अस्थमा से बचने लोग निगल रहे हैं ज़िंदा मछली, क्या सच में इस मछली से अस्थमा का इलाज होता है?




तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक मछली मिलती है, जिसका नाम 'प्रसादम' है. ऐसी मान्यता है कि इस मछली को खाने से अस्थमा की बीमारी हमेशा के लिए ठीक हो जाती है. इस मछली को बाधिनी गौड़ परिवार द्वारा वार्षिक कार्यक्रम मृगसिरा कार्ती में बांटा जाता है. कल शुक्रवार को नामपल्ली स्थित एग्जीबिशन ग्राउंड में अस्थमा के मरीजों के लिए 'मछली प्रसादम' का आयोजन किया गया. यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और प्रसादम ग्रहण किया. बताया जाता है हैदराबाद का गौड़ परिवार कई सौ सालों से यह इलाज कर रहा है. सरकार का भी पूरा सहयोग कार्यक्रम को मिलता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या सच में इस मछली से अस्थमा का इलाज होता है? 

यह मछलियां ताजे पानी के अन्दर पाली जाती हैं और तालाब, झील और नदियों में पाई जाती हैं. कई देशी संस्कृतियों में इसे एक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मछली माना जाता है. हैदराबाद का बठिनी गौड़ परिवार इस मछली में येल्लो हर्बल पेस्ट भरकर तैयार करता है. परिवार के अनुसार, मछली के मुंह में एक विशेष प्रकार का प्राकृतिक लेप लगाकर मरीज को वह मछली निगलनी पड़ती है. पेट में जाकर मछली अपने मुंह में लगी दवाई को छोड़ती है. इससे मकस को साफ करती है और सांस लेने को आसान बनाती है. मरीज को कम से कम आधे घंटे तक पानी नहीं पीने की सलाह दी जाती है. इसके अलावा उन्हें डायट का भी ध्यान रखने को कहा जाता है.

मत्स्य पालन विभाग के मुताबिक इसके क्लिनिकल बेनेफिट्स के लिए कोई सबूत नहीं हैं, लेकिन लोग इसे लेने के लिए वहां पहुंचते हैं. कई लोगों का दावा है कि उन्हें इससे फायदा हुआ है और उनकी बीमारी ठीक हो गई है. इनमें से एक गुजरात के सनखेड़ा कसबे से 32 वर्षीय बानो भी यहाँ पहुँचीं और अपने 14 वर्षीय बच्चे को 'मछली प्रसादम' दिलाया. उनका कहना है कि मेरा बेटा अस्थमा से पीड़ित है और इस 'मछली प्रसादम' के बाद उसे राहत मिली है. हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञ इस उपचार के समर्थन में नहीं हैं. उनका कहना है कि यह केवल एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव है.


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