जिन्दगी एक खुशबू है यारो, गर आपको भी महकना आ जाये



''गुमनाम है कोई...'' शीर्षक से 10 जून को पटना से उषालाल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया था. वह आज सात दिन में 17 जून को 11000 से अधिक शेयर की जा चुकी है. कई लाख व्यूज हैं. ढेरों कमेन्ट हैं. अब पहले पोस्ट ही देख लें फिर आगे बात करते हैं. ये रही-


''गुमनाम है कोई...''
पटना काली घाट (दरभंगा हॉउस) बिहार की एक विरासत जो कभी महाराजा कामेश्वर सिंह का राज-महल था, आज यहाँ पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई होती है। एकदम गंगा किनारे। इसी परिसर में काली जी का मंदिर जो अति प्राचीन है, आज भी आस्था का केंद्र है। पटनावासी इस स्थान से भली भाँति परिचित है। मैं भी अक्सर जाती हूँ निरुद्देश्य। बस वहाँ गंगा तट पर बैठना और लहरों के साथ स्वयं में डूबते जाना अच्छा लगता है।
आज भी सुबह वहाँ जाना हुआ। पर आज एक उद्देश्य था। वहाँ किसी से मिलना था। जिसे देखी तो पहले जरूर थी, पर कभी ध्यान नहीं दी। जब से बेटी ने उनके बारे में बताया था उनसे मिलने को मन मचल उठा था।
मन्दिर की सीढ़ियां जो गंगा जी तरफ उतरती हैं उसी किनारे एक 75 वर्षीय वृद्धा अपने हारमोनियम के संगत से स्वरलहरी में डूबी थीं। जिसके बोल-
"मानो तो मैं गंगा माँ हूँ,
न मानो तो बहता पानी....."
आवाज में ऐसी खनक कि सुनने वाला सिहर जाय। पास ही बहती पवित्र जीवनदायिनी गंगा और जीवन के चौथेपन में पूर्णिमा जी में कितनी समानता होगी इसकी तुलना नहीं करती, पर दिल से आवाज आती है मानो माँ गंगा की ही भावना इनके बोल के रूप में प्रस्फुटित हो रहे हों। पास से गुजरते लोग 10रु 20रु देकर इनके चरण स्पर्श कर आशीष ले आगे बढ़ जा रहे थे। पर मुझे तो इनसे ढेरों बातें करनी थी। मन में कई सवाल उमड़- घुमड़ रहे थे। मैं भी उनका चरणस्पर्श कर पास में बैठ गई। वो मुस्कुरा दी। उन्हें 10 रु देते हुए कहा कि आप बहुत अच्छा गाती हैं। 
उन्होंने जवाब में कहा कि मैं पहले बच्चों को सिखाती थी। मेरी जिज्ञाषा और बढ़ी। फिर उनसे बहुत सारे सवाल पूछी जिनका जवाब उन्होंने बहुत ही अच्छे से दिया। उनसे बात-चीत के क्रम में मेरे साथ मेरे पति व बेटी की आँखे भी नम थीं। भले हम तीनों ही एक दूसरे से छुपा रहे थे। इनकी जीवन गाथा सुन जितना अचंभित मैं हुई शायद आप भी हों। या बहुत लोग उन्हें जानते भी हों। उनका जीवन परिचय मेरे शब्दों में-
नाम पूर्णिमा देवी, जन्म 29 दिसम्बर 1945 को दार्जिलिंग में। पिता-हरिप्रसाद शर्मा, महाकाल मंदिर के पुजारी। दो बहनें ही थीं, इनके भाई न थे। इन्होंने पिता के न चाहते हुए भी अपने बड़े पिताजी(चाचा) के बेटे को साथ रखने को विवश किया। क्योंकि जब दोनों बहनें ससुराल चली जायेगी, तब पिता की देखभाल को कोई तो होगा। 
बचपन से ही पूर्णिमा जी की आँखे कमजोर थीं। डॉक्टर ने पढ़ने से मना किया था। फिर भी इनकी शिक्षा I.Sc साइंस है। जो इनसे बात-चीत के क्रम में अंग्रेजी शब्दों का सही प्रयोग से पता चलता है। इनकी शादी जनवरी 1974 में एक नामी डॉ.(फिजिशियन) से हुई। उनका नाम H.P दिवाकर था। जिनका बाराबांकी उत्तरप्रदेश में अपना क्लीनिक और घर था। शादी के बाद दस सालों का सफर बहुत ही अच्छा रहा। इनके दो बच्चे भी हुए। एक बेटा प्रदीप और एक बेटी वन्दना। अपने पति के बारे में बताते हुए इनके चेहरे पर एक चमक दिखी। कहने लगीं वो इतने अनुभवी डॉ. थे कि आला(स्टेथोस्कोप) नहीं लगाते थे। बस चेहरा देख कर मर्ज बता देते थे। वो एक लेखक भी थे, उनकी रचना "तू ही तू", लम्हे, आयाम। उनकी लिखी गीत "शाम हुई सिंदूरी "जिसे आशा भोंसले जी ने गाया है और "आज की रात अभी बाकी है"। डॉ. साहब का गाना फ़िल्म इंडस्ट्री में कैसे पहुँचा, उन्हें नहीं पता। पर कहती हैं उस समय कई लोगों ने कहा कि आप केस कीजिये। पर उनकी सहृदयता की परिचय देती हुई कहती हैं कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।



