इन खास दिनों में कुछ भी अपवित्र नहीं होता, यही बताने अचार डाल रही हूं

प्रेरक कार्य   

दादीजी-नानानी-चाची-काकी-बुआ-आंटी जी सुनिए ना...माँ-सासू माँ सुनो ना...बिटिया समझो...सदियों से एक परंपरा चल रही है। परंपरा उन खास दिनों में छुआ-छूत की। परंपरा रसोई में नहीं जाने की। गलत सलाह, महावारी से हो आचार-बड़ी-पापड़ मत छूना खराब हो जाएगी। बनाने की तो सोचना ही मत, अपवित्र हो जाएगी। फफूंद लग जाएगी। सारी मेहनत बेकार जाएगी। चूल्हा-चौका ना करिओ...सब नाश हो जाएगा। कितना सच है ये मैं हर महीने बताऊंगी, क्योंकि माँ-सासू माँ में इन खास दिनों में ही आचार डाल रही हूं।
मां, मैं जानती हूं हाइजीन का पाठ इतना पढ़ाया है आपने, मेरा अचार कभी खराब नहीं होगा। मैंने अच्छे से मर्तबान धोया है। माइक्रोवेव में पानी की हर बूंद खत्म होने तक सुखाया है। हींग का धुआं भी दिया है अपनी बर्नी में। सरसों का तेल भी गरम करने के बाद ठंडा करके ही अचार में डाला है, आपकी हर सलाह मानी है बस एक बात नहीं मानी कि उन खास दिनों में अचार नहीं छूते। आपको पता है मेरी संगीता ने भी एक बार मुझे रोका, लेकिन मेरे समझाने पर वो भी मान गई। उसका कहना है कि आप करो...फिर मैं भी उन दिनों की छुआ-छूत छोड़ दूंगी।
माँ-काकी-बुआ-चाची सब सुनिए ना... जब मेरी संगीता समझ सकती है तो आप क्यों नहीं। मैं सबको बताना चाहती हूं कि इन खास दिनों ने ही हमें माँ होने का गौरव दिया है। मैं इन खास दिनों को बेहद प्यार करती हूं क्योंकि ये हर पल मुझे मेरे नारी होने का अहसास दिलाते हैं। इन खास दिनों में कुछ भी अपवित्र नहीं होता बस यही बताना चाहती हूं...इसलिए अचार डाल रही हूं...हर माह इसी तारीख को अपनी आचार की बर्नी दिखाऊंगी...ताकि विश्वास को भी विश्वास हो मेरे पिता की सीख का....
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