मध्यप्रदेश सरकार की जमीनी हकीकत, कैंसर का इलाज दवा और दुआओं से



प्रशासन में बैठे अफसरों की लापरवाही कहें या नाफरमानी, 

सरकार की प्राथमिकताओं पर भी काम नहीं हो रहा है. एक ओर जहां चुनावी साल में 

सरकार मजदूर वर्ग, विशेषकर असंगठित कामबारों को खुश करने की कोशिश में 

जुटी हुई है, मुख्यमंत्री घोषणा पर घोषणा करते जा रहे हैं, अफसरशाही उनकी मंशा पर 

पानी फेरती नजर आ रही है. जिस योजना के लिए खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 

ने मोर्चा संभाल रखा हो, यदि उस पर भी ठीक से अमल नहीं हो पा रहा हो, 

तो मुख्यमंत्री खफा होना लाजिमी है.




-संजय सक्सेना



त दिवस मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने गृह जिले के दौर पर थे. ग्राम बीजला में मंच से जनसंवाद कार्यक्रम चल रहा था, तभी उन्होंने श्रमिकों के लिए योजना पर बोलना शुरू कर दिया. जब उन्होंने ग्रामीणों से पूछा कि श्रमिकों का पंजीयन हो गया क्या? तो सभा में मौजूद ग्रामीणों ने तुरंत मना कर दिया. इससे मुख्यमंत्री की त्यौरियां चढ़ गईं. एक तो उनकी महत्वाकांक्षी योजना, फिर उनके ही गृह क्षेत्र में उस पर अमल नहीं हो पा रहा, नाराज क्यों नहीं होंगे. 

उन्होंने तुरत फुरत तमाम अधिकारियों को तलब कर जानकारी ली. अफसरों की ओर से कहा गया कि 212 श्रमिकों के पजीयन हुए है, सीएम ने कहा कहा पंजीयन किये हैं तो लिस्ट दिखाओ, इस पर सन्नाटा पसर गया. अफसरों के हाथ-पांव फूल गए. काम किया होता तो दिखाते, लिस्ट होती तो दिखाते. मुख्यमंत्री को असंगठित श्रमिक मजदूरों की लिस्ट नहीं मिली. वहां भारतीय जनता पार्टी के कैबिनेट दर्जा प्राप्त दर्जन भर से अधिक नेता बैठे हुए थे, मुख्यमंत्री ने उनसे पूछा कि आप भी ग्राम सभा में गए या नहीं? ग्राम सभाएं बुलाई गई या नहीं? तो वे भी चुप्पी साध गए. मुख्यमंत्री का पारा चढ़ गया. उन्होंने मंच से ही अफसरों को फटकार लगा दी और नेताओं को जमीन पर काम करने की नसीहत दे डाली. 

मुख्यमंत्री ने भाजपा नेताओं और अफसरों से कहा मैं लोगो के लिए काम कर के थक गया और आप जमीन पर काम नहीं कर रहे हो, यह गलत बात है. मुख्यमंत्री ने कह दिया कि समाज के गरीबों, ग्रामीणों और किसानों के लिये संचालित योजनाओं के क्रियान्वयन की जमीनी हकीकत जानने के लिये वे ग्रामीण अंचलों का औचक निरीक्षण करेंगे. यह संकेत भी दिए कि यदि कहीं गड़बड़ी पाई गई तो सख्त कार्रवाई की जाएगी. मुख्यमंत्री का गुस्सा जायज है. वो घोषणाएं कर रहे हैं, सरकार से बजट की व्यवस्था भी करवा रहे हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं हो पा रहा है. वो भी जब उनके गृह क्षेत्र में अमल नहीं हो, तो यह तो बहुत ही शर्म की बात है. हां, अफसरों के साथ ही उनकी पार्टी के लोगों को भी उन्होंने जिम्मेदारी का अहसास कराया. लेकिन सवाल है कि फिर मुख्यमंत्री और उनकी सरकार आखिर ऐसे लोगों को उपकृत क्यों कर रही है? 

घोर लापरवाही के साथ ही राजधानी भोपाल में ही शासकीय मशीनरी में भ्रष्टाचार का एक और बड़ा मामला सामने आया. यहां मिट्टी, कंकड़ और कचरा मिला गेहूं वेयर हाउस में पहुंचा दिया गया. ऐसा पहला मामला नहीं है, इसके पहले भी हो चुका है. गेहूं खरीदी की मॉनीटरिंग के लिए मुख्यमंत्री से लेकर जिले में कलेक्टर और अन्य अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है, परंतु इसके बावजूद गेहूं में भारी मात्रा में मिट्टी, कंकड़ और कचरा मिलाने की घटना हो गई. सच तो यह है कि यह एक घटना नहीं, जानबूझकर किया गया घोटाला है. और कम से कम मॉनीटरिंग में बड़ी चूक तो दर्शाता ही है. सख्ती के बावजूद अधिकारियों और कर्मचारियों के हौसले कितने बुलंद हैं कि वे गड़बड़ी करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते. इसी के साथ अब प्रदेश भर की खरीदी केंद्रों में हो रही गेहूं खरीदी भी संदेह के घेरे में आ गई है. 

