जब राजा प्रथम निवाले पर टेक्स लगा दे तो मान लो कलयुग शुरू हो गया



खिलाड़ियों पर टेक्स के बाद घिरी खट्टर सरकार, वापिस लेना पड़ा आदेश 



''हरियाणा सरकार हमेशा ही विवादग्रस्त रहती है. हाल में उसने खिलाड़ियों की 

आय पर 30 परसेंट टेक्स के आदेश कर दिए, हालांकि विरोध होने पर तत्काल ही 

वापिस लेने पड़े, लेकिन ऐसे में हरियाणा की खट्टर सरकार ने खुद ही 

अपनी आर्थिक और मानसिक खस्ता हालत जग जाहिर कर दी है.'' 




-डॉक्टर अरविन्द जैन
भोपाल
पुराणों में आलेख है कि जब राजा साधु मुनियों के ग्रास पर या प्रथम निवाले पर टेक्स लगाता है तो मानकर चलो कलयुग आना शुरू हो गया. और कलियुग में जितने भी प्राकृतिक  कार्य होते हैं वे स्वाभाविक न होकर विपरीत होने लगने लगते हैं. शास्त्रों में यह भी लिखा है कि राजा, मंत्री को परिवार वाला होना चाहिए, जिससे वह पारिवारिक स्थिति को समझकर शासन स्तर पर जनहित में सही निर्णय ले सके. इसी पैमाने पर हरियाणा की खट्टर सरकार अपनी फजीहत करा बैठी. 



हरियाणा सरकार ने आदेश निकाला कि राज्य के खिलाड़ी अपनी आय का तीस प्रतिशत शासन को दें या कोषालय में जमा करावें. बिलकुल सही है, कारण उनके राज्य की प्रतिभा ने राज्य, देश का गौरव बढ़ाया, जिसके लिए उनको जजिया कर देना चाहिए. यानि खिलाडियों के द्वारा अर्जित धन उनके दिवालिया घोषित कोषालय में जमा करे. यह कितना घटिया और निम्न मानसिकता का आदेश है, जो दिखाता है कि 'नीच निवास ऊंच करतूति, देख सखी न परायी विभूति' खैर खिलाड़ी वो भी कर सकते हैं. कारण उन्होंने स्वयं के पुरुषार्थ से वह धन, मैडल, प्रतिष्ठा कमाई है, जिसके लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन, श्रम, परिश्रम, समय की क़ुरबानी दी और बिना किसी अपेक्षा से स्वयं का प्रदर्शन कर, प्रतिभा के बल पर जीत हासिल कर देश का नाम गौरवान्वित किया, जिस पर उस प्रदेश के मुखिया को गौरव करना चाहिए था, उसकी जगह उनसे पायी हुई रकम का 30 प्रतिशत जमा कराने का कह रहे हैं.

खट्टर जी और उनका मंत्री मंडल क्या अपने वेतन भत्ते से कितनी कटौती कर सरकार के खजाने में जमा करा रहे हैं? यदि इतना नहीं कर सकते तो जो धन अन्य आय से या सुविधा शुल्क से प्राप्त करते हैं, उसे ही सरकारी खजाने में जमा करायें. वह नाम खुले में नहीं तो अनाम के नाम से. बिना परिवार के वेतन भत्तों, सुख-सुविधाओं का त्याग नहीं कर सकते और जिन्होंने राज्य और देश का नाम रोशन किया, उनसे यह  अपेक्षा रखना बहुत लानत की बात है. ऐसी सरकार को धिक्कार और ऐसा आदेश देने वालों को चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए. यह कितनी घटिया मानसिकता का घोतक है.

सरकार का यह कर्तव्य होना चाहिए कि यदि उनकी सुविधाओं में कोई कमी हो उनकी पूर्ती करे और उपयुक्त सुविधाएँ दे, जिससे उनका मनोबल बढे. सुशील कुमार का कहना है कि ऐसी नीति कहीं नहीं सुनी. खिलाडियों को खुले मन मष्तिष्क से खेलने का अवसर मिलना चाहिए. वही बबिता फोगट का कहना है कि उन खिलाडियों को कितना बलिदान और परिवार को देना पड़ता है, जिसके कारण पदक लाते हैं. योगेश्वर दत्त कहते है कि भगवान बचाये ऐसे मंत्री और अधिकारियों से. ये खेल विकास में तो कोई योगदान नहीं दे रहे, खेलों के गिरावट में अवश्य अमूल्य योगदान दे रहे हैं.

हालांकि जल्दी ही अनेक प्रकार के विरोध के बावजूद सरकार ने यह आदेश वापिस ले लिया, पर इस आदेश से सरकार का मानसिक और आर्थिक दिवालियापन दिखाई दे गया है. इस समय टेक्स लगाने में कोई कमी नहीं है. हरियाणा सरकार चाहे तो एक एक रूपया भीख टेक्स जनता पर लगा दे और हर मंत्री, विधायक एक एक कटोरा अपने अपने घर/ऑफिस/बंगला में रख ले या लगा दे, जिसमें प्रति नागरिक एक एक रूपया डालकर कोष वृद्धि कर सकते हैं. वैसे भी मुख्यमंत्री संघ के कार्यकर्त्ता रहे, परजीवी रहे, उनका कोई खरच नहीं है, वो सबसे पहले आधा वेतन सरकार के कोष में जमा कर रसीद दिखायें और जो अन्य आय, जिससे चुनाव लड़ना है और उनका विकास होना है, वह राशि भी जमा करायें, तब दूसरों से यह अपेक्षा करना यथोचित होगा.

उल्लेखनीय है हरियाणा सरकार में खेल मंत्री अनिल विज ने आज यहां उक्त अधिसूचना का समर्थन करते हुए कहा था कि नियम-56 के अनुसार अगर कोई सरकारी कर्मचारी नौकरी में रहते हुए व्यवसायिक कार्यों से कोई आय अर्जित करता है तो उसे इसका एक तिहाई हिस्सा सरकारी खजाने में जमा कराना पड़ता है. ऐसे में वे खिलाड़ी जो सरकार नौकरी में हैं और वे पेशेवर मुकाबलों अथवा विज्ञापनों से जो भी आय अर्जित करते हैं, उन्हें उसका एक तिहाई हिस्सा राज्य खेल परिषद के कोष में जमा कराना होगा, ताकि इस पैसे का इस्तेमाल राज्य में खेलों और खिलाड़ियों के विकास पर खर्च किया जा सके.
     



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