आपातकाल, आकंड़ों के खेल से पेट नहीं भरता साहेब





''आज सिस्टम कुछ ऐसा हो गया है कि 6 माह के बाद बच्चा मनमानी करना शुरू कर देता है. बच्चे से आप टीवी का रिमोट या मोबाइल या उसकी कोई और मनचाही वस्तु को छुड़ाकर तो देखो..''


-डॉक्टर अरविन्द जैन



अनुशासन की वकालत करते सब दिखते हैं, लेकिन जब बात खुद पर आये तो... इधर उधर बात घुमाने लगते हैं. आज सिस्टम कुछ ऐसा हो गया है कि 6 माह के बाद बच्चा मनमानी करना शुरू कर देता है. बच्चे से आप टीवी का रिमोट या मोबाइल या उसकी कोई और मनचाही वस्तु को छुड़ाकर तो देखो.. नियमों से बंधे और अनुशासन में रह कर भी हम स्वतंत्र कहलाते हैं, विपरीत यदि हम स्वतंत्रता के नाम पर नियम तोड़ें या अनुशासनहीनता बरतें तो यह स्वंतत्रता नहीं, बल्कि स्वछन्दता ही कही जायेगी. आज हमने हम स्वतंत्रता का अर्थ स्वछन्दता से लगा लिया है, जो कि गलत है. आज कोई भी व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता में बाधा नहीं चाहता. हकीकत यह है कि उसे स्वयं जानकारी नहीं होती कि वह स्वतंत्रता की बात कर रहा है या स्वछन्दता की.


नियमों में रहना और मनमानापन करने में अंतर होता है. नियमों में रहना परतंत्रता नहीं होती. उसी प्रकार स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि आप कुछ भी मनमानापन करें. जब कार्य नियम विरुद्ध होने लगते हैं, जैसे हमारे यहाँ नियम है कि रोड पर बांये चलना है, लेकिन जब आप इस नियम को तोड़ेंगे और दांये चलेंगे तो दुर्घटना होना तय है. और जब ऐसे नियम विरुद्ध चलने वालों की संख्या ज्यादा हो जाए तो उस पर कंट्रोल के लिए कुछ कड़ी कार्यवाहियां जरूरी होती हैं. जब स्वछंदता, स्वतंत्रता पर हावी हो जाए, और स्वतंत्रता को बचाने के लिए कार्यवाही करना हो, तब संविधान में इस स्थिति से निपटने के लिए शासक को आपातकाल के अधिकार दिए गए हैं. और आपातकाल में परेशान वही लोग होते हैं, जो नियम विरुद्ध कार्य करने के आदी हो गए होते हैं, नियम अनुसार कार्य करने वाले लोगों को कभी कोई दिक्कत नहीं होती.

पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी के आपातकाल में भी संविधान में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था. मात्र उसका क्रियान्वयन किया गया था, उसके कारण जो असंवैधानिक या नियम विरुद्ध कार्यवाही में लिप्त रहे उनको कष्ट रहा, बाकी उस समय भी समय से सब काम हो रहे थे. रेलगाड़ियां समय पर चल रही थीं, कर्मचारी समय से नौकरी कर रहे थे, बल्कि यह कहा जाए कि आम जनमानस में आपातकाल से जीवन शैली में एक नवीनता का संचार हुआ. 



