झुग्गी बस्ती से निकलकर बच्चे बोले 'good morning sir'




हम अपने बच्चों को अपने जैसे नहीं रहने देना चाहते, लेकिन क्या करें, 

पेट और परिवार के लिए अपनी रोजी रोटी की जुगाड़ से ही फुर्सत नहीं मिलती. 

ऐसे में उनके बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा अपने अन्दर एक समाजसेवा का जूनून 

रखने वाले युवा श्री मनोज कौशल सोनी ने उठा लिया, इससे वे काफी खुश हैं...

@ मुकुट सक्सेना 



हर साल स्कूल चलो अभियान चलता है. कहा जाता है 'कोई बच्चा छूट ना पाये', लेकिन मध्यप्रदेश के विदिशा जतरापुरा में जाएँ तो देखेंगे यहाँ 10-12 साल तक के बच्चे स्कूल नहीं जाते. पढ़ने वाले बच्चों में इनका कहीं किसी स्कूल में नाम नहीं लिखा है. ऐसा नहीं है कि यह पढ़ना नहीं चाहते, लेकिन इन तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है. अभिभावकों को पेट के लिए अपनी रोजी रोटी की जुगाड़ से ही फुर्सत नहीं मिलती.  


खैर अच्छा यह है कि यहाँ एक समाजसेवा का जूनून पाले हुए युवा मनोज कौशल सोनी हैं. श्री मनोज पिछले कई माहों से ऐसे बच्चों को ढूंढ कर इकट्ठा कर समझा बुझाकर नि:शुल्क पढ़ाने का यज्ञ कर रहे हैं. हमने यहाँ का दौरा किया तो क्लास में जाते ही बच्चे बड़े अदब से खड़े हुए और 'good morning sir' बोले. जी हाँ, स्कूल नहीं गए, लेकिन बच्चे 'good morning sir' बोल रहे थे. बेहद अच्छा लगा. 


बच्चे बढ़े तो श्री मनोज ने छोटे बालकों को पढ़ाने उन्हीं में से एक बच्चे श्याम आदिवासी को पढ़ाने लायक तैयार कर लिया.
हमने झुग्गी के बच्चों और उनके माता पिता से मिलकर उनकी समस्याओं को भी जाना. बारिश का मौसम सिर पर है झुग्गियों पर छत छप्पर तिरपाल पन्नी नहीं है. हाँ, लाइन से बहुत पास पास ढेर सारे शौचालय अवश्य बन गए हैं. निवासी बताते हैं कोई योजना आई थी. ये अलग बात है कि यूज नहीं होते, पानी ही नहीं है यूज हों तो कैसे? निवासी बिजली, पानी सहित कई समस्याओं से जूझ रहे हैं. बताते हैं ऐसे में हम कैसे बच्चों की पढाई पर ध्यान देते. वे बताते हैं हम अपने बच्चों को अपने जैसे नहीं रहने देना चाहते, लेकिन क्या करें इन सब समस्याओं में. आश्चर्यजनक है कि ये लोग जिला मुख्यालय स्तर पर मूलभूत सुविधाएं से मरहूम हैं. 



अतिक्रमण की चपेट में शासकीय स्कूल जतरापुरा, यहाँ ही पढ़ा रहे हैं फिलहाल श्री मनोज झुग्गी झौपड़ी के बच्चों को 
ऐसे में उनके बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा एक समाजसेवा का जूनून वाले युवा श्री मनोज कौशल सोनी ने उठा लिया, इससे वे काफी खुश हैं. श्री मनोज कई माह से झुग्गी बस्ती में ही एक पेड़ के नीचे नियमित आकर नि:शुल्क अध्यापन कर रहे हैं. वे बच्चों को एक अलग अंदाज में भी सिखा रहे हैं. बातचीत में उन्होंने बताया बच्चे काफी प्रतिभा शाली हैं, उन्हें अवसर मिला तो बहुत आगे जायेंगे. 




श्री मनोज कौशल सोनी 
उन्होंने बताया बच्चे बढ़े तो उन्हीं में से एक बच्चा श्याम आदिवासी  को छोटी कक्षा के बच्चों को पढ़ाने लायक तैयार कर लिया. वह एक साल पहले ही मेरे पास आया था. 12 साल में इसका नाम कक्षा एक में लिखवाया था. अब सब पढ़ लेता है, पहले कुछ नहीं आता था.

