मोदी हैं तो फिर दर्जन भर हिंदी राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों की भीड़ में पांचवें-छठे नंबर के राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल एबीपी के प्राइम टाइम में सिर्फ घंटेभर के कार्यक्रम ‘मास्टरस्ट्रोक’ को लेकर सरकार के भीतर इतने सवाल क्यों हैं? या कहें वह कौन सी मुश्किल है जिसे लेकर एबीपी न्यूज़ चैनल के मालिकों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह प्रधानमंत्री मोदी का नाम न लें या फिर तस्वीर भी न दिखाए.

दरअसल मोदी सरकार में चार बरस तक जिस तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रधानमंत्री मोदी को ही केंद्र में रखा गया और भारत जैसे देश में टीवी न्यूज़ चैनलों ने जिस तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ उनको ही दिखाया और धीरे-धीरे प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर, उनका वीडियो, उनका भाषण किसी नशे की तरह न्यूज़ चैनलों को देखने वाले के भीतर समाता गया.

उसका असर ये हुआ कि प्रधानमंत्री मोदी ही चैनलों की टीआरपी की ज़रूरत बन गए और प्रधानमंत्री के चेहरे का साथ सब कुछ अच्छा है या कहें अच्छे दिन की ही दिशा में देश बढ़ रहा है, ये बताया जाने लगा तो चैनलों के लिए भी यह नशा बन गया और ये नशा न उतरे इसके लिए बाकायदा मोदी सरकार के सूचना मंत्रालय ने 200 लोगों की एक मॉनिटरिंग टीम को लगा दिया गया.

बाकायदा पूरा काम सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के एडिशनल डायरेक्टर जनरल के मातहत होने लगा, जो सीधी रिपोर्ट सूचना एवं प्रसारण मंत्री को देते और जो 200 लोग देश के तमाम राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों की मॉनिटरिंग करते हैं वह तीन स्तर पर होता. 150 लोगों की टीम सिर्फ़ मॉनिटरिंग करती है, 25 मॉनिटरिंग की गई रिपोर्ट को सरकार के अनुकूल एक शक्ल देती है और बाकि 25 फाइनल मॉनिटरिंग के कंटेंट की समीक्षा करते हैं.

उनकी इस रिपोर्ट पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तीन डिप्टी सचिव स्तर के अधिकारी रिपोर्ट तैयार करते और फाइनल रिपोर्ट सूचना एवं प्रसारण मंत्री के पास भेजी जाती. जिनके ज़रिये पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी सक्रिय होते और न्यूज़ चैनलों के संपादकों को दिशा निर्देश देते रहते कि क्या करना है, कैसे करना है.

और कोई संपादक जब सिर्फ़ ख़बरों के लिहाज़ से चैनल को चलाने की बात कहता है तो चैनल के प्रोपराइटर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय या पीएमओ के अधिकारी संवाद कायम करते या बनाते.

दबाव बनाने के लिए मॉनिटरिंग की रिपोर्ट को नत्थी कर फाइल भेजते और फाइल में इसका ज़िक्र होता कि आख़िर कैसे प्रधानमंत्री मोदी की 2014 में किए गए चुनावी वादे से लेकर नोटबंदी या सर्जिकल स्ट्राइक या जीएसटी को लागू करते वक़्त दावों भरे बयानों को दोबारा दिखाया जा सकता है. या फिर कैसे मौजूदा दौर की किसी योजना पर होने वाली रिपोर्ट में प्रधानमंत्री के पुराने दावे का ज़िक्र किया जा सकता है.

दरअसल मोदी सत्ता की सफलता का नज़रिया ही हर तरीके से रखा जाता रहा है. इसके लिए ख़ासतौर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से लेकर पीएमओ के दर्जन भर अधिकारी पहले स्तर पर काम करते हैं.
दूसरे स्तर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्री का सुझाव होता है, जो एक तरह का निर्देश होता है और तीसरे स्तर पर बीजेपी का लहज़ा, जो कई स्तर पर काम करता है. मसलन अगर कोई चैनल सिर्फ़ मोदी सत्ता की सकारात्मकता को नहीं दिखाता है या कभी-कभी नकात्मक ख़बर करता है या फिर तथ्यों के सहारे मोदी सरकार के सच को झूठ क़रार देता है तो फिर बीजेपी के प्रवक्ताओं को चैनल में भेजने पर पाबंदी लग जाती है.
यानी न्यूज़ चैनल पर होने वाली राजनीतिक चर्चाओं में बीजेपी के प्रवक्ता नहीं आते हैं. एबीपी पर ये शुरुआत जून के आख़िरी हफ्ते से ही शुरू हो गई. यानी बीजेपी प्रवक्ताओं ने चर्चा में आना बंद कर दिया.
दो दिन बाद से बीजेपी नेताओं ने चैनल को बाईट देना बंद कर दिया और जिस दिन प्रधानमंत्री मोदी के ‘मन का बात’ का सच ‘मास्टरस्ट्रोक’ में दिखाया गया उसके बाद से बीजेपी के साथ-साथ आरएसएस से जुड़े उनके विचारकों को भी एबीपी न्यूज़ चैनल पर आने से रोक दिया गया.
तो ‘मन की बात’ के सच और उसके बाद के घटनाक्रम को समझ उससे पहले ये भी जान लें कि मोदी सत्ता पर कैसे बीजेपी का पैरेंट संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी निर्भर हो चला है.
इसका सबसे बड़ा उदाहरण 9 जुलाई 2018 को तब नज़र आया जब शाम चार बजे की चर्चा के एक कार्यक्रम के बीच में ही संघ के विचारक के तौर पर बैठे एक प्रोफेसर का मोबाइल बजा और उधर से कहा गया कि वह तुरंत स्टुडियो से बाहर निकल आएं और वह शख़्स आॅन एयर कार्यक्रम के बीच ही उठ कर चल पड़ा.
फोन आने के बाद उसके चेहरे का हावभाव ऐसा था मानो उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है या कहें बेहद डरे हुए शख़्स का जो चेहरा हो सकता है वह उस वक़्त में नज़र आ गया.

पर बात इससे भी बनी नहीं क्योंकि इससे पहले जो लगातार ख़बरें चैनल पर दिखायी जा रही थीं उसका असर देखने वालों पर क्या हो रहा है और बीजेपी के प्रवक्ता चाहे चैनल पर न आ रहे हों पर ख़बरों को लेकर चैनल की टीआरपी बढ़ने लगी. और इस दौर में टीआरपी की जो रिपोर्ट 5 और 12 जुलाई को आई उसमें एबीपी न्यूज़ देश के दूसरे नंबर का चैनल बन गया.
द वायर से 


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