कटु सत्य, यदि तेल और तेल की धार को न समझते तो अटल जी मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य होते


''यह कटु सत्य है कि यदि वो सक्रिय रहे होते तो उनकी भी स्थिति 2014 के चुनाव के बाद मात्र मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य के रूप में होती. कारण उम्र का तकाज़ा और उनकी नरम पंथी सोच के कारण वर्तमान शासन या शासक से पटरी नहीं बैठ पाती, जैसा आडवाणी जी, जोशी जी, सिन्हा द्वय, आज़ाद आदि का हश्र हुआ उनका भी होता.''

- डॉक्टर अरविन्द जैन 
आदरणीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी की मृत्यु ने देश को झकझोर दिया. लगभग १० वर्षोंसे बीमारियों के कारण अचेतावस्था में रहे, जिनकी ओजस्वी वाणी सुनने लोग लालायित रहते थे वे उससे वंचित रहे. देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद तक पहुंचने के बाद स्वेच्छा से सक्रिय राजनीति से सन्यास लिया और वे भविष्य द्रष्टा के कारण उन्हें अपनी स्थिति का मूल्यांकन कर लिया था और उम्र के दराज़ पर उनका निर्णय बहुत ही सार्थक रहा जिससे भविष्य में होने वाली प्रतिकूल परिस्थतियों से/विवादों से मुक्त रहे कारण वे तेल और तेल की धार को समझते थे.

उसका मुख्य कारण वे मनसा ,वचन और कर्मणा पर भरोसा रखते थे .उम्र का तकाज़ा और तात्कालिक स्थितिओं का मूल्यांकन कर अनुभव के आधार पर उन्होंने सक्रियता से विराम लिया और अपना जीवन अनुभवों और समय के साथ जुगाली करते हुए विश्राम करना उचित समझा. उनको समझ में आ गया था कि पार्टी में अब नए युग की शुरुआत करने नए लोगों को बागडोर सौपों और उन्होंने स्वयं किनारा कर लिया. 

वे अपने जीवन में अधिकतम सफल रहे और असफलता को उन्होंने कभी भी मन मष्तिष्क पर बोझ नहीं बनने दिया. उनका व्यक्तित्व इतना उदार, साफ सुथरा, पारदर्शी रहा कि उनको सबने स्वीकारा और वे सबके सर्वमान्य रहे. उनका सुदीर्घ कार्यकाल जितना जीवंत रहा उतना ही दूसरों को प्रेरणादायक रहा. वे विपक्ष में रहते हुए भी सत्ता से जुड़े रहे कारण उनका अनुभव बहुत बृहद था जिस कारण तत्कालीन शासकों को भी उनसे सलाह मशवरा लेना पड़ता था और उन्होंने देश हित में उचित परामर्श दिया जो स्वीकार्य रहा.

वैसे तो उनकी उपलब्धियों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है और उन्होंने यथा नाम तथा गुण को चरितार्थ किया. वैसे हर सिक्के के दो पहलु होते हैं, पर हम उनके उजले पक्ष पर ही प्रकाश डालेंगे. उन्होंने दूरदृष्टि को मद्दे नज़र रखते हुए सक्रिय राजनीति से सन्यास लिया या बीमारियों के कारण अशक्त होने से वे राजनीति की मुख्य धारा से कट गए या काट दिए गए, पर यह कटु सत्य है कि यदि वो सक्रिय रहे होते तो उनकी भी स्थिति 2014 के चुनाव के बाद मात्र मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य के रूप में होती. कारण उम्र का तकाज़ा और उनकी नरम पंथी सोच के कारण वर्तमान शासन या शासक से पटरी नहीं बैठ पाती, जैसा आडवाणी जी, जोशी जी, सिन्हा द्वय, आज़ाद आदि का हश्र हुआ उनका भी होता.

आज वे सक्रिय न होने से और अस्वस्थ होने से वर्तमान राजनीति से दूर रहे, अन्यथा वे भी उसी पंक्ति में होते और उनका इतना सम्मान न हो पाता. कारण वे सत्ता में रहते हुए भी कार्यप्रणाली के कारण सत्ता के विपक्ष में होते, क्योकि जो बात उन्हें पसंद नहीं होती, उसका वे खुले मन से विरोध या समझाइश देते, जो अंतरपीढ़ी को स्वीकार नहीं होती और वे आलोचना, समालोचना के शिकार होते और उससे उनकी प्रतिष्ठा पर भी आंच आती. पर उनका मौन/चुप रहना उनके लिए वरदान रहा.

गूंगे की किसी से लड़ाई नहीं होती और अचेतन मन और मौन तो कभी कभी वरदान भी या ही बन जाता है. ऐसे युग पुरुष धरा पर बहुत विरले आते हैं, जो सर्वमान्य हो वो भी जीते जी. मरने के बाद तो विश्लेषण या पोस्ट मार्टम का चलन है.

उनकी दिव्य आत्मा सद्गति प्राप्त करे यही ईश्वर से प्राथना करता हूँ और उनके परिवार को सहन शक्ति इस अपूरणीय क्षति के लिए दे और हम इंतज़ार करें कि उन जैसा चरित्रवान युगपुरुष पुनः देश में जन्म ले. ॐ शांति शांति शांति 

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1 comments:

  1. Nonsense.. Your perception is surrounded all about Modi hateness. Atalji came to know that he should take retirement from politics because new comers should get the opportunity and get prepared for forthcoming challenges of Indian politics. Right decision at right time.
    unki durdrashti ka aap anuman bhi nahi laga sakte. Ve pad k lalchi nahi the, jesa ki Aaj k neta hote hai, panv kabra me hai or baithna kursi par hi hai.
    Hope you understood it.

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