भोपाल के कोलार रोड स्थित त्रिवेणी वेयर हाउस से मिट्टी मिले गेहूं की दो-चार नहीं, पूरी 169 बोरियां पकड़ी गईं. पता चला कि इसमें मिट्टी, कंकड़ और कचरा सीहोर से मिलाया गया. खाद्य विभाग ने जांच में दोषी पाए गए आठ लोगों पर एफआईआर दर्ज कराई. उपार्जन केंद्र का सतत निरीक्षण न करने वाले नोडल अधिकारी सहकारिता निरीक्षक एचएन वर्मा और सहकारी बैंक के सुपरवाईजर नर्मदा प्रसाद शर्मा को शोकाज नोटिस दिया है. कायदे से इन अधिकारियों तो तत्काल निलंबित कर इन पर आर्थिक दंड भी लगाया जाना चाहिए, क्योंकि भ्रष्टाचार में तो ये भी सीधे शामिल हैं. एक बार नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाए तो कई लोग सुधर सकते हैं. अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई से संदेश जाता है, लेकिन सरकार निचले स्तर पर तो बड़ी कार्रवाई कर देती है, उच्च स्तर पर कुछ नहीं होता, बचा लिया जाता है. शोकाज नोटिस तो प्रमुख सचिव स्तर पर दिया जाना चाहिए, आखिर वे क्या कर रहे थे? 

अब नींद से जागे प्रशासन ने भोपाल के सभी 22 गोदामों में रखे गेहूं की जांच कर उसकी रिपोर्ट दो दिन में तलब की है. भोपाल जिले में 2.10 लाख मेट्रिक टन गेहूं उपार्जित किया गया है, जो 22 गोदामों में रखा हुआ है. दो साल पहले भोपाल के ही करतार वेयर हाउस में मिट्टी मिला गेहूं पकड़ा गया था, उसमें 9 समितियां दोषी पाई गई थीं. इसमें से एक सेवा सहकारी समिति टीलाखेड़ी भी थी. उसमें उस वक्त ऑपरेटर शेर सिंह वर्मा था. उस समय इन सभी सोसायटियों को ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया था, लेकिन दोषी पाए गए शेरसिंह को सेवा सहकारी समिति कजलास के पदाधिकारियों ने समिति में केंद्र प्रभारी मनोनीत कर दिया. उसने यहां घोटाला कर दिया. अब उस पर तो कार्रवाई की ही जाए, जिन लोगों ने उसे प्रभारी बनाया, उन्हें पहले निलंबित किया जाए. उन्हें यदि छोड़ दिया गया, तो कार्रवाई का कोई मतलब नहीं रहेगा. मुख्यमंत्री को स्वयं इस मामले की पूरी फाइल देखना चाहिए और राजधानी के खाद्य विभाग के सारे अफसरों पर सीधी कार्रवाई करना चाहिए. आखिर उनकी जवाबदारी क्या है? वे नियमित निरीक्षण नहीं करते, निरीक्षण के नाम पर औपचारिकता ही तो की जाती है. या यह कहने कि निरीक्षण के नाम पर कागज देखकर अपना कमीशन ले लिया जाता है. कमीशन या रिश्वत लेकर जब निरीक्षण की रिपोर्ट बनाई जाएगी तो उसमें ईमानदारी कितनी होगी? 

साफ है, राजधानी का यह आलम है तो बाकी हिस्सों में तो घोटाले हो ही रहे होंगे. भ्रष्टाचार का घुन तो पूरे प्रदेश में लगा हुआ है. मुख्यमंत्री के कहने से हो क्या रहा है? वो चिल्लाते हैं, सख्त चेतावनी देते हैं, बस.. या तो वो भूल जाते हैं या उनके सलाहकार उन्हें भुलाने की सलाह दे देते हैं. कुछ तो गड़बड़ है. लेकिन इससे प्रदेश के हाल तो बेहाल हो रहे हैं. अरबों की कार्ययोजनाएं बनी हैं, योजनाएं चल रही हैं, केंद्र की ओर से पुरस्कार भी मिल रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत वही है, जो मुख्यमंत्री को उनके विधानसभा क्षेत्र में सुनने और देखने को मिल रही है. गेहूं की मिलावट हो या श्रमिकों के पंजीयन में लापरवाही, भोपाल-सीहोर में जब लापरवाही और भ्रष्टाचार है, तो कहां नहीं होगा? 

सही बात तो यह है कि जब सरकार प्रशासनिक अधिकारियों पर ज्यादा भरोसा करने लगती है, तो ये स्थिति बनती है. कार्यपालिका का काम योजनाओं पर अमल करना होता है. सरकार पूरी तरह से उन पर निर्भर हो चुकी है. जिन्हें काम करना है, वे सलाहकार बने हुए हैं. पूर्ण निर्भरता ने उन्हें स्वेच्छाचारी बना दिया है. वे मानकर चल रहे हैं कि उनके बिना सरकार कुछ नहीं है. वो नहीं होंगे तो सरकार ठप्प हो जाएगी. और वो कुछ भी करें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा. वो महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन यदि किसी अंग में कैंसर विकसित होने लगे तो उसे तत्काल काटना ही रोग का निदान होता है. हम केवल दवाओं और दुआओं के सहारे चलेंगे तो कैंसर ठीक नहीं होगा, यह तय है. यही हो रहा है. 


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