किसान की असल समस्या यह है, जैसे ही फसल कटती है, रेट धड़ाम हो जाते हैं




सरकार की समर्थन और भावांतर
जैसी योजनाएं व्यापारियों के लिए

''लहसुन की फसल बम्पर हुई, अचानक भाव गिरे. टमाटर बाजार में आना शुरू हुआ, दो रुपए किलो भी नहीं बिका. गेहूं-चना बाजार में आया और उसके भाव भी गिर गए. अब मूंग की फसल कट चुकी है और जैसे ही किसान मूंग को बाजार में लाने की तैयारी में जुटा, इधर व्यापारियों ने भाव गिरा दिए. किसान की असल समस्या यह है, जैसे ही फसल कटती है, रेट धड़ाम हो जाते हैं...''





- संजय सक्सेना 


लहसुन की फसल बम्पर हुई, अचानक भाव गिरे. टमाटर बाजार में आना शुरू हुआ, दो रुपए किलो भी नहीं बिका. गेहूं-चना बाजार में आया और उसके भाव भी गिर गए. अब मूंग की फसल कट चुकी है और जैसे ही किसान मूंग को बाजार में लाने की तैयारी में जुटा, इधर व्यापारियों ने भाव गिरा दिए. उपभोक्ता को तो इससे खास लाभ होता नहीं है, लेकिन किसान को नुकसान हो जाता है. सवाल उठता है कि क्या व्यापारी सरकार से बड़ा हो गया? या फिर सरकार व्यापारी से मिली हुई है?

प्रदेश सरकार किसानों के लिए लगातार योजनाएं बना रही है और घोषणाएं कर रही है. किसी उपज पर बोनस दिया जा रहा है, तो किसी पर भावांतर का लाभ दिलाने का प्रयास किया जा रहा है. मूंग की फसल बाजार में आने की तैयारी हुई और बाजार में मूंग के भावों में गिरावट आ गई. इस समय बाजार में गर्मी की मूंग के भाव 800 से लेकर 1000 रुपए प्रति क्विंटल तक कम चल रहे हैं. इसे देखते हुए सरकार ने तुरंत समर्थन मूल्य योजना के तहत मंडियों में मूंग की खरीदी करने का ऐलान कर दिया. यह 5 हजार 575 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से उन 12 जिलों में होगा, जहां गर्मी की मूंग का रकबा दो हजार हेक्टेयर या अधिक होगा.



बताया जा रहा है कि इस साल लगभग तीन लाख हेक्टेयर में मूंग की बोवनी की गई है. मूंग बेचने के लिए पंजीयन 6 जून से 20 जून तक होगा. मूंग खरीदी के पहले राजस्व विभाग 21 से 25 जून तक पंजीकृत किसानों के रकबे का सत्यापन करेगा. पंजीयन के वक्त किसान को रकबे का भू-अभिलेख, आधार कार्ड की प्रति, मोबाइल नंबर और बैंक खाते की जानकारी देनी होगी. मूँग की खरीदी के लिए किसानों के पंजीयन का कार्य उन्ही जिलों मे किया जा रहा है, जहाँ मूँग की बोवनी का रकबा 2 हजार हेक्टेयर या उससे अधिक है.

इनमें होशंगाबाद, सीहोर, रायसेन, नरसिंहपुर, जबलपुर, हरदा, विदिशा, गुना, देवास, इंदौर, धार और बालाघाट शामिल हैं. सरकार की योजना के अनुसार प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूँग की, मंडी विक्रय दरें न्यूनतम समर्थन मूल्य 5575 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे होने पर एफएक्यू गुणवत्ता की मूंग उपार्जन केन्द्रों पर खरीदी जायेगी.

सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदेगी, यह तो अच्छी बात है, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न तो यहां पर यह उठ रहा है कि क्या सरकार का व्यापारियों पर कोई नियंत्रण नहीं है? आखिर उपज आने के पहले तक मूंग के भाव अच्छे थे, फसल कटते ही अचानक गिर कैसे गए? इसके पहले लहसुन, टमाटर, प्याज समेत कई फसलों के साथ भी ऐसा हो चुका है, लहसुन को भावांतर में खरीदने की घोषणा हुई तो अचानक उसके भाव जमीन ला दिए गए, असल में भावांतर किसानों के लिए भले ही लाया गया हो, लेकिन व्यापारियों ने बड़े योजनाबद्ध तरीके से किसान से ज्यादा भावांतर की राशि खुद ही वसूल कर ली, यही मूंग के समय हो रहा है. 

सोयाबीन में भावांतर योजना का लाभ किसानों तो प्रति क्विंटल तीन से पांच सौ रुपए तक ही मिला, लेकिन व्यापारियों ने एक हजार रुपए तक प्रति क्विंटल खाईबाजी कर ली. यानि एक क्विंटल पर व्यापारी ने एक हजार रुपए तक कमा लिए. इसका सबसे ज्यादा घाटा हुआ सरकार को, वो भी करोड़ों में. हर फसल के दौरान अब ऐसा ही हो रहा है. अरबों का घाटा होने के बाद भी आखिर सरकार की नींद क्यों नहीं खुल रही? 

यह आश्चर्य की बात तो है ही, एक संदेह भी है. लगता है कि सरकार खुद भी व्यापारियों की इस साजिश में साथ है. तभी तो वायदा व्यापार से लेकर हर मामले में उन्हें संरक्षण ही नहीं बाकायदा बढ़ावा दिया जा रहा है. किसानों को भावांतर या समर्थन मूल्य से मिलने वाला लाभ केवल दिखावा ही साबित हो रहा है, क्योंकि यह तो बाजार से ही तय हो रहा है. उसकी उपज में लगने वाली लागत का ध्यान तो सरकार रख ही नहीं रही है. बस, यही किसान की असली नाराजगी का कारण है. सरकार दिखाने के लिए तो किसान के साथ खड़ी है, लेकिन उसके असल साथी तो व्यापारी ही हैं, जिनके लिए वो समर्थन और भावांतर जैसी योजनाएं लाती है.




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