1984 की एक रात उनके जीवन को हमेशा के लिए अमावस कर गया। जिसकी कल्पना पूर्णिमा जी ने सपने में भी नहीं की होंगी कि इनका बसा बसाया नीड का तिनका तिनका कभी बिखर जाएगा। कुछ बदमाशों ने डॉ. साहब की हत्या कर दी। उसके बाद ससुर और देवर ने इस कदर प्रताड़ित किया कि उन्हें अपनी सम्पति ही नहीं, अपने बच्चों के साथ घर तक छोड़ना पड़ा। आज भी बाराबांकी में उनका घर है जो अब किसी जेलर के नाम है। 
पूर्णिमा जी बताती हैं कि दोनों बच्चों के साथ वो पटना मौसी के यहाँ आ गईं। मौसी जब तक थी इन्हें बहुत सहारा मिला। पर मौसी भी ज्यादा दिन साथ न दे सकी। वो लिवर कैंसर की मरीज थीं जिनका देहान्त 1989 में हो गया। उसके बाद इनका जीवन और भी कठिन हो गया। बच्चों की अच्छी परवरिश की खातिर एक बार अपने घर(मायके) भी गईं। पर पिता की मृत्यु के बाद चचेरे भाई ने किसी भी तरह की मदद और सम्पति में हिस्सा देने से साफ मना कर दिया। वो वापस पटना लौट आईं। उसके बाद कहीं नहीं गईं।
पटना के एक स्कूल BD पब्लिक स्कूल में इन्होंने शिक्षण कार्य के साथ ही कई स्कूलों में संगीत सिखाने का भी काम किया। जब घर से निकली तो इनका स्टूडेंट लाइफ का गाने का शौक को कुछ हमदर्दों ने दिशा देने की सोची। ये पटना के एक डॉ शरण जी की बेटी को डेढ़ साल तक संगीत सिखाई। इसी क्रम में पटना नाट्य संस्थान से भी जुड़ी। ये लता जी की बहुत बड़ी प्रसंशक हैं।
इनका पहला प्रोग्राम 1990 में गढ़वा (झारखण्ड) में हुआ था। जिसमें भोजपुरी गाना "यही ठाइयाँ टिकुली हेरा गइले...." था। उसके बाद इन्होंने कई कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति भी दी। विश्वप्रसिद्ध पशु मेला सोनपुर में भी युवा कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा संचालित कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति देती रही। 2002 तक ये मंच से जुड़ी रही। इनका बेटा भी मोहम्मद रफी साहब का गाना ऑर्केस्ट्रा में काफी अच्छा गाता था। पर अभी अवसाद से घिरा गुम होकर रह गया है। जिसकी दुनियां अष्टावक्र की भाँति माँ तक ही सिमट कर रह गई है। न मालूम माँ के बाद उसका क्या होगा?
बेटी भी मुम्बई की महानगरी में ऐसी रच बस गई है कि माँ और भाई याद तक नहीं। अपनी पहचान तक छुपा रखी है उसने। पहचानने वाले पहचान ही गए और पूर्णिमा जी को बताया कि वन्दना टी वी सीरियल में काम करती है। जब मैंने पूछा कि आप टी वी पर अपनी बेटी को देखी हैं? तो बताई कि मेरे घर में टीवी नहीं है। पर एक बार देखी हूँ। उसमें उसका गुंजा नाम था। बहुत ही चुलबुली लड़की का रोल था। 
अपनी छोटी बहन के बारे में बताती हैं कि उसका नाम रमोला जोशी है और एक सफल डॉक्टर है। जिसने अपनी पढ़ाई पी. एम. सी. एच से की है। वर्तमान में कटिहार में नेपाल के पास अमेरिकन हॉस्पिटल में हैं।
कहते हैं परिवर्तन संसार का नियम है। समय के साथ आधुनिकता को ग्रहण करता हमारा समाज क्या इतना आधुनिक हो गया है कि कोख से जन्मी औलाद और सहोदर रिश्ते भी शहरों में रहकर कंक्रीट से हो गए हैं?
अब वीडियो भी देख ही लें- 




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पोस्ट पर Indu Upadhyay जी ने June 15 को लिखा-
"मुझे गम भी उनका अजीज है 
ये उन्ही की दी हुई चीज है.."
वाह ईश्वर तेरे खेल निराले..
कितनी शिद्दत से सुर मिला के गातीं हैं आप, अचानक पूर्णिमा जी का गाना सुन के मैं बोल उठी...

इंसान कितना भी टूट जाये... चाहे पति की हत्या हो जाये, कोई ज़ायदाद हड़प ले, बेटी अपनी माँ को भूल जाये, बेटा विक्षिप्त हो जाये या किस्मत छले किन्तु हमारे अंदर अगर किसी भी प्रकार की कला हो तो वो हमें ना तो टूटने देगी, ना हारने देगी, ना मरने देगी और ना ही झुकने देगी। जी हाँ, आज पूर्णिमा जी को देख के उनसे ये सीखने को मिला कि धैर्य के साथ हम हर जंग जीत सकते हैं। 

आज उनको माँ कहने में मुझे जरा भी झिझक नहीं, इतना हौसला इतना वत्सल्य, अपनापन देख मेरे अंदर भी ऊर्जा भर गई। ये बात मैं.. सम्मान के साथ कह सकती हूँ! मैंने जब से पोस्ट पढ़ा, द्रवित थी, मन रो रहा था, थोड़ी कठिनाई हुई उनकी तलाश में, मगर मिल गईं। जब उनसे मिली, बातें की, बहुत शांति मिली, दुख तो है कि भाग्य के साथ -साथ अपनो ने पराया कर दिया। जिनकी दो बहनें अच्छे पद पर कार्यरत हैं वो चाहें तो हर तरह से मदद कर सकती थी। बेटी भी जो उनका अंश है उसने भी मुँह मोड़ रखा है किंतु उनके प्यारे से मुखड़े पर जरा भी मलाल नही मुस्कुरा के कह रही थीं। मैं कालीघाट मंदिर के पास जाती हूँ और गाती हूँ जो भी पैसा मिलता है उससे अपना और बेटे का भरण-पोषण करती हूँ। पति की हत्या के बाद उनके गुरु ने कहा हारमोनियम के साथ गाओ तब से.. पहले स्कूल में भी सिखाती थी पर अब... एक विद्यार्थी है राहुल जो उनसे सीखता है और उनकी मदद करता है।

मैं चाहती हूँ आप सबसे निवेदन है कि जो भी हो सके उनकी सहायता की जाय, हम सब करें.... क्योंकि वक़्त से बड़ा बादशाह कोई नहीं होता। परिस्थितयां किसी के वश में नहीं होती... धन्यबाद..
राहुल आनंद आपका बहुत-बहुत आभार, धन्यवाद आपके माध्यम से मैं माँ पर्णिमा से मिली.




बाद में आज 17 जून को उन्होंने फिर लिखा-  

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,मा कश्चिद् दुःख भाग् भवेत्!"

"वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना से ओत- प्रोत प्राचीन मानव, सबके कल्याण की कामना करता था।' मातृ देवो भव', 'पितृ देवो भव', 'आचार्य देवो भव', 'अतिथि देवो भव', मानव जीवन के प्रमुख अंग होते थे.. हमें सांसारिक सम्बन्धियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, इनका पालन हमारे धर्म-ग्रंथों से हम जानते थे। यही कारण है कि हमारी भारतीय संस्कृति विश्व के समक्ष एक मिसाल है।

ये शाश्वत है कि मनुष्य स्वार्थ से वशीभूत हो गया है। आज हमारा दुर्भाग्य है कि विदेशी सभ्यता के प्रभाव से हमारी नैतिकता गर्त में जा रही है।

किन्तु अभी भी कुछ ऐसे महामानव हैं जो स्वयम से पहले दूसरे के बारे में सोंचते हैं। मैं माँ पूर्णिमा से मिलके आई तो थोड़ी परेशान थी कि उनके लिए कैसे क्या किया जाय कि कुछ सरल हो जाए उनका जीवन. यही सोचकर आज पुनः मैं और विवेक भाई उनसे मिलने गए। वहाँ पहले से उषा जी, उनके पति, उनके एक रिश्तेदार, अभिषेक जी, सिद्धार्थ जो मीडिया से हैं सब थे। आज लगा कि ईश्वर वास्तव में है वो प्रत्यक्ष नहीं आता किन्तु माध्यम जरूर बनके आता है और मदद करता है। उन्ही में से एक है IIT बिहटा कॉलेज के HOD अभिषेक मिश्रा, जिन्होने आगे बढ़कर पूर्णिमा जी का भार स्वयम के कंधे पर लिया अर्थात जब तक वो हैं उनका और उनके बेटे के खाने का बंदोबस्त उन्होंने किया। हम सब इनके कृतज्ञ हैं. हम आगे भी उनकी देख-रेख करेंगे, ईश्वर की इच्छा से...
आप सभी पाठकों का हृदयस्थ आभार, प्रणाम आप सबके प्रयास और प्रार्थना का ही प्रभाव है, जो यह सम्भव हुआ...
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उषालाल के पति साहबलाल
इस तरह के सामाजिक कार्यों में सहयोग के
साथ खुद भी हो लेते हैं साथ 

अब हमारी बात 
आपने OMG एक फिल्म है देखी होगी, नहीं देखी हो तो देखें अच्छा लगेगा. लोगों ने फैलाया इसमें धर्म के खिलाफ बताया गया है, जबकि ठीक से देखें तो इसमें धर्म क्या है यही बताया गया है. फिल्म में यह नहीं दिखाया गया कि भगवान नहीं हैं. आज फिर किसी चैनल पर आ रही थी देखी. 

इसका उल्लेख यहाँ इसलिए किया, क्योंकि समस्या वही है. लोग अपने आँख, नाक, कान, सब बंद कर भेड़ की तरह बस चले जा रहे हैं. कहाँ जा रहे हैं, क्यों जा रहे हैं, कुछ पता नहीं. कहते हैं भेड़ आस पास तक निगाह नहीं फैलाती बस नीचे दुसरी आगे चल रही भेड़ के पैर देखती है और उसका अनुसरण करती चलती है. अब यदि वह आगे वाली थोड़ी देर के लिए अपनी आँख बंद कर ले, कुएं में गिर जाए, तो पीछे आ रही सबका वही हश्र होना है. इसी को लेकर भेड़चाल वाली कहावत बनी है. 

आज लगभग हम सब ही जैसा कि श्री Ranveer Satyam जी ने लिखा है झूंठी आधुनिकता और मॉडर्न बनने के चक्कर में रिश्ते नाते सब भूल गए हैं और केवल फॉर्मेलिटीज में लगे हैं. निश्चित ही इसके पीछे गलत परवरिश बड़ी बजह है. नैतिक शिक्षा की तो किताब ही गायब हो गई है. आखिर फिर गलत रस्ते पर चल कर सही मंजिल कैसे मिलेगी? 

देश में इस तरह की कई लाखों गंगा मां सड़क पर हैं. भीख से गुजारा कर रही हैं. अनाथ आश्रमों में संख्या बढ़ रही है. लाखों बच्चे पढ़ने लिखने की उम्र में होटलों पर कप प्लेट धो रहे हैं. बड़ी बड़ी मशीनों के नट बोल्ट से जूझ रहे हैं. समस्या उठाने के लिए जिम्मेदार अखबार वाले खुद ऐसे मासूम बच्चों से अपना अखबार बिकबा रहे हैं.

