सत्तर वर्षीय चरवाहे जागेश्वर ने ली पशु नस्ल सुधार की जिम्मेदारी





''सतना जिले में मझगवां जनपद के ग्राम देवलहा के 70 वर्षीय जागेश्वर यादव ने अपनी सूझबूझ से पूरे गाँव के पशुओं की नस्ल सुधार की जिम्मेदारी ली है। उन्हें यह जिम्मेदारी पूरी करने में पशुपालन विभाग के नस्ल सुधार कार्यक्रम में भरपूर मदद मिली है। अब जागेश्वर चरवाहा नहीं है, पशुओं की नस्ल सुधारने वाले गाँव के डॉक्टर बन गये हैं।''

बुढ़ापे में जीवन को नई उमंग देना कोई सत्तर वर्षीय श्री जागेश्वर यादव से सीखे। वनस्पति से आच्छादित खाली पड़े जंगल-जंगल घूमते यादव इस उम्र में भी चरवाहे का काम कर रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर आने के बावजूद उन्होंने अपने जीवन की धारा अपने परिवार से जोड़े रखी है। जागेश्वर के हौंसले व उत्साह के आगे तमाम शारीरिक बाधाएं बौनी साबित हो गईं हैं। यूं तो वे शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं। 


हमारे समाज में जहां परिवार को बांटने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जाती, वहीं सतना जिले के मझगवां जनपदीय अंचल के ग्राम देवलहा के जागेश्वर यादव आज भी अपने परिवार को संयुक्त परिवार में बांधे हुए हैं। उनके तीन पुत्र हैं, जो खेतीबाड़ी से जुडे़ हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद जागेश्वर आज भी अपने परिवार की मदद के सामाजिक दायित्वों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाए हैं और पुत्रों के मना करने के बावजूद चरवाहे का सफर तय कर रहे हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने यह सोचकर कि क्यों ना परिवार की अधिक आर्थिक मदद की जाए और गॉव की भैंसों में नस्ल सुधार किया जाए, पशुपालन विभाग से गौ-भैंस वंशीय उन्नत नस्ल सुधार कार्यक्रम के तहत अस्सी प्रतिशत अनुदान पर मुर्रा नस्ल का एक भैंसा प्राप्त कर लिया, ताकि वह परिवार की और अधिक आर्थिक मदद कर सकें। 

मजे की बात यह है कि जागेश्वर भैंसे की देखभाल, उसकी खिलाई-पिलाई ठीक उसी तरह करते हैं, जिस तरह अपने बच्चों की कर रहे हैं। ये भैंसा उन्नत नस्ल के वत्स पैदा करने के उद्देश्य से गर्भाधान के लिए दिये जाते हैं और भैंसों के गर्भाधान से कम से कम माह में बीस हजार रूपये कमा लेते हैं। उन्होंने अपने कई नाती-पोतों की शादियां भी अपनी कमाई से कराई हैं। 

परिवार की आजीविका अच्छी चलने से चेहरे पर सुकून लिए कई आरजुओं के साथ परिवार की आय में हाथ बंटाने वाले जागेश्वर प्रसन्न आंखों से कहते हैं- ‘‘भैंसा जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। इससे परिवार की आय कई गुना बढ़ गई है। परिवार को सुखी बनाने में इसका महत्व कम नहीं हैं। इस भैंसे की कमाई से घर के कई खर्च उठाए जा रहे हैं। साथ ही इससे नस्ल सुधार भी हो रहा है।’’ सतना के उप संचालक पशु चिकित्सा डॉ.  राजेश मिश्रा कहते हैं, ‘‘जिले में अनुदान पर कई ब्यक्तियों को उन्नत नस्ल के भैंसे दिए गए हैं। ये भैंसे लोगों की आजीविका चलाने के साथ-साथ नस्ल सुधारने में भी योगदान देते हैं।’’ 

आज के दौर में भी जागेश्वर का लक्ष्य है कि नई पीढ़ी अच्छे संस्कार, सामाजिक सरोकार सीखे, संयुक्त परिवार संरक्षण के प्रति सचेत रहे तथा वयोवृद्ध लोग परिवार को बांधे रखने के लिए अपने एक नए जीवन की शुरूआत करें, कभी भी थकान महसूस ना करें, क्योंकि पीढ़ी सुधार का काम उन्हीं का है। 




Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc