महंगे पेट्रोल-डीजल से 'देश के सिस्टम तक' सवाल ही सवाल





सरकार जानबूझ कर पेट्रोल-डीजल पर अधिक टैक्स लगाती है -केन्द्रीय मंत्री अलफोंस


''मोदी सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर आलोचनाओं से घिरी हुई है. देश में पेट्रोल-डीजल के दिन व दिन महंगे होने पर जम कर हो हल्ला हो रहा है. हो भी क्यों न लगभग सभी की एक ग्रामीण आम आदमी तक की महती आवश्यकता बन गया है यह पेट्रोल डीजल. महंगा क्यों हो रहा है, पता करते हैं तो पता चलता है कि सरकार द्वारा भारी टेक्स लगाया जा रहा है. आज गुरूवार को अभी अभी केन्द्रीय मंत्री अलफोंस ने स्वीकार किया है कि सरकार जानबूझ कर टैक्स लगाती है. इसके पीछे उन्होंने बजह बताते हुए कहा है कि ताकि गरीबों के हितों में काम किया जा सके. अब हम बात करें गरीबों की, तो देश में गरीबी भी पेट्रोल-डीजल की ही तरह दिन व दिन बढ़ रही है. ऐसे में कहा जा सकता है कि मंत्री जी झूंठ बोल रहे हैं. और असली बजह पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है.'' 



अब हम बात करें गरीबों की तो देश में गरीबी भी पेट्रोल-डीजल की ही तरह दिन व दिन बढ़ रही है. इससे यह साबित हो जाता है कि मंत्री जी झूंठ बोल रहे हैं. देश में पेट्रोल-डीजल और उसके साथ अन्य चीजों के महंगे होने के पीछे हमारे सिस्टम की कमी है. हमारे सोच हमारी शिक्षा की कमी है. वरन क्या कारण है कि मध्यप्रदेश से खरीद कर दिल्ली में बिजली उपभोक्ताओं को सस्ती मिल रही है? और क्या कारण है कि हमारे देश से खरीद कर श्रीलंका में पेट्रोल-डीजल सस्ता मिल रहा है? 

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का हास्यास्पद तर्क 

इनके पूर्व पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भी पेट्रोल और डीजल के दाम में तेजी पर कह चुके हैं कि सरकार ग्राहकों को होने वाली तकलीफ को लेकर चिंतित है, लेकिन सरकार को ग्राहकों के हित तथा राजकोषीय जरूरत के बीच संतुलन पर ध्यान देना होता है. दुसरी ओर उन्होंने यह कह कर कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत तभी तार्किक हो सकती है, जब उन्हें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाया जाए, गेंद वित्त मंत्री अरुण जेटली के पाले में डाल दी है. केंद्र सरकार ने देश में सभी अप्रत्यक्ष करों की जगह जीएसटी लागू किया था, लेकिन पेट्रोलियम उत्पादों को इससे बाहर रखा गया है. 




भारत में पेट्रोल पाकिस्तान से 57% महंगा

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों का हवाला देकर भारत में पेट्रोल और डीजल बहुत महंगे भाव पर बेचा जा रहा है, लेकिन भारत के पड़ोसी देशों में ऐसा नहीं है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का ज्यादा भाव होने के बावजूद भारत के पड़ौसी देश भारत से बहुत कम रेट पर पेट्रोल और डीजल की बिक्री करते हैं. और यह खुद भारत सरकार के आंकड़े बता रहे हैं.



पेट्रोलियम मंत्रालय के दायरे में आने वाली संस्था पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ के आंकड़ों के मुताबिक 1 अप्रैल 18 के दिन पाकिस्तान के मुकाबले भारत में पेट्रोल का भाव करीब 57 प्रतिशत अधिक, श्रीलंका के मुकाबले 51 प्रतिशत ज्यादा, नेपाल के मुकाबले 14 प्रतिशत अधिक और बांग्लादेश के मुकाबले 8 प्रतिशत ज्यादा दर्ज किया गया.

हम ही से खरीद कर श्रीलंका में पेट्रोल काफी सस्ता 
इसी दिन दिल्ली में पेट्रोल का भाव 73.73 रुपए, पाकिस्तान में सिर्फ 47.04 रुपए, श्रीलंका में महज 48.94 रुपए, नेपाल में 64.78 रुपए और बांग्लादेश में 68.08 रुपए प्रति लीटर दर्ज किया गया. यह सभी भाव संबधित देश की करेंसी में नहीं, बल्कि भारतीय करेंसी रुपए में हैं.

