तमिलनाडु तूतीकोरिन 'चक्रव्यूह' को समझना होगा



''इस देश का भला कोई भी राजनैतिक पार्टी और नेता नहीं करेंगे, वे केवल अपनी अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने और कुर्सी-कुर्सी खेलने में व्यस्त रहे हैं और आजीवन रहेंगे. हमें अब इन नेताओं और राजनैतिक पार्टियों से उम्मीद करना छोड़ना होगा. आज आवश्यक हो गया है कि भारतीय बन जाओ, और भारत को बचाने के लिए खड़े हो जाओ. हिन्दू-मुस्लिम, कांग्रेसी-भाजपाई के चंगुल से बाहर निकलकर इंसान बनने का समय आ गया है और एक इंसान ही समझ सकता है कि राष्ट्रीयता के मायने क्या हैं? अपने देश व उसके नागरिकों के हितों के लिए कार्य करने से बड़ा कोई पुण्य नहीं है. कोई पूजा नहीं हैं. कोई व्रत या रोजा नहीं है.''

@ भास्कर चुग   

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में वेदांता ग्रुप की तरफ से पुलिसिया फायरिंग में 11 लोगों के मारे जाने की खबर है. याद आया प्रकाश झा की फिल्म 'चक्रव्यूह' में भी ऐसे ही एक धन्ना सेठ का नाम वेदांता था. उस फिल्म में भी पुलिस और नेता के गमछाधारी सेना ऐसे ही आम जनता को मारते थे.


कल जो तमिलनाडु में हुआ ये इंसानों को झकझोरने के लिए काफी है, 11 लोगों को पुलिस वालों ने गोलियों से छलनी कर मार दिया. 18 साल की लड़की "वेनिस्ता" को पुलिस वालों ने पहले घेर लिया फिर उसके मुहं में LMG रायफल घुसा कर गोली मार दिया गया.

उन लोगो की गलती ये थी कि बस वो लोग भारत में जन्मे उद्योगपति और अभी लन्दन के निवासी अनिल अग्रवाल की फेक्ट्री जो तमिलनाडु में लगी है, का विरोध कर रहे थे. उसके कारखाने से निकलने वाले कचरे के कारण गाँव में कैंसर के कीटाणु फ़ैल गए थे, लोग कैंसर से मरने लगे थे, तब जा कर उन्होंने आवाज उठाई.


दक्षिण के लोग वैसे भी उत्तर भारत के लोगो से ज्यादा जागरूक हैं, वो अपने अधिकार के लिए लड़ते हैं. मरने वाले सारे नौजवान हैं कई परिवार के लोगों का चिराग बुझ गया. आप इस बात के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते. राज्य सरकार है वहां की जिम्मेदार. इस बात से एक बात साफ़ होती है कि ये कम्पनिया भारत के लोगों के साथ जो व्यव्हार करती हैं, वो बहुत ही भयानक है. फेक्ट्री मालिक खुद लन्दन में रहता है और कम्पनी इंडिया में. इंडिया में कम्पनी लगाने से दो फायदे हैं. एक तो सस्ता मजदूर और दूसरा फेक्ट्री से निकलने वाले कचरे का भारत में कोई नियम नही है, पर लन्दन में गलत तरीके से कूड़ा निष्पादन पर कठोर करवाई होता है. यहाँ तक कि कम्पनी का लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है.

आज तमिलनाडु में हुआ, कल आपके घर होगा, परसों हमारे. अगर मोदी पर जोक बना लेने से सब ठीक होता है तो खूब बनायें, मैं भी तो बनता हूँ. बाकी कम्पनी मालिक अनिल अग्रवाल सभी पार्टियों को चंदा देता है, भाजपा हो कांग्रेस हो या लोकल पार्टियाँ, ये कम्पनिया बिजनेस करती हैं.
4 रुपया चंदा देकर हजारों करोड़ का लोन ले कर भाग जाती हैं. शायद तमिलनाडु में हुई इन हत्याओं को अमानवीय और राज्य प्रायोजित आतंकवाद भी नही कहा जा सकता, क्योंकि अनिल अग्रवाल सभी राजनैतिक पार्टियों को चन्दा देते है.

कुमार्थिदुपुरम के एक गाँव के ग्रामीण लगभग सौ दिनों से थुतुकुदी स्टरलाईट प्लांट का विरोध कर रहे थे, लेकिन जब किसी के कानों में जूँ नहीं रेंगी, तो वे कलक्ट्रेट पहुँच गये और उग्र प्रदर्शन शुरू कर दिया. परिणाम में पुलिस ने पहले आँसू गैस छोड़े, लेकिन जब वे ग्रामीणों को पीछे हटाने में विफल रहे तो गोलियाँ चला दीं, जिससे छः ग्रामीण मारे गये.

क्या ग्रामीणों का विरोध और गुस्सा गलत था? क्या संविधान किसी भी कारखाने को यह अधिकार देता है कि वह ग्रामीणों के जीवन को नरक बनाये? क्या कारखाने को यह अधिकार है कि वह पीने के पानी को दूषित करे या उसे जहरीला बनाये?

आज ही मैंने पंजाब के किसी गाँव का एक वीडियो शेयर किया था, जहाँ कारखाने से निकलने वाले पानी की वजह से नदी को ही जहरीला बना दिया. कोई भी पशु पानी पीने आता है तो वह मर जाता है. नदी की मछलियाँ मर रहीं हैं....लेकिन न मीडिया को होश और न ही सरकार को. साथ ही ये पहला मामला नहीं है. उधर पंजाब में फेक्ट्री मालिक साफ़ पानी पिने योग्य पानी वाले नदियों में फेक्ट्री का केमिकल बहा दी, जिसके कारण एक नदी को जहरीला बना दिया गया, जो पशु पानी पी रहा, वो मर रहा है. मछलियां मर रही हैं. सरकार के कान में वहां भी जू नहीं रेंग रहा.
अब वक्त गंभीर होकर सोचने का समय आ गया है. सवाल है कि क्या मोदी पर चुटकुले सुनाने, व्यंग्य करने से देश का कोई कल्याण हो रहा है? क्या गाँवों में रहने वाले ग्रामीण इंसान नहीं होते? क्या उन्हें जीने का अधिकार नहीं है?

वे ग्रामीण तो शहर में आकर किसी का कोई अहित नहीं कर रहे, बल्कि शहर को सब्जियाँ, अनाज, दूध आदि देकर जीवन ही दे रहे हैं, तो फिर किसी को यह अधिकार किसने दिया कि वह विकास के नाम पर गाँवों, ग्रामीणों और आदिवासियों को बर्बाद करें?

ये ग्रामीण जो शहीद हुए उन शहरियों से लाख गुना बेहतर हैं, जो कम से कम जागृत तो हैं. जिन्दा तो हैं, उन्हें होश तो है कि अब सहन करने का समय बीत गया. तिल-तिल कर मरने से बेहतर है पुलिस की गोलियों से ही मरें. कम से कम अपने प्रियजनों को घुट घुटकर मरते तो नहीं देखना पड़ेगा.

यदि हिन्दू-मुस्लिम, कांग्रेस-भाजपा, मोदी-योगी खेलने से मन भर गया हो, तो अपने देश के हित के लिए भी कुछ सोचना शुरू करें? अपने ही ग्रामीण भाइयों को बचाने के लिए कोई कदम उठायें? जितने भी कारखाने नदी, तालाबों, व भूजल को दूषित कर रहे हैं, उन्हें तुरंत प्रभाव से बंद करवाने के लिए राष्ट्रव्यापी आन्दोलन शुरू करें.

इस देश का भला कोई भी राजनैतिक पार्टी और नेता नहीं करेंगे, वे केवल अपनी अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने और कुर्सी-कुर्सी खेलने में व्यस्त रहे हैं और आजीवन रहेंगे. हमें अब इन नेताओं और राजनैतिक पार्टियों से उम्मीद करना छोड़ना होगा. 

भारतीय बन जाओ, और भारत को बचाने के लिए खड़ा हो जाओ. हिन्दू-मुस्लिम, कांग्रेसी-भाजपाई के चंगुल से बाहर निकलकर इंसान बनने का समय आ गया है और एक इंसान ही समझ सकता है कि राष्ट्रीयता के मायने क्या हैं? अपने देश व उसके नागरिकों के हितों के लिए कार्य करने से बड़ा कोई पुण्य नहीं है. कोई पूजा नहीं हैं. कोई व्रत या रोजा नहीं है.

आज गंगा समेत तमाम नदिया जहरीली हैं, तो उसका कारण यही उद्योगपति हैं, जो अपनी फेक्टरियों का कचरा गंगा जैसी नदी में डाल कर जहरीला बना देते हैं, खुद फेक्ट्री मालिक विदेश में रहते हैं, बीबी बच्चे समेत. और यहाँ हमारे लिए जहर छोड़ जाते हैं. फिर अगर कोई आवाज उठाये तो हिन्दू मुस्लिम में उलझा कर अपनी सरकार बनवा देते हैं. जहाँ से उनका राज परदे के पीछे से चलता है. ये फेक्ट्री के मलिक नेताओं के साथ मिल कर इंसानों के जज्बातों के साथ ऐसे ऐसे खेल खेलते हैं, जैसे कसाई बकरे को काटता हो.

वक्त है सुधर जाइये. पानी, जमींन, जंगल, पहाड़ बचाइए. वर्ना ये नेता और उद्योगपति लोग पैसे के लिए सब बर्बाद कर भाग जायेंगे और तब ऐसी महामारी फैलेगी कि कोई नहीं बचेगा. इन नेताओं उद्योगपतियों का क्या? ये तो विदेश निकल लेंगे, बीबी बच्चे समेत, पर आपको यही का प्रदूषित पानी पी के मरना है. वो लोग तो एक एक कर देश छोड़ भाग जायेंगे.

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