फ़िक्र मत करो


फ़िक्र मत करो 
सब चलता है 

सूरज डूबा उगते-उगते 
क्षुब्ध उषा को ठगते-ठगते 
अचल धरा हो चंचल धँसती 
लुटी दुपहरी बचते-फँसते
सिंदूरी संध्या है श्यामा 
रजनी को 
चंदा छलता है 
फ़िक्र मत करो 
सब चलता है 

गिरि-चट्टानें दरक रही हैं 
उथली नदियाँ सिसक रही हैं 
घायल पेड़-पत्तियाँ रोते 
गुमसुम चिड़ियाँ हिचक रही हैं
पशु को खा 
मानव पलता है 
फ़िक्र मत करो 
सब चलता है 

मनमर्जी कानून हुआ है 
विधि-नियमों का खून हुआ है 
रीति-प्रथाएँ विवश बलात्कृत 
तीन-पाँच दो दून हुआ है 
हाथ तोड़ पग 
कर मलता है 

- संजीव वर्मा सलिल 

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