संजू : BAD BOY हमेशा डरता है


''खोजी पत्रकारिता ना होती, टाडा जैसा सख्त कानून नहीं होता तो बॉलीवुड आज तक अंडरवर्ल्ड की गिरफ्त में ही होता। डॉन-भाई जैसे गुंडें-मवाली उसमें काला पैसा लगाकर सफेद करते औऱ मुंबई बम धमाकों की तरह ना जाने कहां-कहां हमारी धरती लाल होती। गलती से ही सही, कभी तो जान की बाजी लगाने वाले पत्रकारों को सलाम कह दीजिए।''



- श्रुति अग्रवाल 

कल रात संजू फिल्म देखी, फिल्म की समीक्षा शायद नहीं, क्योंकि वक्त हो गया रिलीज हुए... मीडिया को निशाना बनाया गया है। इतना जरूर कहूंगी पापारात्सी (पहले कभी स्वतंत्र फोटोग्राफरों का कहा जाता था, अब मुख्यधारा में भी मजबूरी है) और खोजी पत्रकार में बहुत अंतर होता है, जिसे इस फिल्म में कॉकटेल की तरह पेश करने की भूल की गई है। पेज 3 की खबरों को मुख्य बता पेज-1 पर छपी खबरों की धार कुंद करने की कोशिश की गई। 1993-94 के समय मीडिया जगत से बेहद दूर, खेल औऱ पढ़ाई में जीने वाली लड़की थी, लेकिन अपने वरिष्ठों से बात करके इतना अवश्य समझ में आय़ा है, खोजी पत्रकारिता ना होती, टाडा जैसा सख्त कानून नहीं होता तो बॉलीवुड आज तक अंडरवर्ल्ड की गिरफ्त में ही होता। डॉन-भाई जैसे गुंडें-मवाली उसमें काला पैसा लगाकर सफेद करते औऱ मुंबई बम धमाकों की तरह ना जाने कहां-कहां हमारी धरती लाल होती। गलती से ही सही, कभी तो जान की बाजी लगाने वाले पत्रकारों को सलाम कह दीजिए। 

यदि पत्रकार सिर्फ पापारात्सी होते, पेज-3 भरते रहते तो आए-दिन यह खबर आम ना होती कलम का एक और सिपाही सरेआम मार डाला गया....हत्या कर दी गई उसकी...सबके न्याय के लिए लड़ने वाले के परिवार के साथ मिलकर इंसाफ के लिए लड़ने वाला कोई नहीं रहा। याद रखिएगा, आज भी आधे से ज्यादा पत्रकारों के बच्चे सरकारी या बेहद औसत दर्जे के स्कूल में पढ़ते हैं, माँ-पिता का इलाज सरकारी अस्पतालों में होता है। चंद हजार रुपयों की तनख्वाह में वे रात के दो बजे तक अखबार में अपने बीवी-बच्चों की आंखों की चमक फूंकते हैं, सुकून की नींद जाया करते हैं ताकि सुबह आपके हाथ में आने वाले अखबार की स्याही ताजी रहे।"

अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर " BAD BOY हमेशा डरता है !" बहुत छोटी तो ना थी, 11-12 साल के लगभग उम्र होगी। एक लड़का था, पहलवान जैसा। उससे स्कूल के टीचर्स भी डरते थे। पिता का रुतबा साथ था, वो भी कुछ धाकड़ सा लगता था। मैंने उसकी शिकायत करने की कोशिश की तो मेरे बैग से कॉपियां निकाल खराब करना, साइकिल से हवा निकालना, हर तरह से परेशान करना शुरू हो गया। एग्जाम से ठीक पहले कॉपी खो गई...माथा खराब था। पापाजी से कहा- जवाब मिला, जाओ खुद निपटो उससे। मैंने हिचकते हुए कहा वो BAD BOY है। फिर जवाब मिला, तभी तो कह रहा हूं, जाओ निपटो उससे। याद रखो- BAD BOY हमेशा डरता है ! गलत करने वाले लोग बाहर से जितने भी मजबूत दिखें अंदर से सिर्फ डरपोक ही होते हैं। अगले दिन मैं पापाजी के बताए तरीके से निपटी...तब से लेकर अब तक विश्वास कायम है बैड बॉय हमेशा डरते हैं।

