मृत्युभय और इम्यून सिस्टम


''स्वस्थ वही होगा, जो प्रसन्नचित होगा. अपने आपको वृद्ध मानना और वैसा ही आचरण करना सबसे अधिक नुकसान करता है. अगर आप खुद को वृद्ध नहीं मानते हैं, तब आपका शरीर भी जवानों की फुर्ती रखने में कामयाब रहता है.''

-सतीश सक्सेना
कई लोग सवाल करते हैं कि इम्यून सिस्टम को मजबूत कैसे करें? इसके जवाब में आधुनिक सिस्टम और मेडिकल व्यवसाय के अनुसार वही टोटके बताये गए हैं, जो हर मालदार आसामी को कहे जाते हैं जैसे खूब सारे फ्रूट्स, सब्जियां, मेवा और प्रोटीन आदि खाइये और बीमारियों से दूर रहिये. अगर इनकी बात पर विश्वास करें, तब गरीब आदमी, मेहनतकश मजदूर आदि जो सूखी रोटी खाते हैं, उनमें इम्यून सिस्टम शायद सबसे कमजोर ही होता होगा, जबकि ऐसा नहीं है. एक गरीब रिक्शे वाला 50 वर्ष की उम्र में 150 किलो के दो तोंदवालों को बिठाकर दिन भर 100 km से अधिक चलता है और देर रात घर पंहुचने पर खाने के नाम पर उसे 4 रोटी और दाल मिलती है. सुबह फिर रिक्शा लेकर अपने काम पर.

शुरू के दिनों में जब मैं अपने कमजोर मन और शरीर के साथ लड़ रहा था, तब यही प्रश्न अल्ट्रा रनर एवं कई बार के आयरन मैन अभिषेक मिश्रा से पूछा था कि एक हाफ मैराथन रनर, जो 60 वर्ष का हो, उसे क्या खाना चाहिए, तो अभिषेक का जवाब था कि यह सब बेकार के चोचले हैं, आप वही खाइये जो साधारण लोग खाते हैं. दाल सब्जी रोटी और मौसमी फल और आपका शरीर इनसे ही भरपूर शक्ति ले लेगा.

अधिक उम्र में इम्यून सिस्टम बढ़ाने के लिए 
सबसे पहले अपने आप को हंसना सिखाइये. जो कि बीमारी के भय और नकारात्मक विचारों के साथ जीते हुए व्यक्ति के लिए मुश्किल होता है. मैं ऐसे तमाम लोगों को जानता हूँ, जो अपने विगत सम्मान का ढिंढोरा पीटते हैं और अपने चेहरे को पेंट करने में ही अधिकतर समय बिताते हैं. ऐसे लोग कुछ समय में ही निढाल हो जायेंगे. सम्मान की चाहत ही, बुढापे की निशानी है और यह अधिकतर परिपक्व अवस्था में ही आती है. किसी बच्चे को किशोर अवस्था तक, आपने सम्मान के लिए प्रयासरत नहीं देखा होगा. सम्मान योग्य कर्म कीजिये और उसके बदले में बिना आशा किये उसे भुला दीजिये. अगर वह कार्य विशुद्ध मन से किया होगा तो अपने निशान अवश्य छोड़ेगा, जिसे लोग अपनाएंगे भी. यही सच्चा सम्मान होगा, चाहे आपके सामने मिले या पीठ पीछे.

स्वस्थ वही होगा, जो प्रसन्नचित होगा. अपने आपको वृद्ध मानना और वैसा ही आचरण करना सबसे अधिक नुकसान करता है. कुछ लोग अधिक उम्र में अपना गुणगान, अपने किये गए कार्यों का बखान, और सम्मान की चाहत में, कमउम्र संगति में गंभीरता ओढ़े रहते हैं. यह बड़प्पन ही आपको वृद्ध बनाने के लिए काफी है. आपको समझना होगा कि सम्मान वह नहीं, जो किसी के द्वारा दिया जाए, यह सिर्फ खुद को भुलावे में रखने का आधार मात्र है. ऐसे लोग चेहरे पर आयी झुर्रियों से मुक्ति नहीं पा सकते.

अगर आप खुद को वृद्ध नहीं मानते हैं, तब आपका शरीर भी जवानों की फुर्ती रखने में कामयाब रहता है. खुद को दी गयी मजबूत सलाह और आत्म विश्वास ही बेहतर प्रतिरक्षा शक्ति की कुंजी है, सो मेडिकल व्यवसाय द्वारा दिया ज्ञान भूलकर, बीमारी को लाइलाज न मानकर, मात्र शारीरिक प्रतिक्रिया मानिये, जो कुछ दिन में सामान्य हो जायेगी और ऐसा करते समय मृत्युभय न रखें, अन्यथा स्वस्थ होने में रूकावट आएगी.

उत्साह का मर जाना मृत्यु, और उत्साह का होना ही जवानी है, अपने ऊपर विश्वास के साथ नए कार्य सीखने का उत्साह होना सबसे आवश्यक है. अगर ऐसा नहीं कर पा रहे तो आप नकारात्मक व्यक्तित्व के साथ जवान बनने का प्रयास कर रहे हैं. सामाजिक वर्जनाओं को आँख बंद कर न अपनाएँ, लोग क्या कहेंगे कि इस उम्र में..... जैसे सुझावों से मुक्ति पाएं और मन को प्रसन्न रखने के लिए तैरना, झूला झूलना, साईकिल चलाना, और दौड़ना सीखना, नए फैशन के कपडे पहनना शुरू करें. शारीरिक एक्टिविटी जिसमें शरीर के हर अंग में कम्पन हो, व्यायाम हो उसमें लिप्त होना सबसे अधिक आवश्यक है. रनिंग जैसी एक्टिविटी आपको दीर्घ और स्वस्थ आयु दिलाने में समर्थ है.

अपने जीवन में कोई बैरियर न लगायें, मैं यह नहीं खा सकता मुझे यह पसंद नहीं. वह हर चीज खाइए जो विश्व में खायी जाती हो और उसे एन्जॉय करते हुए खाएं वेज, नॉन वेज, बियर, व्हिस्की, कॉफी,चाय, मिठाई, नमकीन मगर गुलाम किसी का न बनें. जो दिल करे खाइए बच्चों की तरह प्रसन्न चित्त होकर खाइए.

अंत में भीष्म प्रतिज्ञा जैसी इच्छा शक्ति का विकास करें कि मैं अपना जीवन 100 वर्ष तक चाहता हूँ और वह भी मजबूती के साथ और यह मैं लेकर रहूँगा. इस वरदान को लेने के लिए मंदिर जाकर ईश्वर की तपस्या आवश्यक नहीं है, बल्कि बिना मेडिकल व्यवसाइयों के उपचार और टेस्ट के अपने मन को मजबूत भरोसा दिलाना ही, शरीर को सौ वर्ष ज़िंदा रखने के लिए पर्याप्त होगा.

विश्व में वे लाखों व्यक्ति पूरे 100 वर्ष जिए हैं, जिन्होंने जीवन में मृत्यु का भय दिलाने, विभिन्न बीमारियों का नाम और ज्ञान देने वाले व्यवसाइयों से मिलने में परहेज रखा.

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