सिर्फ पेट्रोल ही नहीं, बल्कि भारत में डीजल भी सभी पड़ौसी देशों के मुकाबले बहुत महंगा है. आंकड़ों के मुताबिक पहली अप्रैल के दिन दिल्ली में डीजल का भाव 64.58 रुपए था, जबकि श्रीलंका में सिर्फ 39.74 रुपए, बांग्लादेश में 51.45 रुपए, नेपाल में 52.20 रुपए और पाकिस्तान में 54.33 रुपए प्रति लीटर था.

भारत की अर्थव्यवस्था इन सभी पड़ौसी देशों के मुकाबले ज्यादा मजबूत है, ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के बढ़े हुए भाव जब भारत के पड़ौसी देश कम रेट पर पेट्रोल और डीजल बेच सकते हैं तो फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो रहा?

गरीबों की योजनाओं की बात में कितना दम?  
केंद्र सरकार ने दो साल में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 3.60 करोड़ लोगों को एलपीजी गैस कनेक्शन दिया है. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बिहार में योजना के विस्तार शुरू करने के दौरान यह बात कही. केंद्र सरकार ने पहले इस योजना के तहत 5 करोड़ लोगों को देश भर में गैस कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा था, जिसे चालू वित्त वर्ष के लिए बढ़ाकर 8 करोड़ कर दिया गया है. योजना अच्छी है, लेकिन..


.. और महिलायें चूल्हों में फूंक मार रही हैं
लेकिन गाँव में जाएँ तो स्थिति वही है, महिलायें चूल्हों में फूंक मार रही हैं. पड़ताल में सामने आया कि सरकार को ग़रीब से कोई मतलब नहीं है. यह ऐसे भी माना जा सकता है कि यदि सरकार को बाकई गरीब से मतलब होता तो गरीबी कम हो रही होती, लेकिन वह तो लगातार बढ़ रही है. बेहतर होता कि उसे इस लायक एलपीजी खरीदने के लायक बनाया जाता आत्म-निर्भर बनाया जाता. कहा जा सकता है कि सरकार तो यह देखती है कि किस योजना से उसे ज्यादा से ज्यादा फायदा हो सकता है. 

योजनाओं में कमीशन का गेम 
अब एलपीजी को ही लें, तो एक बार उसे दे दिया. अब वह गरीब हर माह सिलेंडर भरवाने शहर जाए. पैसा की व्यवस्था करे और महंगा सिलेंडर खरीदे. समझा जा सकता है फ़ायदा किसे हो रहा है? और क्यों सरकार का इस पर ज्यादा ध्यान है? कोई भी योजना उठाकर देख लें कमीशन का गेम चल रहा है. चाहे वह गांव की सड़क का मामला हो, चाहे गांव में आंगनबाडी स्कूल बिल्डिंग बनने का मामला हो या कोई गली में सीसी होना हो, सबका कमीशन ऊपर तक फिक्स है. 

स्वतंत्रता के तीन दशकों बाद 1980 तक कम होकर अब तेजी से बढ़ी असमानता
गरीब और गरीब हो रहा है, अमीर और अमीर बन रहा है. इसके लिए हम असमानता पर हाल में जारी रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि वर्ष 2014 में भारत के शीर्ष 1 प्रतिशत अमीरों के पास कुल राष्ट्रीय आय की 22 प्रतिशत पर हिस्सेदारी थी. शीर्ष 10 प्रतिशत अमीरों के पास कुल राष्ट्रीय आय की 56 प्रतिशत पर हिस्सेदारी थी. जबकि स्वतन्त्रता के तीन दशकों बाद यानि कि 1980 तक यह असमानता कम होकर देश के नीचे के 50 प्रतिशत लोगों की कुल आय का राष्ट्रीय औसत से अधिक थी. 

और आज हम देखें तो यह असमानता तेजी से बढ़ रही है. इसके पीछे प्रमुख कारणों में न. 1 पर हमारे अनुसार प्रमुख कारण राजनीति के क्षेत्र के लोगों का अशिक्षित की तरह व्यवहारिक योग्य नहीं होना है. उन्हें यही ज्ञान नहीं है कि अनैतिक कार्य कर बहुत सारा कमा कर सर पर रख कर ऊपर नहीं ले जा सकेंगे. सब यहीं छोड़ जाना है, लेकिन लगे हैं...  इसी के कारण अन्य कारण पैदा होते है. जैसे शिक्षा की उचित व्यवस्था न होना, कृषि प्रधान देश में गाँव से पलायन कृषि क्षेत्र में कोई सुधार नहीं किये जाना, स्कूल बंद किये जा रहे हैं, थाने खोले जा रहे हैं. ऐसे में अपराध ही बढ़ेंगे न. निजी लोगों/संस्थाओं को लाभ पहुँचाने के लिए सरकारी संस्थाओं का निजीकरण तेजी से किया जा रहा है. आम जनता किसी प्रकार विरोध करती भी है तो दवा दिया जाता है. उसकी कोई बात नहीं सूनी जाती. निजीकरण के बाद उसमें लगे लोगों का शोषण होता है. आम जनता पर अधिक भार पड़ता है. ऐसे में असमानता बढ़ेगी ही. 

