एक हद के बाद तने हुए मुक्के भी राहत चाहते हैं


''बस कोई यह न समझाने की कोशिश करे कि मेरे परमाणु बम तो हरसिंगार के फूल है, बस तेरे खतरनाक हैं, इसलिए तू अपने नष्ट कर और मेरे, मेरे पास रहने दे. अन्यथा इस तरह की होशियारियों का क्या हश्र होता है, यह हम ईरान के मामले में देख चुके हैं.''




@ लोकमित्र गौतम 

मरीका और उत्तर कोरिया पिछली सदी के साठ के दशक से एक दूसरे के विरुद्ध तने हुए मुक्के थे. पिछले करीब आधा दशक से तो उत्तर कोरिया तकरीबन आत्मघात की हद तक तने जा रहा था. उसकी नसें हर गुजरते दिन के साथ तनतनाती ही जा रही थीं. इस तान से अमरीका तो नहीं मगर दक्षिण कोरिया और किसी हद तक जापान भी सचमुच डर गए थे. उनका डरना स्वाभाविक भी था और यह अच्छा ही रहा, क्योंकि यह डर एक स्वाभाविक डिटेरेंट बन गया. अगर ये डरे नहीं होते और जरा भी संतुलन गडबडाता, दक्षिण कोरिया या जापान ने अगर जरा भी संयम तोड़ा होता या इन दोनों की तरफ से अमरीका ने संयम तोड़ा होता तो अनहोनी नहीं, अनहोनियाँ होनी तय थीं, क्योंकि मनोविज्ञान ही नहीं युद्ध का इतिहास भी बताता है कि वह दुश्मन सबसे खतरनाक होता है, जिसे मरने का डर न हो, फिर चाहे वह कितना ही कमजोर क्यों न हो? उत्तर कोरिया ऐसा ही दुश्मन था.

लेकिन अब जबकि ट्रम्प और किम के बीच एक नामुमकिन सा लगने वाला समझौता हो गया है तो इसका बराबरी के स्तर पर सम्मान हो. कोई यह न समझाने की कोशिश करे कि मेरे परमाणु बम तो हरसिंगार के फूल है, बस तेरे खतरनाक हैं, इसलिए तू अपने नष्ट कर और मेरे, मेरे पास रहने दे. अन्यथा इस तरह की होशियारियों का क्या हश्र होता है, यह हम ईरान के मामले में देख चुके हैं.

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