ए जिंदगी, 'तुम कैसी हो?'



गुफ़्तुगू ना, और ना ही कोई शिकायतें तुमसे

हाँ, थोड़ी सिमटने लगी हूँ, खुद मैं ..


बड़ी अजीब है जिंदगी
अक्सर सवाल करती 
रहती है मुझसे

अक्सर कहती है
और सुनाओ?
समझ नहीं आता
क्या कहूँ
निरुत्तर हो जाती हूँ मैं
# सुरेखा अग्रवाल 'स्वरा', लखनऊ 

धड़कनों की रफ़्तार
तेज़ हो जाती है
धूमिल होने लगती हैं
आँखें..
आँसुओं की धार 
फिर भरसक चेष्टा करती है 
रुकने की
और वह तुम्हारा
अनदेखा
धुंधला सा अक्स
और धुंधला हो जाता है...

गुफ़्तुगू ना और ना ही
कोई शिकायतें तुमसे
हाँ थोड़ी सिमटने लगी
हूँ खुद मैं 

भोर उषा की किरणों में
महसुस होती हो तुम
और शाम की मन्द हवा
में सुहासित होती हो
दिन भर मेरी व्यस्तता
में चलती हो तुम..
तो कभी पलकों में
नींद बन उबर आती हो तुम...!!

क्या सुनाऊँ तुम्हे
चाय के संग मीठा बन
लबों पर रहती हो
और खाने में चुटकी सा बन
ऊर्जा देती हो तुम
रात को सिरहाना बन
ख्वाबों में फ़िर एक गुलाबी स्वप्न
दे जाती हो तुम..

बस तुम्हारे साथ यही
दिनचर्या मेरी
तुम मुस्कुराती हो
तो मैं मुस्कुराती हूँ
हो जब तुम उदास तो उदास
हो जाती हूँ मैं..
फिर मैं शब्दों में उकेरती हूँ 
तुम्हे रोज थोड़ा थोड़ा...!!

और अब, तुम सुनाओ
ए जिंदगी, 'तुम कैसी हो?'




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