'गुड़िया के बाल' खाने से भी आसान है आत्महत्या, और सूरज को छूने से भी मुश्किल है 'जीवन' जीना


''जो लोगों के कठिन प्रश्नों के जवाब देता रहा हो, वो खुद कहीं जाकर बेजवाब हो जाए. सच कहूं तो उन्होंने उन लाखों करोड़ों आम आदमियों की कद्र बहुत बढ़ा दी, जो किराए का मकान, घर की लड़ाईयां, बच्चों की फीस, बूढ़ों की बीमारियां और बच्चों की शादियां, इन सबसे गुजरते हुए भी जिंदगी को जीना जानते हैं, छोड़ना नहीं.'' 





@ आशीष नागर     

जिससे मिलकर लोग अपना आत्महत्या का विचार बदल दें, वो स्वयं ही अगर आत्महत्या कर ले. जो लोगों के कठिन प्रश्नों के जवाब देता रहा हो, वो खुद कहीं जाकर बेजवाब हो जाए. जिस पर जवाबदारी हो, वह स्वयं बोझ हो जाए. जिसने जीवन जीने का संदेश फैलाया, वो स्वयं मौत को गले लगा ले. इसमें कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन भय्यूजी महाराज (आध्यात्मिक संत एवं मध्यप्रदेश में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त) की आत्महत्या ने मेरी नजर में उन लाखों करोड़ों आम आदमियों की कद्र बहुत बढ़ा दी, जो किराए का मकान, घर की लड़ाईयां, बच्चों की फीस, बूढ़ों की बीमारियां और बच्चों की शादियां, इन सबसे गुजरते हुए भी जिंदगी को जीना जानते हैं, छोड़ना नहीं. 

'गुड़िया के बाल' खाने से भी आसान है आत्महत्या, और सूरज को छूने से भी मुश्किल है 'जीवन' जीना. आज इस पोस्ट के माध्यम से मैं उन सभी लोगों को नमन करता हूं, जिन्होंने सामान्य गृहस्थ जीवन में प्रवेश लेते हुए अपनी सभी सामाजिक और पारिवारिक जवाबदारियों का निर्वहन करने की कोशिश बखूबी की.

मैं चाहूंगा कि भय्यूजी महाराज द्वारा दिया गया, यह हताशा से भरा संदेश इतिहास के पन्नों पर दर्ज ना हो. 



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