सुर्खियाँ बटोरते चित्रों के पीछे की हकीकत, हेलमेट और सीट बेल्ट के नाम पर शहरों में मची है खुली लूट




''हेलमेट के साथ वाहन चलाने का निवेदन करते हुए यातायात पुलिस. अक्सर इस तरह के चित्र सुर्खियाँ बटोरते हैं. अच्छी पहल बताया जाता है, लेकिन सच अलग है.''



दो पहिया वाहन चालकों से हेलमेट के नाम पर और चार पहिया मालिकों से सीट बेल्ट के नाम पर देश भर के शहरों में खुली लूट मचा रखी है. ये लोग अपनी जेब भरने में लगे रहते हैं. ऊपर से प्रेशर पड़ता है कि इतने चालान चाहिए ही, तब रसीद काटते हैं और तब किसी की कोई मजबूरी नहीं समझते. 
इनके लिए हेलमेट जरूरी नहीं खाकी वर्दी जो पहने हैं..
चेकिंग में यह भी नहीं देखा जाता कि कौन किस तरह वाहन चला रहा है या लायसेंस है या नहीं वाहन के पेपर्स की भी कोई जांच तब ही होती है जब कोई इनके मांगे रुपये देने में आना कानी करे. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल हो या कोई और शहर बहुत तेज फर्राटे भरते वाहन ख़ास कर दोपहिया आप कभी भी देख सकते हैं, जो दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं, लेकिन उससे इन्हें कोई मतलब नहीं होता. 

कितने ही बड़े अक्षरों में लिख लो रेलवे वालों, यह नहीं ठहरेंगे..., क्योंकि यह क़ानून से ऊपर हैं. इन पर कोई क़ानून कैसे लागू  हो सकता है !!!
इसके अलावा हेलमेट और सीट बेल्ट की आवश्यकता शहर की अपेक्षा शहर के बाहर हाइवे पर ज्यादा है, लेकिन वहां चेक करने की कोई व्यवस्था नहीं है. कहा जा सकता है हेलमेट और सीट बेल्ट की चेकिंग शुद्ध रूप से अवैध वसूली है. जब आवश्यकता लगे खड़े हो जाओ और भरने लगो अपनी जेब...
सीट वैल्ट का महत्त्व हाइवे पर अधिक  है,
जहाँ कभी कोई चेकिंग नहीं होती...

- चित्रांश 




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