श्री मनोज का मानना है कि बच्चों को पढ़ाया नहीं जाएगा तो अपराध बढ़ेंगे, यही बच्चे बड़े होकर अपराधी बनेंगे. उनका कहना है कि शिक्षा पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. शिक्षा महंगी भी नहीं होनी चाहिए. इसके लिए शासकीय स्कूलों पर ही ठीक से ध्यान दिया जाना जरूरी होगा.  
शासकीय स्कूल जतरापुरा के
प्रधान अध्यापक
श्री सोनसायराम भगत
उन्होंने बताया समाजसेवी लोग सहयोग कर रहे हैं. नगर पालिका अध्यक्ष श्री मुकेश टंडन के सहयोग से अब पास ही जतरापुरा स्कूल में बच्चों को बिठा कर पढ़ाने के लिए जगह मिल गई है. कई बच्चों के स्कूल में नाम भी लिखा दिए गए हैं. उपस्थित लोगों का औपचारिक बातचीत में कहना था कि बच्चों की जिम्मेदारी सरकार को लेनी चाहिए. सरकार की योजनाएं, जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचना ही चाहिए, जो अभी नहीं पहुँच पा रही हैं. बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने के लिए उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और बचपन सुरक्षित रखने का प्रयास सरकार और उसके साथ हम सभी को मिल कर करना होगा. 

शासकीय स्कूल जतरापुरा की अलग हालत है. स्कूल छोटा तो है ही, उसके बाहर खेल मैदान की जगह पर आस पास के लोग बागड़ बढ़ा कर उसे लीलते जा रहे हैं. स्कूल में 154 बच्चे रजिस्टर्ड हैं, लेकिन उस हिसाब से जगह पर्याप्त नहीं दिखती. 2 शिफ्ट में क्लास लगाई जाती है. एक अच्छी बात सामने आई कि प्रधान अध्यापक श्री सोनसायराम भगत भी श्री मनोज की ही तरह शिक्षा देने में विशेष रूचि रखते हैं. वे श्री मनोज को अपेक्षित सहयोग दे रहे हैं. 



बच्चों के बारे में कुछ ख़ास जानकारी 
जो स्कूल नहीं जाते. श्री मनोज बताते हैं  सभी लगभग 4 महीने से हमारे साथ पढ़ रहे हैं. 15 जून के बाद स्कूल में नाम लिखाएँगे.
 ऐसे ही लगभग 15 बच्चे और हैं.
कुछ बच्चों के लिए उनके माता पिता को समझाना बड़ा मुश्किल था, लेकिन बच्चों को पढ़ाना तो वे भी चाहते हैं. स्कूल तक लेकर आये हैं, नाम भी लिखवाएंगे. 

सूरत सिंह, उम्र 10 साल स्कूल नहीं जाता
हरिराम, उम्र 12 साल ,स्कूल नहीं जाता, अब नाम लिखाएंगे 
चायनी आदिवासी, उम्र 10 साल, स्कूल नहीं जाती

समंदर सिंह, उम्र 12 साल, स्कूल नहीं जाता, जून में प्रवेश करवाएंगे.
 पढ़ना लिखना नहीं आता था, अब खूब पढ़ लेता है 

कन्हैया, उम्र 8साल, स्कूल नहीं जाता 

अभिभावकों की अपनी अलग समस्याएं 
हैं, उन पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी होगा. आखिर स्कूल के बाद वे वहीं तो बहुत कुछ परिवार माता पिता से सीखते हैं 


बारिश सिर पर है, झुग्गी पर चढ़ाने एक पन्नी भी नहीं, योजना आई तो पक्का शौचालय 
अवश्य बन गया. अब पानी नहीं है उपयोग नहीं हो रहा कोई बात नहीं


योजना आई तो लाइन से पक्के शौचालय अवश्य बन गये, 
लेकिन काम 'लोटा 'ही आ रहा है. पानी है नहीं, कैसे उपयोग करें ?




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