बिखरी पंखुड़ियां


''मधु जब कभी परी का मासूम और प्यारा चेहरा देखती, उसे अपने प्रेम पर पछतावा नहीं होता और इंतजार के पल सुखद हो जाते! आज मधु बहुत उदास थी, कल ही शर्मा जी के घर में सन्तोष के विवाह का कार्ड अपनी आंखों से जो देख आयी थी.''



- सीमा "मधुरिमा'' लखनऊ 


ज बार बार मधु उन पंखुड़ियों की तरफ देख रही थी, जो उसकी किताबों की अलमारी से तब बाहर आ जमीन पर गिर गयी, जब उसकी पांच वर्षीय बेटी, जो अपना कोई खिलौना ढूंढ़ रही थी, उस अलमारी से! मधु पिछले छः सालों से इन सूखे फूलों को एक किताब में छुपाकर रखा था, उसे आज तक भी जाने क्यों सन्तोष पर पूरा भरोसा था, जब वो दुबई से वापस लौटेंगे तो उसे और उनकी प्रेम की निशानी परी को अपना लेंगे! 

मधु सन्तोष के घर में खाना बनाती थी और फिर सन्तोष के काफी मनुहार के बाद उसके प्रेम को स्वीकार कर उसके साथ उस हद तक गुजर गई कि आज परी उसके गोद में थी, पर जब सन्तोष की माँ को यह सब पता चला तो उन्होंने उसको तुरंत ही काम से निकाल दिया! अब मधु के पास इंतजार के शिवा कोई चारा न बचा था! 

मधु जब कभी परी का मासूम और प्यारा चेहरा देखती, उसे अपने प्रेम पर पछतावा नहीं होता और इंतजार के पल सुखद हो जाते! आज मधु बहुत उदास थी, कल ही शर्मा जी के घर में सन्तोष के विवाह का कार्ड अपनी आंखों से जो देख आयी थी. उसे कुछ समझ न आ रहा था क्या करे, जो सपना वो सालों से देख रही थी, अचानक ही बिखर गया था. उस पर आज परी ने ये सूखे फूल, जो सन्तोष के प्रेम की तरह ही सूख चुके थे, न ही उसके रंग में वो चमक बची थी और न ही खुशबू, इनका यूँ जमीन पर बिखर जाना जाने क्यों मधु को सुखद लगा, आखिर क्यों इसे वो वर्षों से सहेज रखी थी, उसे समझ न आ रहा था! मधु ठगी जा चुकी थी एक बुर्जुआ वर्ग और सर्वहारा वर्ग में रिश्ता?


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