लोग भिक्षावृति के विरोध में हैं, लेकिन फिर दान का पुण्य कैसे कमाएंगे, यह चिंता भी है. सरकारों की नजर में भी यह कोई ख़ास समस्या नहीं है, वह कई करोड़ों कहीं भी फूंक देगी, लेकिन इस तरह के लोगों के लिए कुछ नहीं कर सकती. ऐसे में बस उषालाल बहन जैसे लोग ही कुछ कर सकते हैं. और उषालाल जैसे लोग भी कम नहीं हैं, लेकिन वे सब उतने सजग नहीं होते जितना कि होना चाहिए. इसके पीछे उनकी अपनी अलग समस्याएं हो सकती हैं. जैसे हमने ही सबसे पहले उषालाल की पोस्ट को सरसरी निगाह से पढ़ कर लाइक कमेन्ट कर छोड़ दिया. समय नहीं था. कहीं जाना था. वैसे भी यह आम चर्चा में है कि सोशल मीडिया पर गंभीर वाली पोस्ट कम ही रहती हैं. 

यह सवाल अवश्य है कि कैसे कोई अपने ऐसे दूर हो जाते हैं, और कैसे कोई बहुत दूर का व्यक्ति भी बहुत करीब लगता है? जैसा कि इंदु जी ने लिखा है भगवान प्रत्यक्ष खुद तो नहीं आता, किन्तु माध्यम जरूर बनके आता है और सहायता करता है. 

हम अपने अपने शहर में ऐसे लोगों को देखें और संभव मदद करें. मदद में उन्हें भीख नहीं कुछ साधन कुछ स्थाई रोजगार दिलाने का प्रयास करें तो सच्ची मदद होगी. बड़े भाई अहद प्रकाश जी कहते हैं ''जिन्दगी एक खुशबू है यारो, गर आपको भी महकना आ जाए'' हम जब किसी को सहयोग करते हैं तभी हमें भी समय पर सहयोग मिलता है. दूसरों के चेहरे पर खुशी लाने का प्रयास करोगे तो आपके चेहरे पर खुशियाँ वो अवश्य लाएगा, जो दिखता नहीं है, बस आ जाता है राह दिखाने को...



कुछ प्रतिक्रियायें   
   
पोस्ट पर प्रतिक्रिया में श्री Rajiv Ranjan जी लिखते हैं 


हम सब इसी दौर में हैं. जाने अनजाने इस सामाजिक, परिवारिक खाई को प्रश्रय दे रहे हैं. हमारी सोच, हमारी शिक्षा, हमारी संस्कृति सब कुछ पैसे बनाने मात्र तक सीमित रह गई है. धिक्कार है ऐसी जिंदगी पर..

राजीव रंजन : हमारी सोच, हमारी शिक्षा, हमारी संस्कृति
सब कुछ पैसे बनाने मात्र तक सीमित रह गई है.

वहीं श्री Ranveer Satyam
 जी ने लिखा है पता नहीं, इस आधुनिकता और मॉडर्न बनने के चक्कर में रिश्ते नाते सब कहाँ खो गये हैं. बस अगर कुछ बचा है तो वो है फॉर्मेलिटीज. और इसके पीछे वह कारण परवरिश मानते हैं. उनका कहना है जहां पहले लोग अपने माँ बाप बड़े बुजुर्गों गुरु को भगवान का दर्जा देते थे, उनका सम्मान करते थे, वो सब कल की बातें थी, आज न लोग अपने माँ बाप को देखते हैं, न बड़े बुजुर्गों का सम्मान करते हैं और गुरु का तो पूछो मत. 

रश्मि : उषालाल के सबसे नजदीक
हर प्रकार से सहयोग को तत्पर 
वे लिखते हैं आजकल बच्चे गुरु के सामने गुटखा सिगरेट फूंकते हैं और थोड़ी सख्ती की तो अपनी इज्जत गंवानी पड़ती है. हमारे वक़्त में ज्यादा समय नही बस 20 साल पहले जाएं तो उस समय तक तो अपने शिक्षक का डर होता था और उनका सम्मान भी, आज भी कभी किसी मोड़ पर सामना होता है तो पैर छूकर आशीर्वाद लेता हूँ. हिम्मत नही होती है उनसे खुलकर बात करने की. लेकिन आजकल का जेनरेशन तो इतना मॉडर्न है कि क्या कहें, कहीं न कहीं यह गलत परवरिश का असर है. 
हम बच्चों को पढ़ाने लिखाने की तो सोंचते हैं परंतु अपनी संस्कृति सभ्यता से दूर रखते हैं, जबकि बेसिक शिक्षा abc नही है बेसिक शिक्षा है संस्कृति और सभ्यता का ज्ञान, जो किसी किताब में नही, बल्कि उनके मां बाप के द्वारा दिया जाता है. उसके बाद abc है, लेकिन यहां तो मॉडर्न बनने की होड़ लगी है, जो कि खोखला है.. 