अब जरा फिल्म संजू को गौर से देखिए....उसमें मुख्य किरदार हमेशा डरता है। सफल माता-पिता की सफलता से डर है इसलिए थाली में परसी हुई फिल्म के शॉट में पिता के डांटने से डरता है। हममें से कौन है जिसने अपने पिता की डांट ना खाई हो। मैं झूठ नहीं बोलती, मैंने तो मार भी खाई है....उनकी डांट और मार ने ही मुझे सही औऱ गलत का अंतर समझाया है। बैड बॉय डरता है इसलिए गलतियों पर पर्दा डालने के लिए ड्रग्स लेता है। मरणासन्न माँ के सामने ड्रग्स लेने से नहीं चूकता। ऐसे सिक्स पैक किस काम के जो आप हर गुंडे से डरते रहें। उसके यहां हाजरी लगाने के लिए तैयार रहें। इससे तो सफेद सूती कमीज पहने वह मध्यमवर्गीय भला जिसे अपनी कमाई पर गुमान है। जो अपनी कमाई से परिवार को सर उठाकर जीने का हौंसला देता है। बैड बॉय हैं, अंडरवर्ल्ड के चक्कर में फंस चुके हैं इसलिए गुलशन कुमार हत्याकांड डराता है, रोशन परिवार बंदूक की गोली खा लेता है। जिसे नहीं झुकना होता उसे कोई झुका भी नहीं सकता। 

शहद और चाशनी का मुलम्मा उतारकर देखिए तो सिर्फ एक बात समझ में आती है.... जो गलत है, वही डर से भरा है। इसलिए जब भी आपका बच्चा पहली गलती करें.... उसके साथ बैठें, समझाएं जरूरत पड़े तो डांटे बहुत जरूरत पड़े तो ही हाथ उठाएं, लेकिन सबके सामने नहीं। उसे समझाएं कि वह बैड ना बनें, क्योंकि आज वह गलत बनकर दूसरों को कुछ पल के लिए डरा सकता है। बाकि जिंदगी उसे डर-डर कर डर के भयावह साये में ही बितानी होगी। समझाएं अपने बच्चों को कि गलत करने से बचें, यह गलतियां उसे भले ही बाहर से मजबूत बना दें, अंदर से वह निहायती डरपोक बनेगा। उसकी गलत बातों को पोषित ना करें। 

संजू देखते समय मुझे खलनायक याद आ गई...जहां एक माँ कहती है, मुझे अपने बच्चे को उसी समय थप्पड़ मारना था जब उसने पहली पेंसिल चुराई। हर पालक को वक्त एक मौका देता है जब वह अपने बच्चे को बैड बनने से बचा सकते हैं। यदि वह पालक सुनील दत्त जैसा महान हो तो वह अपने बच्चे के गलतियों को सुधारने के लिए वक्त से लड़ जाता है, लाठी की मदद से चल लेता है लेकिन घुटने नहीं टेकता। फिल्म के बाद मैं सुनील दत्त साहब को ज्यादा चाहने लगी हूं, रणबीर एक फ्रेम में भी रणबीर लगे ही नहीं।

वैसे संजू फिल्म की समीक्षा एक लाइन में करना हो तो यह फिल्म 'बाबा की बापूगिरी' जैसी ही है, वही किताब जो शुरू के दृश्य में आपके जेहन में डाली जाती है फिल्म के अंत में लगता है आपने 3 घंटे में एक मनोरंजक किताब पढ़ ही डाली।


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