हवाई युद्ध जीता, जमीन की जंग हार गया..



एक सैनिक ने युद्ध में अपने देश की जमीन से दुश्मन को खदडऩे में भले ही 

सफलता हासिल कर ली हो, लेकिन वह लगातार 47 साल संघर्ष करने के बाद भी 

अपनी ही जमीन से अवैध कब्जे को नहीं हटवा पाया। इस संघर्ष में उसकी 

जान ही चली गई, लेकिन न तो सरकार में उसकी सुनवाई हुई और 

न ही प्रशासन में बैठे अधिकारियों का दिल पसीजा। 

   


@संजय सक्सेना 

मामला तामिया के रहने वाले आनरेरी फ्लाइंग आफीसर जयनंदन सोनी का है, जिसने 1965 और 1971 की जंग में भाग लिया था। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें सरकार की ओर से तमिया में 13 एकड़ जमीन दी गई। उस जमीन पर अवैध कब्जा था जिसे हटवाने के लिए जयनंदन लगातार राजस्व विभाग के चक्कर काटते रहे 2005 में वे सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन उन्हें जमीन पर कब्जा नहीं मिल पाया। आखिर संघर्ष करते हुए 11 अगस्त 2017 को उनका देहांत हो गया। जयनंदन के पुत्र अजय सोनी कहते हैं कि तामिया से परासिया रोड पर इंदिरा कालोनी से लेकर पावर हाउस कालोनी के मंदिर तक की जमीन उनके पिता के स्वामित्व में पाई गई है। उन्होंने अपनी जमीन पाने के लिए तहसीलदार पटवारी और राजस्व निरीक्षक से सीमांकन करवाया और भू अभिलेख शाखा से सीमांकन कराने एसएलआर को आवेदन भी दिया। 13 एकड़ में से आठ एकड़ भूमि पर कई लोगों ने अवैध रूप से कब्जा कर स्थाई निर्माण कर लिया है। अजय सोनी अब भी न्याय की आस मे तहसील कलेक्ट्रेट के चक्कर लगाने के बाद अपने सैनिक पिता की जमीन पाने मुहिम चला रहे है। क्षेत्र के एसडीएम कहते हैं कि सीमांकन कराया गया गया है, पर सोनी परिवार इससे असंतुष्ट है इसलिए भू अभिलेख विभाग को पुराने रिकार्ड देने के लिए लिखा गया है। बीते दिनों आरआई और पटवारी से नपाई कराई गई है जिसमें इंदिरा कालोनी पावर हाउस तक भूमि जयनंदन सोनी के नाम आ रही है। अधिकारी यह तो कह रहे हैं, लेकिन सेना के एक अधिकारी के परिवार को वह न्याय नहीं दिला पा रहे हैं। 

प्रदेश में अतिक्रमणकारियों के हौसलों की बात करें तो यह सच्चाई है कि सरकार उनके आगे बौनी ही नजर आती है। राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज तक के इलाकों में सरकारी जमीनों पर तो बेहिसाब कब्जे होते ही हैं, निजी जमीनों पर भी लोग कब्जा कर लेते हैं। बेचारा जमीन मालिक प्रशासन से लेकर अदालतों तक के चक्कर काटता रहता है। यहां तो सामान्य कब्जे का मामला नहीं है। सेना के एक अफसर का मामला है, जिसने देश की तरफ से दो महत्वपूर्ण युद्ध में सक्रिय हिस्सेदारी निभाई। इस प्रदेश में जहां आपातकाल तक में लड़ाई लडऩे वालों को सेनानी दर्जा दिया गया है, उन्हें अच्छी खासी पेंशन दी जा रही है, लेकिन देश की तरफ से भारत-पाकिस्तान युद्ध लडऩे वाले को न्याय नहीं दिया जा रहा है। उस सेनानी का पूरा जीवन अपनी जमीन को पाने में चला गया, लेकिन शासन-प्रशासन में बैठे किसी एक ने भी उसकी वीरता की कद्र नहीं की। गुंडे-बदमाशों और अतिक्रमणकारियों के आगे एक सरकार कैसे घुटने टेक देती है, तामिया जैसे छोटे से आदिवासी बहुत कस्बे में सामने आया है। अब उस याद्धा का बेटा अपने अधिकारों की जंग लड़ रहा है, देखना होगा कि उसे उसका अधिकार कब मिल पाता है। सरकार तो सैनिकों और पूर्व सैनिकों के लिए बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन यहां तो सारे दावे खोखले ही नजर आ रहे हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे सैनिकों की शहादत पर सरकार की ओर से बहाए जाने वाले आंसू घडिय़ाली हों। 

हां, एक बात का उल्लेख करना भी जरूरी है। यह केवल वर्तमान सरकार के लिए टिप्पणी नहीं है, हर सरकार के लिए है। प्रदेश में अतिक्रमणकारियों को हमेशा ही उपहारों से नवाजा गया है। सरकारी जमीन पर कब्जा करो, फिर पट्टे ले लो। फिर कब्जे करो, फिर पट्टे ले लो। कब्जे वाले पट्टे बेचने का धंधा सरकार और अतिक्रमणकारी लंबे अरसे से मिलकर चला रहे हैं। और अब तो हालत यह हो गई है कि कहीं भी गुमटी लगा लो। कहीं भी झुग्गी तान लो। और हो गई अपनी। अभी तो सरकार अवैध कालोनियों को वैध कर रही है। वाह री सरकार। अवैध को वैध कर दो, लेकिन जो वैध है, उसे उसका हक मत मिलने दो। राजनीति शायद इसी को कहते हैं। और यह कहावत भी उस राज्य में लागू होती दिखाई दे रही है, जिसे कानून का राज कहते हुए नहीं थकते, जिसकी लाठी उसकी भैंस। जिसका कब्जा, उसकी जमीन।

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