मध्यप्रदेश से खरीद कर दिल्ली में बिजली सस्ती
यह खबर तो बहुत आम हो गई है. लगभग सभी जानते हैं कि कैसे गलत सिस्टम के कारन मध्यप्रदेश से ही खरीद कर दिल्ली में बिजली उपभोक्ताओं को सस्ती मिल रही है? और मध्यप्रदेश के लोग महंगी बिजली लेने के लिए वाध्य हैं. समझना होगा क्या कारण है कि हमारे देश से खरीद कर श्रीलंका में पेट्रोल-डीजल सस्ता मिल रहा है? 


.. 11 साल की बच्ची 'भात भात' कहते मर जाती है, और हम पर कोई ख़ास असर नहीं होता 
और ऐसे में अब अक्सर जब कभी झारखंड में एक गरीब मां की कोई भूंखी 11 साल की बच्ची भात भात कहते मर जाती है. उसकी असहाय मां सिवाय रोने के कुछ नहीं कर पाती. घटना केरल की है कोई युवक 1 किलो चावल चुराने के चक्कर में पीट पीट कर मार दिया जाता है. और हाल में गुजरात में एक युवक को फैक्ट्री मालिक और उसके लोगों ने गेट से बाँध कर पीट पीट कर मार दिया जाता है. घटनाओं पर कोई ठोस कदम नहीं उठाये जाते. कुछ समय का रोना और फिर कोई नई घटना के लिए तैयार हो जाना, जैसा लगता है. ऐसे में हमारा पूरा सिस्टम दोषी है. 


और बात करें सिस्टम की तो आजकल एक मैसेज सोशल मीडिया पर जम कर वायरल हो रहा है. वही पेश कर देते हैं पढ़ें और अपनी राय नीचे कमेन्ट बॉक्स में अवश्य दें, ताकि हम उसे अधिक से अधिक लोगों में फैला सकें. जिससे कि आपकी आबाज बुलंद हो और देश का कुछ भला हो सके.. ये देखिये 

क्या हमारे देश भारत का सिस्टम आम जनता को धोखा देता है...?

नेता चाहे तो दो सीट से एक साथ चुनाव लड़ सकता है ! लेकिन.... आप दो जगहों पर वोट नहीं डाल सकते.

आप जेल मे बंद हो तो वोट नहीं डाल सकते..लेकिन नेता जेल में रहते हुए चुनाव लड़ सकता है.

आप कभी जेल गये थे, तो अब आपको जिंदगी भर कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी, लेकिन.. नेता चाहे जितनी बार भी हत्या या बलात्कार के मामले में जेल गया हो, फिर भी वो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति, जो चाहे बन सकता है.

बैंक में मामूली नौकरी पाने के लिये आपका ग्रेजुएट होना जरूरी है.. लेकिन, नेता अंगूठा छाप हो तो भी भारत का फायनेन्स मिनिस्टर बन सकता है.

आपको सेना में एक मामूली सिपाही की नौकरी पाने के लिये डिग्री के साथ 10 किलोमीटेर दौड़ कर भी दिखाना होगा, लेकिन... नेता यदि अनपढ़-गंवार और लूला-लंगड़ा है, तो भी वह आर्मी, नेवी और ऐयर फोर्स का चीफ यानि डिफेन्स मिनिस्टर बन सकता है.

और
जिसके पूरे खानदान में आज तक कोई स्कूल नहीं गया.. वो नेता देश का शिक्षामंत्री बन सकता है.

और
जिस नेता पर हजारों केस चल रहे हों.. वो नेता पुलिस डिपार्टमेंट का चीफ यानि कि गृह मंत्री बन सकता है.

और भी ऐसी कई बातें हैं, जिनमें सुधार अत्यंत आवश्यक हैं. अब बताइये क्या ऐसे सिस्टम नहीं बदल देना चाहिये? लेकिन सवाल वही कि कैसे और कौन करे? इसके लिए आपके पास कोई सुझाव हों जानकारी हो तो अवश्य दें.



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News Digital India 18

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