पटना से ही Rashmi Rani का मानना है आज इन जैसे लोगों के लिए कुछ करने की जरूरत है. भले वो मदद थोड़ी ही हो, क्योकि बूंद बूंद से घट भरता है. 
उन्होंने पोस्ट शेयर करते हुए लिखा है ''हम किस ओर जा रहे? कौन सी शिक्षा ग्रहण कर रहे? 
हम हमारे माँ- बाप को भी पहचानने से इनकार कर रहे, जिन्होंने अपना सारा जीवन आप पर खर्च कर दिया और जब उनकी बारी आई तो सड़कों पर मरने को फेंक दिया. अभी कुछ दिन पहले ही पुरानी फिल्मों की अभिनेत्री (जिन्होंने पाकीजा में काम भी किया था) अपने बेटे -बेटियों को याद करते हुए वृद्धाश्रम में दम तोड़ दिया पर उनके अपनों ने सुधि न ली उनकी.
कभी बेटे छत पर से नीचे फेंक देते.. कभी किसी वृद्धा की साल भर बाद कंकाल ही मिलती.. ये अगली कंकाल हमारी आपकी किसी की भी हो सकती.
ये सड़क, ये रास्ते आपसे हमसे ज्यादा संवेदनशील है जो हर किसी को अपना लेते! सम्भल जाएं, झांकें खुद के अंदर! अब भी गर न सम्हले तो कब?''


''प्रार्थना से कहीं ज्यादा  हाथ वो भाग्यशाली होते हैं, जो किसी की मदद को उठें'' यह लिखते हुए Swati Gupta ने उषा के लिए thanks कहा है. उनकी पोस्ट ये रही- some people post their article for increasing their like viewrs nd follwers.... this post hv 4.5 million abov viewrs, 3.9 tim share.... but all post 4 lik cmnt... i also shr this but helping hand is better than praying lips Thank you to my dear friend who tk quick action nd help this woman.... thank u ma'am i m so glad that u r my friend thank u..


पोस्ट पढने के बाद श्री Abhishek Mishra जी भी आगे आये. उषा जी से कॉल कर माँ पूर्णिमा जी से मिलने की उत्सुकता दिखाई. इस बारे में उषा जी ने लिखा है ''श्री Abhishek Mishra जी ने कॉल कर माँ पूर्णिमा जी से मिलने की उत्सुकता दिखाई, वो सच में एक नेक दिल इंसान ही कर सकता है. मेरा पूरा प्रयास था कि आपको उनसे मिलवाऊं. आपके आने में देर होने पर माँ ने आग्रह किया था कि बेटा मुझे जाने दो. तुम उनको लेकर अनुग्रह सेवा सदन आ जाना.
मैं दरभंगा परिसर में ही आपका इंतजार करती रही. आप ने माँ के न रहते हुए भी उनके बैठने के स्थान के धूल को जो माथे पर लगाया था वो द्रवित कर देने वाला दृश्य था.
आप बड़े ही सहज व निःस्वार्थ भाव से माँ की मदद को आगे आये इसकी जितनी भी तारीफ की जाय कम होगी.
मुझे नहीं पता आज तक किसने माँ पूर्णिमा जी के लिए क्या किया, पर आप को बिना शर्त उनके आजीवन भोजन के खर्च को उठाने का संकल्प लेते देखा है. आप बेहद प्रशंसा के पात्र हैं. जब मैं इनके बारे में दो शब्द लिखी भी तो ये कभी सोचा न था कि इस तरह आगे बढ़ेगा. इसके लिए मैंने कोई प्रयास नहीं किया. ये आप जैसे आज भी संवेदनशील लोगों का परिणाम है कि "गुमनाम है कोई" इस सफर तक पहुँच गया. 
धन्यवाद, ईश्वर आपको इस लायक बनाये रखें कि ऐसे हर मोड़ पर काम आ सकें.'' 


आपके सर पे मां का यह हाथ हमेशा रहे...


आपको सैल्यूट श्री Abhishek Mishra जी 

@ चित्रांश  
(डिजीटल न्यूज़ सर्विस नेटवर्क)  


     





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