केवल वो लोग जो स्वच्छंदता के पोषक थे, के लिए वह समय अपचनीय रहा. सवाल यह भी है कि क्या आज भी सरकार अनुशासन हीनता पसंद नहीं कर रही? आज प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सत्ता के पास मजबूत समर्थन होने से वह भी वे ही कदम उठा रहे हैं, जो पूर्व में आपातकाल में सरकार ने उठाये थे. अंतर बस इतना है कि उस समय आपातकाल घोषित था, तो आज अघोषित है. उस समय इंदिरा गाँधी घोषित तानाशाह थीं, तो आज प्रधानमंत्री मोदी अघोषित तानाशाह के रूप में जाने जा रहे हैं. उस समय इंदिरा गाँधी दुर्गा के अवतार के रूप में ख्यात थीं, तो आज प्रधानमंत्री मोदी स्वयं हिटलर के समान नहीं, पर हिटलर जैसे आचरण के माने जा रहे हैं. व्यक्ति स्व-निरीक्षण नहीं करता, पर कार्यशैली के अनुरूप जाना जाता है. आज सत्ता में मोदी तो पार्टी में अमित के बिना पत्ता नहीं हिल सकता, इसे अनुशासन कहें या हिटलर शाही. सब ओर नैतिकता का अभाव देखा जा रहा है. इस 4 साल के कार्यकाल में जितनी भी योजनायें आईं, अधिकांशत: असफल हैं. और अहंकार, निर्लज्जता देखिये खुले मंच से स्वीकार कर रहे हैं कि सत्ता के लिए जुमले फेंकना पड़ता है. 

आज अधिकांशतः समाचार/मीडिया शासन के विरुद्ध अधिक समाचार प्रकाशित नहीं कर पा रहा. कई 2 कौंड़ी के नेताओं से सम्मान पत्र पाकर फूले नहीं समाते. आज ज्यादातर मीडिया मात्र शासक की भारी प्रशंसा का टूल बन कर रह गया है. और जो इसके विपरीत नियमानुसार की श्रेणी में आते हैं, गलत का विरोध करते हैं, रात को दिन नहीं कह पाते, उनके ऊपर अनेक हथकंडे अपनाकर उन्हें दोषी करार कर कार्यवाही की जा रही है. ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं. 



यदि प्रधानमंत्री मोदी आत्मचिंतन करें कि उनके द्वारा जो योजनायें नोटबंदी, जीएसटी एक राष्ट्र एक कर, आधार योजना जमीनी स्तर पर किस हाल में हैं और इनसे जनता को क्या फायदा हुआ? बेरोजगार की समस्या, नए उद्योगों का न आना और कितने निवेशक अपना बोरिया बिस्तर बांधकर वापिस चले गए? पाकिस्तान के द्वारा की गयी कार्यवाही के विरुद्ध कितनी सफलता मिली? व्यापार की स्थिति का मूल्यांकन करें, कर बढ़ोत्त्तरी से व्यापार में कितना बढ़ावा मिला? नकली नोट जमा हुए थे कि आज जो नोट मिल रहे हैं वे नकली हैं? इस सब पर इमानदारी से आत्मचिंतन करेंगे तो देश के लिए और स्वयं आपके लिए भी बेहतर होगा. 

आकंड़ों के खेल से किसी का पेट नहीं भरता. कितनी जीडीपी बढ़ी या घटी, ये आप लोगों का काम है. जनता सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान के लिए आज 70 वर्ष बाद भी संघर्षरत है. आप अपनी मन की बात या अन्य मंचों से ऊँची आवाज में चिल्ला चिल्ला कर उद्घोषणा करते हैं, पर जमीनी हकीकत दूसरी है. शौचालयों का हाल बेहाल है. फ़र्ज़ी आंकड़ों से गदगदायमान हो रहे हैं. स्वच्छ भारत के नाम पर धन का दुरूपयोग हो रहा है. घटनाएं परिस्थिति के अनुरूप बनती हैं. कोई भी सत्ता का त्याग नहीं करना चाहता. क्या आज आप भी वरिष्ठतम  लोगों को दर किनार कर स्वयं सत्ता में आसीन नहीं हैं? उस समय का मूल्यांकन आज के परिप्रेक्षय में करना उचित नहीं. क्यों आज जम्मू कश्मीर में आपने राज्यपाल शासन लगाया, इसका मूल्यांकन कुछ समय के बाद कोई और करेगा तो उसमें अवश्य ही कुछ न कुछ गलतियां निकलेंगी.

(डिजीटल न्यूज़ सर्विस नेटवर्क )


                





Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc