शासकीय योजनायें धरातल पर तोड़ रहीं दम, साहेब विरोधियों की छीछालेदार, जुमलेबाज़ी में मस्त



नहीं खुला 'खुल जा सिम सिम'

''आज कल देश 48 माह की गूंज से गुंजायमान हो रहा है. उपलब्धियों के नाम पर लोग नोटबंदी, जीएसटी से परेशान हैं. एटीएम ठप्प पड़े हैं. योजनायें क्या सोच कर बनाई जाती हैं, समझ से परे है. वह धरातल पर दम तोड़ रही हैं. रसोई गैस, स्वच्छता अभियान शौचालय या सड़क निर्माण, गंगा सफाई कुछ काम धरातल पर नहीं हुआ. साहब जब देखो तब, विमान से बाय बाय करते दिखते हैं. सरकार विदेश यात्राओं का वर्णन या विरोधियों की छीछालेदार करने में, जुमलेबाज़ी में समय बिता रही है.''

-डॉक्टर अरविन्द जैन भोपाल     
2014 में चुनाव में किये जा रहे वादों से लग रहा था कि जैसे ही मोदी प्रधानमन्त्री बने तो देश को अलाउद्दीन का चिराग मिल जायेगा और ‘खुल जा सिम सिम’ की तरह सब दु:ख दूर हो जायेंगे. हर हाथ को काम मिल जाएगा. सारी कल्पनायें हक़ीक़त में उतर आयेंगी. अब सब अपेक्षाएं काफूर हो गई है. लेकिन भले ही जमीनी हकीकत अलग हो, आंकड़ेबाजी में तो ‘खुल जा सिम सिम’ खूब हो रहा है. अब देखिये न, बिहार में एक सप्ताह में साढ़े 8 लाख शौचालय बना दिए गए. आप कहते रहो झूंठ है, पर आपके कहने से क्या होता है? साढ़े 8 लाख के बिल तो पास हो चुके.

अब लोगों को क्या पता था कि अधिकतम लुभावनी घोषणायें कर चुनाव जीतना और बाद में उन्हें पूरी करना दो अलग-अलग बातें हैं. हालांकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह साहब स्वीकार ही चुके हैं कि वह तो एक जुमला था. और चुनाव जीतने के लिए जुमले जरूरी होते हैं. यानि साफ़ है कि सरकार बन गई, जनहित में योजनाओं का सही से क्रियान्वयन नहीं हो रहा, यह अलग बात है. और इससे सरकार को कोई ज्यादा मतलब नहीं है
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अभी किसान आंदोलन चल रहा है. अचानक तो शुरू हुआ नहीं. लेकिन सरकार ने पहले से कोई बात नहीं की, न यह जानने की कोई कोशिश की गई कि किसान बाकई परेशान है या नहीं या किन समस्याओं में है. अब जो बातें सामने आ रही हैं, उन्हें सुन कर कहा जा सकता है कि सरकार ने केवल यह माना कि किसान की तो आदत है रोना रोने की. सरकार कह रही है किसानों को विपक्ष बरगला रहा है. सच यह है कि यह सरकार की गैर जिम्मेदारी ही कही जायेगी.

शौचालय की बात करें तो स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत शौचालय बनाये जा रहे हैं, लेकिन यह नहीं देखा जा रहा कि वहां पानी की व्यवस्था है या नहीं. पानी के अभाव में उनका उपयोग कैसे संभव होगा. इस कारण से मूल उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा. और लोग लोटा पर ही निर्भर बने हुए हैं. एक जानकारी के अनुसार टीकमगढ़ जिले के पारा गांव के 600 शौचालय के सेप्टिक टैंक में लोग पीने का पानी का संचय कर रहे हैं. इस गांव में दो हैंड पंप हैं, वह भी सूखे रहते हैं, दो तीन बाल्टी पानी देते हैं. गाँव का पोखर भी पूरी तरह से सूख गया है. उसकी तलहटी पर बड़े-बड़े गड्ढे हो चुके हैं, जमीन दरक गयी है. लगभग यही हाल अन्य अधिकाँश जगहों का है. कहा जा सकता है कि प्रधान सेवक की योजनाएं जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं.
टीकमगढ़ जिले के पारा गांव के 600 शौचालय के सेप्टिक टैंक में लोग पीने का पानी का संचय कर रहे हैं. मामले में प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने भी ट्विट कर कहा है कि ‘टीकमगढ़ जिले के परा गाँव का यह चित्र बया कर रहा है कि आँकड़ो में शौचालय तो बन गये, लेकिन पानी नहीं है.. पानी के अभाव में इन शौचालय के सेफ़्टी टैंक का उपयोग लोग पानी स्टोर करने के लिये कर रहे है… ये है प्रदेश के विकास, स्वच्छ भारत मिशन व जलसंकट से निदान के दावों की हक़ीकत…’


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