कहाँ है, इनके हिस्से की खुशी?



''आजादी के 71 साल बाद भी हम अमीरी-गरीब़ी की खाई को नहीं पाट सके...! आर्थिक विषमताएं आज भी जस की तस हैं. सरकारों का काम केवल गाल बजाना रहा है आज तक. किसी ने कुछ नहीं किया, इस खाई को पाटने के लिए. सवाल है कि इनके हिस्से की खुशी कहाँ है?''




@गैरतगंज से वीरेंद्र टन्डन 

केवल मंच पर कोरे भाषण, कागजों पर सरपट दौड़ती योजनाएं, बदमिजाज़ नौकरशाही, लचर-पचर व्यवस्थाएं और भ्रष्टाचार की वैतरणी में आकंठ डूबा हमारा लोकतांत्रिक सिस्टम, नेता और अफसर-कर्मचारी.... सब के सब 'खा खा खैया' में लगे हैं, अपनी कई-कई पीढ़ियों का इंतज़ाम कर रहे हैं.  चुनाव आ रहे हैं और जा रहे हैं... कई पंचवर्षीय बीत चुकी हैं और चुकती रहेंगी...!

लोक-लुभावन बजट बराबर पेश हो रहे हैं..!
Image result for street people in indiaआम आदमी आज भी गरीब़ी की चक्की में पिस रहा है. उसके मासूम बच्चों का कोई भविष्य आज भी नहीं है. परिवार सहित नंगे तन खुले आसमान के नीचे रहने की मज़बूरी. दो वक्त की रोटी का जुगाड़...! उसके मुट्ठी भर सपने भी पूरे होना दुश्वार है...!

कैसा धर्म? कहाँ का धर्म? कौन सी जात-पात? कौन से भगवान्....?? पहले पीड़ित मानवता और ये लाचार, बेबस आदमजात...! सवाल, कौन सी सरकार सोचेगी कभी इनके बारे में..?




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