इस बार विकास की लहर उसके गाँव की तरफ आ रही है, हरिया को समझाया गया था, बड़ी बड़ी इमारतें बनेंगी..


''कहीं इतनी ट्रेनें चल रही हैं कि यात्री नहीं मिल रहे सो घाटे में हैं, वहीं बहुत अधिक ट्रेनों में यात्री भारी भीड़ में पार्सल डिब्बे में सफर करते देखे जा सकते हैं..''

ज हरिया बहुत गुस्से में था. पिछले तीन दिनों से उसके बेटे की तबियत खराब थी, पर उसे उसका मालिक छुट्टी नहीं दे रहा था. उसे याद आने लगा जब 20 वर्ष पहले उसके गाँव की तरफ कुछ लोग आए, तीन दिन लग सबने सर्वेक्षण किया और गाँव के सभी लोगों को समझाया कि उन सबको गर्व होना चाहिए, इस बार विकास की लहर उसके गाँव की तरफ आ रही है. सबको समझाया गया जब विकास होगा, बड़ी बड़ी इमारतें बनेंगी, बहुत काम होगा तो गावँ के लोगों को ही फायदा होगा और सबको रोजगार मिलेगा. गाँव की भोली भाली जनता बहुत खुश थी, उनको बताया गया था उनकी जमीनों के दाम भी बढाकर दिए जाएंगे.

हरिया सोचे ही जा रहा था, कुछ भी तो बदलाव नहीं आया गाँव के लोगों में और नहीं तो ठेकेदार ने सबको शराब पिलाकर उसका आदी जरूर बना दिया.
ठेकेदार कभी भी समय से पैसा नहीं देता. बोलता है ऊपर से पैसे देर से मिलते हैं और ठेकेदार का खुद का परिवार देखते देखते कितना सम्पन्न हो गया.



इन गगनचुंबी इमारतों के बनने में कितने ही मजदूरों ने पसीना बहाया और तो और हरिया को वो दिन भी याद आने लगा, जब काम करते वक़्त पाँच मजदूर इन्हीं इमारतों से गिर के मर गए. आज तक उनके परिवार को न तो कोई मुआवजा दिया गया और न ही कोई बड़ा अफसर उनके घर मिलने ही गया. आज हरिया ने सोच लिया था अगर ठेकेदार ने उसको बेटे की दवाई के लिए पैसे और छुट्टी नहीं दिया तो न तो वो इन लोगों के लिए काम करेगा और न ही अपने गाँव वालों को ही करने देगा.

@ लखनऊ से सीमा "मधुरिमा"


और इसी पर देखें एक यह रिपोर्ट भी-    

ग्रामीणों ने कहा पहले बिजली, पानी दवा दो, 
नई योजनायें कमीशन खोरी के लिए?

अहमदावाद से मुम्बई के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की योजना पर पानी फिरता दिख रहा है. बजह यह है कि इस पर सरकार ने होम वर्क ही ठीक से नहीं किया है. महाराष्ट्र के पालघर जिले के आदिवासी और फल उत्पादक इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं. 73 गाँव के करीब 3000 ग्रामीणों का कहना है कि बुलेट ट्रेन चलाने के लिए जमीन चाहिए तो विस्थापितों को मुआवजे के साथ अस्पताल डॉक्टर और बिजली पानी जैसी सुविधाएं पहले देना होंगी. 

इसी के साथ देश भर में इस बात का विरोध उठ रहा है कि पहले जो पूर्व से चल रही हैं उन ट्रेनों में व्यवस्थाएं तो ठीक से कर दो. लोगों का यह भी कहना है कि नई नई योजनायें कमीशन खोरी के लिए लाई जाती हैं, बाद में उन पर से ध्यान हटा कर उन्हें राम भरोसे छोड़ दिया जाता है. 

सरकार जहां मुंबई से अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की योजना पर आगे बढ़ रही है, वहीं एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) आवेदन के जरिए यह जानकारी मिली है कि इस क्षेत्र की ट्रेनों में 40 फीसदी सीटें खाली रहती हैं, और इससे पश्चिम रेलवे को भारी नुकसान हो रहा है. मुंबई के कार्यकर्ता अनिल गलगली को मिले आरटीआई के जवाब में पश्चिम रेलवे ने कहा है कि इस क्षेत्र में पिछले तीन महीनों में 30 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, यानी हर महीने 10 करोड़ रुपये का नुकसान. गलगली ने कहा कि यह बुलेट ट्रेन परियोजना की व्यवहार्यता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है, चाहे जब भी इसका निर्माण किया जाए. उन्होंने कहा, "भारत सरकार अतिउत्साह में बुलेट ट्रेन परियोजना पर एक लाख 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने जा रही है, लेकिन उसने अपना होमवर्क ठीक से नहीं किया है."

भारतीय रेलवे ने यह भी स्वीकार किया कि इस क्षेत्र में उसकी कोई नई ट्रेन चलाने की योजना नहीं है, क्योंकि यह पहले ही घाटे में है. गलगली द्वारा पूछे गए प्रश्न कि दोनों शहरों के बीच की ट्रेनों की कितनी सीटें भरी होती हैं? पश्चिम रेलवे ने बताया कि पिछले तीन महीनों में मुंबई-अहमदाबाद क्षेत्र की सभी ट्रेनों में 40 फीसदी सीटें खाली रही हैं, जबकि मुंबई-अहमदाबाद के बीच चलने वाली ट्रेनों की 44 फीसदी सीटें खाली रही हैं.  पश्चिम रेलवे के मुख्य वाणिज्यिक प्रबंधक मनजीत सिंह ने आरटीआई के जवाब में मुंबई-अहमदाबाद-मुंबई मार्ग की सभी प्रमुख ट्रेनों की सीटों की जानकारी दी. इसमें दुरंतो, शताब्दी एक्सप्रेस, लोकशक्ति एक्सप्रेस, गुजरात मेल, भावनगर एक्सप्रेस, सुरक्षा एक्सप्रेस, विवेक-भुज एक्सप्रेस और अन्य ट्रेनें शामिल हैं. 

कहीं इतनी ट्रेनें चल रही हैं कि यात्री नहीं मिल रहे सो घाटे में हैं, वहीं बहुत अधिक ट्रेनों में यात्री भारी भीड़ में पार्सल डिब्बे में सफर करते देखे जा सकते हैं..




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