वो कोई 5-6 साल की छोटी बच्ची जेब से पर्स निकालने की कोशिश में थी..





''जिन हाथों में खिलौने और पुस्तकें होना चाहिए, वे हाथ 40-50 रुपये के लिए चाय की दुकान पर कप धोते हैं. कंधे पर स्कूल के बस्ते की जगह हमारे घर पर लगने वाली सीमेंट के बस्ते हैं. मज़दूरी कोई शर्म का पेशा नहीं, न ही कोई काम छोटा होता है, लेकिन बाल मजदूरी उस समाज के लिए शर्मनाक धब्बा है, जहाँ तथाकथित बुद्धिजीवी विलासिता के अंधेपन में अपने आँगन के बाहर झाँकना नहीं चाहते.''




@ निखिल दवे  




रसों उज्जैन के महाकाल मंदिर के बाहर बहुत भीड़ थी, अचानक जीन्स में पीछे की जेब में कुछ महसूस हुआ, हाथ लगाया तो मेरे हाथ में एक हाथ था. पलट कर देखा तो कोई 5-6 साल की छोटी बच्ची जेब से पर्स निकालने की कोशिश में थी. मैं स्तभ्ध था और शर्मिंदा भी, अधनंगे बदन पर फटे कपड़े पहनी वो बच्ची ज़मीन पर लेट गई. थोड़ा 2 शब्द डाँटने के सिवा मैं कुछ कर भी नहीं सकता था, लेकिन वो बच्ची शरारत से मुस्कुराती रही, यह और भी आश्चर्यजनक था. शायद वह जानती थी कि मैं कुछ नहीं करूंगा. मैं वहाँ से निकल गया. 

उस बच्ची का जितना दोष नहीं, उससे अधिक उसके माता-पिता का है. ग़रीबी में पैदा हुए इस तरह के बच्चे अक्सर या तो मज़दूरी करते हैं, भीख मांगते हैं या चोरी और नशे की आदत में जीवन गुज़ार देते हैं.
भय, भूख और अशिक्षा में कुपोषित होते बचपन को बचाना आज समय की माँग है. अभावों में जीने वाला यह बचपन दुष्प्रभावों से घिरकर रोगी होता जा रहा है. मजदूरी, चोरी इसका न तो शौक है न ही इसकी इच्छा, यह उस पर थोपा गया एक बोझ है, जिसके तले उसका भविष्य और जीवन दोनों कुचले जा रहे हैं. अज्ञानता इन्हें नशे के उस मुकाम पर पहुँचा देती है, जहाँ से यौवन तक पहुंचने के पहले ही ये ख़त्म हो जाते हैं.

बाल मजदूरी कानूनन अपराध है, लेकिन उससे बढ़ कर यह एक सामाजिक कुरीति है, एक ऐसी कुरीति, जिसके दूरगामी परिणाम समाज में वर्ग संघर्ष को जन्म देते हैं. यह हमारे आसपास बेख़ौफ़ चलने वाली वो प्रक्रिया है, जिसमें हम मूकदर्शक बन उसके सहयोगी के रूप में खड़े हैं.

हम कह सकते हैं कि ग़रीबी से जुझता वो बच्चा हमारी ज़िम्मेदारी नहीं, माँ-बाप पाल नहीं सकते, तो पैदा क्यों करते हैं? लेकिन ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए, शादी का उतावलापन, जितना स्वयं लड़के या लड़की में नहीं होता उससे ज्यादा दबाव समाज का होता है, फिर यही दबाव बच्चे पैदा करने में भी होता है. अशिक्षा और ग़रीबी से हीन बने समाज में समझदारी से निर्णय लेने के लिए न तो विकसित सोच होती है न ही शादी, और उसके बाद बच्चे पैदा करने की परंपरा का विरोध करने का साहस. इसलिए वो परंपरा में बँधा अज्ञानी व्यक्ति समाज के विवाह और बच्चे पैदा करने की परंपरा को आगे बढ़ता है, साथ ही मज़दूरी के अपने खानदानी पेशे में एक बचपन को भी झोंक देता है.

मज़दूरी कोई शर्म का पेशा नहीं, न ही कोई काम छोटा होता है, लेकिन मेरा स्पष्ट मत है कि बाल मजदूरी उस समाज के लिए शर्मनाक धब्बा है, जहाँ तथाकथित बुद्धिजीवी विलासिता के अंधेपन में अपने आँगन के बाहर झाँकना नहीं चाहते.

जिन हाथों में खिलौने और पुस्तकें होना चाहिए, वे हाथ 40-50 रुपये के लिए चाय की दुकान पर कप धोते हैं. कंधे पर स्कूल के बस्ते की जगह हमारे घर पर लगने वाली सीमेंट के बस्ते हैं. मज़दूरी, चोरी और नशे में झोंके गए बच्चे, इस समाज का वीभत्स पहलू है और हम स्वयं को सभ्य समाज कहते हैं. अगर यही सभ्य समाज की पहचान है तो शायद सभ्यता भी शर्मिंदा होगी.

सिर्फ आलीशान जीवन जीने वाले और महँगे विद्यालयों में पढ़ाई के नाम पर स्वांग रचने वाले बच्चे ही भारत का भविष्य नहीं. भारत की विडंबना है कि जहाँ बालक ईश्वर का रूप माना जाता है, वहीं वो कभी बारीक, चिरकुट, छोरा, छोटू, मुन्ना बन हमारी दुत्कार और गाली खाता है.

इसे रोकने में सरकारें कितनी सफल हुई हैं, यह शायद बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि यह रोकने में तथाकथित बुद्धिजीवी, सक्षम और सभ्य समाज का क्या योगदान है. इसमें आपकी और हमारी क्या भूमिका है, यह सोचिए..


श्री निखिल दवे - एक परिचय    
मध्य प्रदेश के राजनैतिक विरासत वाले प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे निखिल दवे चिंतनशील युवा सामाजिक कार्यकर्ता है. उन्होंने मृत्युंजय भारत न्यास की स्थापना की है, जो सामाजिक सहयोग से ज़रूरतमंद आदिवासी छात्रों को नि:शुल्क आवास, भोजन, शिक्षा एवं रोज़गार के अवसर उपलब्ध करवाता है. न्यास द्वारा ग्राम स्वराज और युवाओं के विकास के साथ सामाजिक विषयों पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.

विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा सम्मानित श्री निखिल दवे समाज व जीवन से जुड़े विषयों पर विभिन्न मंचों पर अपनी बात रखते आए हैं. वे सिद्धांतों के जीवन में पालन करने के पक्षधर हैं तथा अनेक बार मान्यताओं तथा परम्पराओं को अनुभव की कसौटी के आधार पर कसने के बाद चुनौती देते नज़र आते हैं. जीवन को अपने निजी सिद्धांतों पर जीने की ज़िद उन्हें भीड़ से अलग पहचान देती है.

डिजिटल इंडिया 18 ऑनलाइन परिवार इस तरह के सम्माननीय व्यक्तियों के लिए उनके द्वारा किये जा रहे समाज हित के सभी कार्यों में हर संभव सहयोग के लिए तत्पर है. और सफलता के लिए शुभकामनाएं देता है. 




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