सरल नहीं होती न्याय की लड़ाई, आन्दोलन के बाद उपजे सवाल...





''जो हुआ उसे छोड़ो. होता है कभी कभी ऐसा भी. आओ सभी मतभेद, बैर-भाव, वैमनस्य भुला कर अगले आन्दोलन की रुपरेखा तैयार करते हैं और समाज के किसी पीड़ित या पीड़िता को न्याय दिलाकर इंसान होने और इंसानियत को बचाने की कसम खाते हैं.''




त्तराखंड के तराई क्षेत्र खासकर रुद्रपुर, दिनेशपुर, गदरपुर, काशीपुर, किच्छा, सितारगंज और खटीमा में मेरे दोस्तों का एक बेहतरीन नेटवर्क है, जो अपने जीवन यापन के साथ ही समाजसेवा में बढचढकर भाग लेते रहते हैं. कहीं पर किसी के साथ अन्याय होता है तो यह सारे लोग एकजुट होकर न्याय की लड़ाई लडते हैं. कौमी एकता को बनाए रखने के साथ ही भाईचारा कायम करने के लिए भी यह लोग समय-समय पर समरसता यात्रा भी निकालते रहते हैं. थिएटर के जरिए लोगों में सामाजिक बुराई का बहिष्कार कराने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. इसके अलावा कलम की लेखनी से भी भ्रष्टाचार और घपले-घोटालों का पर्दाफाश करने में इनको महारत हासिल है. मेरी ज्यादातर खोजी खबरों के सूत्रधार भी यही लोग होते हैं.


खैर हम बात कर रहे हैं ऐसी ही एक खबर की. गत दिनों औधोगिक शहर रूद्रपुर में हुए एक आन्दोलन, जिसमें जिला चिकित्सालय के एक हडडी विशेषज्ञ डा राजीव चौहान पर एक महिला मरीज ने छेडछाड करने का आरोप लगाया था. महिला ने इस बाबत जब अपने पति को बुलाया तो मामला काफी आगे बढ़ गया. पुलिस ने आरोपी डॉक्टर को गिरफ्तार करने की बजाय पीड़िता के पति और उसके दोस्त को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया. पीड़िता अपने साथ न्याय की गुहार लगा रही थी. ऐसे में महिलाओं की एकजुटता हुई और गांधी चौक में धरना-प्रदर्शन करने का फैसला किया गया.

सबसे पहले ऊषा जैन जुड़ीं. उषा ने हीरा जंगपांगी को, तो हीरा ने सरोज ठाकुर को धरने में शामिल होने के लिए बुलाया. इसी तरह अनिता पंत ने अपर्णा को बुलाया. सभी महिलाओं ने एकजुटता प्रदर्शित कर पुलिस और प्रशासन को पीड़िता के साथ न्याय की मांग करके घेराबंदी कर दी. इसी दौरान राजस्थान से आई सरिता ने तो हरिद्वार से आई वंदना गुप्ता ने भी आन्दोलन को तेज कर दिया, हालांकि एक दिन, रात के समय मैं भी अपने संवाददाता मोनू चौपड़ा के साथ धरने पर बैठा. पत्रकार रूपेश कुमार सिंह, सुनील पंत, सुशील गाबा सहित कई लोग धरने में शिरकत करने पहुंचे थे. उसके बाद कोर्ट कार्यवाही की बात कहकर अचानक ही रात में बिना पूर्व सूचना के ही धरना समाप्त कर दिया गया, जो लोग धरने में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे, वह धरना समाप्त होते समय मीडिया द्वारा खीचे जा रहे फोटो सेशन के दौरान रहस्यमय तरीके से पीछे खिसक गए. 




यह द्रश्य कुछ आन्दोलनकारी महिलाओं को स्तब्ध कर देने वाला था. एक दूसरे में शक की शुकबुगाहट यही से शुरु हुई. इसी दौरान किसी के चेहरे पर चमक थी, तो कोई चेहरा हताश, निराश था, तो कोई चेहरा विजयी भाव भंगिमाओं से भरपूर था. हर चेहरे के पीछे एक चेहरा किसी जासूस की माफिक निगहबानी कर रहा था. बाद में यह मामला कब शक और साजिश का शिकार हुआ पता ही नहीं चला. मेरे पास कई फोन इस बाबत आए. कोई मैनेज की तो कोई बिकने-बिकाने की बात करने लगा. मेरा मन बहुत आहत हुआ. मैने भी सच का पता लगाने का प्रयास किया. अपने सभी आंदोलनकारी दोस्तों को फोन किए. इससे पहले कि मैं किसी नतीजे पर पहुंचाता, सभी दोस्तों में "फेसबुक वार " छिड़ गया. एक दूसरे पर छीटाकशी, टीका-टिप्पणी, आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा दौर चला, जो रुकने का नाम नहीं ले रहा है. 

यहां तक कि मैं ऐसा पहली बार देख रहा हूँ, जब एक दुसरे को अपना जानी दुश्मन मान कर "फेसबुक ब्लाक" करने का सिलसिला अनवरत जारी हो चुका है, जो रुकने का नाम नहीं ले रहा है. दोस्तों आपका आन्दोलन सफल रहा. आरोपी डॉक्टर की गिरफ्तारी भी हो गई और पीड़िता के पति और दोस्त की बैल भी हो गई. आगे कोर्ट की कार्यवाही जारी है, जो भी दोषी हैं उनको सजा जरूर होगी, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कुछ लोग हमारी एकता को खंडित करना चाहते थे. वह हमें एक दूसरे से लड़ाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, लेकिन हम उनके मंसूबों को किसी कीमत पर भी पूरा नहीं होने देंगे.

आओ सभी मतभेद, बैर-भाव, वैमनस्य भुला कर अगले आन्दोलन की रुपरेखा तैयार करते हैं और समाज के किसी पीड़ित या पीड़िता को न्याय दिलाकर इंसान होने और इंसानियत को बचाने की कसम खाते हैं.





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