वो 'इमली का बूटा' वाले दिन



इमली का बूटा बैरी का पेड़
इमली खट्टी मीठी बैर
गाना हम नहीं गाते थे
हमें तो इमली बहुत भाते थी
हाथ में सरकारी स्कूल का बस्ता
क्यों अंग्रेजी पढने वालों बच्चों के
बसते पीठ पर टंगे रहते जैसे गधे के
हमारे बसते में पढने का बिछौना
किताबें और काॅपी के कभी ऊपर 
तो कभी नीचे रहता था!

मस्त दोनों भाई बहन जैसे 
कोई लंगोटिया यार हो
घर से स्कूल को जाते
रास्ते में इमली के पेड़ से टकराते
नीचे बिखरे रहते कुछ खट्टे मीठे मोती
पर इतने से क्या होने वाला है
पूरी क्लास की मित्र मंडली के लिए
टिफिन में मुँह मीठा करने जो ले जाना था!

पेड़ को खूब हिलाते ढुलाते
जब पेड़ हम पर धीरे से हँसता 
फिर हम न हिम्मत हारने वाले
बच्चों की तरह पत्थर पे पत्थर मारते 
तरसते बारिश की बूंदों के लिए
किसान आसमान की ओर टकटकी 
लगाएं देखता है वैसे हम देखते
थोड़ी देर के लिए इंद्र देवता खुश होके
कुछ वर्षों की बूंदें छीट देते
हम खुश होते इन्हें बसते में रखकर
क्या दिन थे वो आनंद के
न पढने न पैसे कमाने की चिंता थी!

टिफिन पर सबके बसते खुलते
खाना एक दुसरे को खिलाते
दुकान से एक मुठ्ठी नमक मांग लाते
इमली संग लगाकर चटकारे भरते
तब पैसे नहीं लगते थे
स्कूल के बच्चे समझ दुकानदार
खुशी से हमें दे देते थे 
पर अब तो मांगने पर 'ज़हर' नहीं मिलेगी
नमक क्या मिलेगा 
वो भी दस रूपये किलो है 
हा हा हा 
बीत गए वो जमाने के दिन
अब तो कोई किसी के साथ
न खाता पीता न ही बाँटता है
लड़ाई करने पर दी हुई चीजों को 
दोस्तों से वापस मांगते थे 
अब तो कोई उधार में भी
वो लड़ाई नहीँ दे सकता 
न ही 
वो बीते प्यारे दिनों की वापसी!


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News Digital India 18

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