फिर दो कदम पीछे कश्मीर


"गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त, हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त"
वो जन्नत है, जहां कदम रखते ही रुहानी सुकून मिलता है। डल झील की खूबसूरती पुकारती है। कश्मीरी फिरन में लिपटी बच्चियों के गाल और सुर्ख सेब में कोई अंतर नहीं लगता, लेकिन वहीं पत्थर हाथ में लिए किशोरों को देख रूह कांप उठती है। सालों से चला अविश्वास का सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा...चलिए एक बार हो जाते हैं आवाम कश्मीर के...कुछ पल ठिठक कर ओढ़ लेते हैं कश्मीरियत...झांक कर देखते हैं इतिहास के गलियारें। आखिर कहां चूके हम...?



श्रुति अग्रवाल 

देश का विभाजन हो रहा था। हर तरफ मार-काट जारी थी। जितना खून अंग्रेजों ने इस धरती पर ना बहाया...उससे कहीं ज्यादा निर्दोंषों के खून से धरा को लाल किया गया। जलियावाला कांड सोचते ही सिहरन होती है...1947 में देश के कितने हिस्सों में जलियावाला बाग बना हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते। मैंने तो विभाजन की त्रासदी झेल चुके लोगों से बस किस्से ही सुने हैं, सच्चे से। भयावह किस्से, जो उनकी यादों में काले साए की तरह चिपके हैं। चलिए वापस कश्मीरियत की तरफ रुख करते हैं। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। 

कश्मीर के राजा हरिसिंह ने पाकिस्तान और भारत दोनों के साथ विलय से इंकार कर दिया वे स्वतंत्रता चाहते थे। 1947 में 560 अर्ध स्वतंत्र शाही राज्य जिन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के अंदर प्रभुता दी गई थी। 1947 में इनकी प्रभुता की समाप्ति घोषित हुई ये भारतीय संघ में विलय हुए लेकिन कश्मीर के महाराजा हरिसिंह कश्मीर को स्वतंत्र देखना चाहते थे। पाकिस्तान ने उनके साथ तटस्थ समझौते पर हस्ताक्षर किए लेकिन भारत के साथ कोई समझौता होता उससे पहले ही पाक ने कश्मीर की आपूर्ति को काट दिया, यह समझौते का उल्घंन था। इसके बाद कश्मीर में कबिलाइयों द्वारा गौरिल्ला हमला शुरु किया। राजा हरिसिंह और नेशनल कांफ्रेस (कश्मीर के लोकप्रिय संगठन ) के अध्यक्ष औऱ नेता शेख अब्दुला भी भारत के साथ थे। 

उन्होंने भी भारत के साथ मिलकर रहने की इच्छा जताई। हरि सिंह ने गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन को कश्मीर की वस्तुस्थिति से परिचय करवाकर भारत में विलय का निवेदन किया। 24 अक्टूबर से 27 अक्टूबर ...मात्र 3 दिन के भीतर कश्मीर भारत के अंदर हो गया। इसी दिन भारतीय सेना ने कश्मीर से पठान हमलावरों को खदेड़ने के लिए अपनी सेना भेजी और कश्मीर को भारत में अधिमिलन कर अभिन्न अंग बना लिया। तब से लेकर हर एक दिन कश्मीर दो कदम आगे बढ़ने की जगह पीछे लौटता गया। जिन 3 दिनों के अंदर कश्मीर के राजा ने भारत से विलय का निर्णय लिया था, वहां की आवाम भी भारत का हिस्सा बनकर खुश थी, उसी कश्मीर में कश्मीरियत हर रोज 2 कदम पीछे जा रही है।

साल-दर-साल कश्मीर को नए सपने दिखाएं जाते हैं, साल-दर-साल राजनीति की सुरसा इंसानियत को निगलती जा रही है। धरती का यह स्वर्ग राजनीतिक रस्साकशी में रोज घुट-घुट कर थोड़ा-थोड़ा दम तोड़ रहा है। हर साल उम्मीद की जाती है कश्मीर की धरती सेना के जवानों और बाशिंदों के खून से नहीं नहाने की जगह केसर से महकेगी...लेकिन हर साल यह सपना कांच की तरह टूट बिखर जाता है। क्यों वक्त दिया गया कश्मीर को आंतकवादियों के शिंकजे में आने का? 

आखिर क्यों वहां के बच्चों को बहकने दिया गया कि वे हाथ में स्कूल के बस्ते की जगह पत्थर पकड़ लें...आखिर क्यों? कल से सोशल मीडिया पर भाजपा और पीडीपी के गठबंधन के टूटने को लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं...मेरी समझ में सिर्फ एक बात ही आई...इस बार भी कश्मीर के सपनों को राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया। जिन नेताओं को मिलकर आतंकवाद की कमर तोड़नी थी वे अपनी-अपनी रोटियां सेंकने में लगे रहे। अब कश्मीर राज्यपाल  शासन के हवाले है, लेकिन मेरी आंखों में एक हसीन स्वर्ग का सपना है...। 

कहते हैं सपने सच नहीं होते, स्वर्ग जैसी जगह कोरी कल्पना है....जब तक गंदी राजनीति है, कश्मीर कभी स्वर्ग नहीं बनेगा। हम कभी यह नहीं कह पाएंगे कि....धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है तो वह सिर्फ कश्मीर में है...सिर्फ कश्मीर में..

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