शर्म नहीं, घिन आती है ऐसे सड़े हुए सिस्टम पर, जिसका हम भी एक हिस्सा हैं..




आज भी सवाल वही

''निश्चित रूप से यह मानवीय संवेदनाएं शून्य हो जाने के साथ ही सरकार की विफलता है. यह मामला भी चार दिन चलेगा, आखिर अखबार वाले भी कब तक पेज पर जगह देंगे, जब कोई नया मामला आ जाएगा... शर्म नहीं, घिन आती है ऐसे सड़े हुए सिस्टम पर, जिसका हम भी एक हिस्सा हैं..''

- चित्रांश मुकुट   



जबलपुर में मीडिया से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वे मंदसौर में एक नावालिग बच्ची के साथ घटित घटना की कड़ी निंदा करते हैं. उन्होंने कहा कि मेरी प्रार्थना है कि ऐसे दरिंदों को जल्द से जल्द फांसी पर लटकाया जाए. उन्होंने कहा कि ऐसे राक्षस आखिर कैसे धरती पर पैदा हो जाते है. उन्होंने कहा कि फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह ही हाईकोर्ट और सप्रीम कोर्ट में भी तत्काल सुनवाई होनी चाहिए. दरिंदे फांसी पर लटकने लगे तो ही हम पीड़ितों को न्याय दिला पाएंगे. साथ ही यह भी कि यह मैने अपने मन की बात कही है.

साहब बुरा मत मानिए, यह सब तो आम जनता भी न केवल कह रही है, बल्कि इसके लिए चीख रही है, फिर आपने नया क्या कहा. सब कुछ साफ़ है, फिर न्याय में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है? मासूमों के साथ इस प्रकार की दरिंदगी के बाद भी क्या सिर्फ राजनैतिक रोटियाँ सेंकी जाती रहेंगी, या फिर कुछ ठोस कदम उठाये जायेंगे? एक कोर्ट से दुसरे कोर्ट, फिर याचिका फिर दया याचिका, यही चलता रहेगा, इस सबमें पीड़ित कहीं नहीं होता तो पीड़ित के साथ क्या न्याय हुआ? 

आज 6 साल बाद भी निर्भया के आरोपी जिंदा हैं. भोपाल हबीबगंज स्टेशन के पास चार दरिंदों का शिकार हुई युवती खुद पुलिस स्टेशन पहुंच चारों दरिंदों के नाम और कपड़ों के कलर हूबहू बताया और बाद में खुद ही एक आरोपी को पकड़ कर पुलिस के हवाले भी किया, लेकिन सरकार ने चार दिन रोना रोया, और ''..फिर वही अंधेरी रात'' वाली बात कर दी. फांसी का क़ानून बनाने तक मामला सिमट कर रह गया आरोपी दरिन्दे आज भी खिल खिला रहे हैं. 

मंदसौर और बाकी जगह हो रही इस तरह की घटना होने का मूल कारण में हमारी सोच ही नहीं है कि ये मामले रुकें, यही कहा जाएगा. ऐसे मामलों में जिन में सब कुछ साफ़ दिख रहा है, क़ानून में तत्काल फांसी का प्राबधान  क्यों नहीं होता. न्याय प्रणाली पर नए सिरे से सोचने की महती आवश्यकता है. यह कब और कौन सोचेगा. आज 6 साल बाद भी निर्भया के आरोपी जिंदा हैं. हबीबगंज घटना, जिसने राजधानी को देश दुनिया में शर्मशार किया, के दरिन्दे जेल से खिल खिला रहे हैं. 

निश्चित रूप से यह मानवीय संवेदनाएं शून्य हो जाने के साथ ही सरकार की विफलता है. यह मामला भी चार दिन चलेगा, आखिर अखबार वाले भी कब तक पेज पर जगह देंगे, जब कोई नया मामला आ जाएगा... शर्म नहीं घिन आती है, ऐसे सड़े हुए सिस्टम पर, जिसका हम भी एक हिस्सा हैं..

(डिजीटल न्यूज़ सर्विस नेटवर्क )





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